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20 अक्टूबर 2026

पगला है तू !

लोकतंत्र आबाद रहेगा बरसों तक 

रावण आज ज़रूर मरेगा, पगला है तू !


जब-जब पाप बढ़ेंगे भू पर ,प्रभु आएँगे 

नेता उनका रूप धरेगा,पगला है तू !


हाकिम का दरबार भरा है चोर-लुटेरों से 

ये बातें अख़बार लिखेगा,पगला है तू !


भारत होगा विकसित सन् सैंतालिस में अब 

तब सारा संसार झुकेगा,पगला है तू !


वोट हमारा,तंत्र हमारा,संविधान है अपना 

नहीं कभी इंसाफ़ बिकेगा,पगला है तू !!


- संतोष त्रिवेदी 


दशहरा (20/102026)

14 सितंबर 2026

ग़ज़ल

 वह सवालों से परे है

देवता बनता फिरे है।

रंग उस पर फिट सभी हैं,

रूप ऐसा वह धरे है!

देस की पतवार साधे,

वह अकेला ही चले है।

गर्क बेड़ा हो भले ही,

हृदय में ज्वाला भरे है!

लिख रहा है खूब बेहतर,

शहद बातों से झरे है।

यह किताबी आदमी ही,

सच बताने से डरे है!

आदमी ख़ुद बन न पाया,

साँप की छाया तले है।

ज़ाहिलों का है समागम,

बुद्धि ख़ुद की ही हरे है!


6 सितंबर 2026

 घोर बादल प्रलय के छँटने लगे हैं,

वो फिर पुराने वायदे रटने लगे हैं।


मंच कोई भी नहीं वो छोड़ते हैं अब,

ख़ुद की कही हर बात से हटने लगे हैं।


पढ़ने-लिखने का कोई मौसम नहीं रहा,

धर्म माथे पर सजा, मैदान में डटने लगे हैं।


नायक नए तैयार होते जा रहे हैं रोज़,

इंसाफ़ और सच भीड़ में पिटने लगे हैं।


रहनुमाओं से हमें उम्मीद अब भी ख़ूब है,

झूठ के परचे हमारे हाथ से बँटने लगे हैं !


लूट जारी है मुसलसल देश भर में आपकी,

हे राम! यह सब देखकर आइने फटने लगे हैं !


— संतोष त्रिवेदी


28 अगस्त 2026

अच्छे दिन

 अच्छे दिन तो अब आए हैं !

घर कै सक्कर महँगी होइगै,

गाड़ी सब एथनॉल सुरुकि गै।

रूपिया लुढ़कि पहुँचिगा सौ तक,

रोजगारौ सरकार डकरि गै॥

कर्ज़ामाफ़ी साहेब के भै,

रामदीन धक्का खाए हैं।

अच्छे दिन तो अब आए हैं !!

हम मंदिर-मसजिद भटकि रहेन,

वी साख बढ़ाए हैं बिदेस मा।

जब जब कस्ट मिलत पब्लिक का,

रील-रूप धरि लेत देस मा।

भक्त अउर भगवान क लूटैं,

यह समरसता लाए हैं।

अच्छे दिन तो अब आए हैं!!

धनी उड़ावैं मउज, बूड़ि गै

गाँव-गिराँव किसानी।

वोट लूटि ल्यो,देस लूटि ल्यो,

बचै न एकु निसानी।

रास्ट्र गीत रमदिनवा गावै,

तुम करौ ट्रंप-जजमानी।।

आँधरि-बहिरि बनायो पब्लिक,

पत्रकार सब बउराए हैं। 

अच्छे दिन तो अब आए हैं !!


-संतोष त्रिवेदी

20 अगस्त 2026

ग़ज़ल

 धर्म के धंधे पुराने हो गए,

धीरे-धीरे वो सयाने हो गए!


रक्त-रंजित जीभ लेकर घूमते,

बद-सियासत के ठिकाने हो गए।


दिन-दहाड़े लूटकर मंदिर चले,

रघुबीर भी उनके निशाने हो गए।


रात-दिन वो झूठ बोते,बाँटते,

सच सुने सच में, ज़माने हो गए।


इंतहा की आख़िरी शब आ गई,

क़ातिलों के दिन सुहाने हो गए !


• संतोष त्रिवेदी 

22 जुलाई 2026

चुप्पी

 चुप्पी के भी अर्थ बड़े हैं 

यूँ ही ताले नहीं जड़े हैं ।


संविधान को घोट रखा है 

लोकतंत्र की राह अड़े हैं ।


बच्चों को पुचकारी देकर 

डंडा-लाठी लिए खड़े हैं।


पेपर लीक तमाशा लगता 

रोजगार ख़ुद लिए पड़े हैं ।


आँसू सूख चुके हैं उनके 

अब तो केवल काँट गड़े हैं।


दुनिया उलट-पुलट हो जाए 

कुर्सी और ज़ुबाँ जकड़े हैं ।


मौन तभी टूटेगा अब तो 

राम कहें ‘प्रभु आप बड़े हैं’।


-संतोष त्रिवेदी 







17 दिसंबर 2014

व्यंग्य-विमर्श की आत्म-कथा !

कल व्यंग्य से सम्बन्धित एक कार्यक्रम में जाना हुआ,जहाँ एक प्रकाशन संस्थान द्वारा सम्मान-समारोह था और उसके बाद ‘समकालीन व्यंग्य:प्रकृति एवं प्रवृत्ति’ विषय पर विचार-विमर्श।उम्मीद थी कि व्यंग्य पर कुछ सार्थक चर्चा सुनने को मिलेगी पर अफ़सोस की बात यह रही कि वहाँ जमकर सतही विमर्श हुआ और उन लोगों के द्वारा किया गया,जिनका हमारे मन में बेहद सम्मान है।चर्चा में व्यंग्य से अधिक अखबारी-व्यंग्यकार रहे और उनके लेखन को चलताऊ ढंग से नकार दिया गया।देश के चर्चित व्यंग्यकार ने व्यंग्य की प्रकृति तो ठीक से परिभाषित की पर आज की पीढ़ी द्वारा समकालीन विषयों पर व्यंग्य लिखकर फेसबुक पर चस्पा करने पर ही सवाल उठा दिये।यहाँ लिखे जाने वाले लेखों की गुणवत्ता पर कोई बात नहीं हुई, जबकि हमने स्वयं कई बार फेसबुक पर ही खूब और कचरा लिखे जाने पर बहसें की हैं।फेसबुक में लेख डालना कहाँ से गलत है जबकि यह विमर्श का सबसे आधुनिक प्लेटफ़ॉर्म है।यह भी कहा गया कि नई पीढ़ी कुछ पढ़ती नहीं है।तो क्या नई पीढ़ी केवल पुराना लिखा हुआ पढ़े या नवीनतम उपन्यासों या संग्रहों के छपने की प्रतीक्षा करे ? कुल मिलाकर सन्देश यह था कि अखबारी व्यंग्य न लिखने की चीज़ हैं और न ही पढने की।यानी असल व्यंग्यकार वही है जो एक उपन्यास लिखने के लिए दो-तीन साल के लिए भूमिगत हो जाए और वर्तमान समस्याओं को देखकर लिहाफ ओढ़ ले।

कार्यक्रम में एक पूर्व संपादक ने यह कहा कि आज देश में सबसे अधिक कवितायेँ लिखने वाले हैं और उसके बाद दूसरे नम्बर पर व्यंग्यकार ही हैं।व्यंग्यकारों की तो गिनती भी तकरीबन पाँच हज़ार बताई गई।यहाँ तक तो हमारी भी सहमति है।फेसबुक से ही पता चल जाता है कि हर व्यक्ति कवि और हर दूसरा व्यंग्यकार है पर यहाँ भी गुणवत्ता पर बात नहीं की गई।उनका दर्द था कि अख़बारों में बहुत ही घटिया लिखा जा रहा है,हालाँकि वे भी एकाध जगह लिख रहे हैं और वहां वाकई ज़्यादातर व्यंग्य के नाम पर उपहास ही छपता है।विमर्शकार का यह भी कहना था कि अखबारी-व्यंग्य ,जो अधिकतर राजनीति पर लिखा जाता है,जल्द ही अप्रासंगिक हो जाता है.तो क्या व्यंग्य को शाश्वत मानकर ही लिखा जाय ? इस बारे में परसाईं सही जवाब देते हैं कि व्यंग्य लेखन में कुछ भी शाश्वत समझकर लिखना ही मूर्खता है.समाज को दर्द आज है तो क्या उस बारे में दस साल बाद लिखा जाना ठीक होगा ?अखबारी-लेखन की वास्तविकता यह है कि कुछ सम्पादकों की व्यंग्य के बारे में अधकचरी समझ अधिक भारी है।विमर्श इस पर होना चाहिए कि घटिया आलेख क्यों छपते हैं ? यहाँ भाई-भतीजावाद और पुरानी जान-पहचान भी खूब सक्रिय है।मुख्य बात यह भी है कि व्यंग्य के वरिष्ठतम लोग नित्य-प्रति अख़बारों में छप रहे लेख पढ़ते भी हैं ? नई पीढ़ी पर इलज़ाम है कि वह नहीं पढ़ती तो क्या वे ऐसा करते हैं ? अगर वे पढ़ते होते तो तुलनात्मक ब्यौरे से आसानी होती।

शायद इसीलिए हर व्यंग्य-विमर्श शरद जोशी और परसाईं तक आकर ठिठक जाता है।आगे आने वाली पीढ़ी व्यंग्य-लेखन से कहीं अधिक गुटबंदी,खेमेबाजी और अपनी-अपनी सम्मानबाज़ी में लगी है।वह फेसबुक पर अपनी सेल्फीज़,माला पड़ी मोहक छवि पर ही मुग्ध है।अधिकतर तथाकथित बड़ा लेखक अपने सम्मान और पुरस्कार के तईं लिखने का ठेका पाने को उत्सुक है।उसे वर्तमान के दर्द से क्या लेना-देना ? नई पीढ़ी कैसा लिखती है,उसे खुद लिखकर बताने का भी समय नहीं है।जो भी विमर्श होगा,वह गोष्ठियों में ही होगा,फेसबुक पर क्यों नहीं ? शायद इसलिए भी कि गोष्ठियों में सवाल पूछने कि गुंजाइश नहीं होती।फिर नई पीढ़ी को आप किस तरह सुधारना चाहते हैं या आप केवल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं ?

15 अप्रैल 2014

मैं भी लिखूँगा किताब ....!


मैं भी लिखूँगा किताब
और नोच लूँगा एक झटके में सारे नकाब
उतार दूँगा खाल उसकी
पर इससे पहले उसे
मौन तो होने दो
मुर्दा होगा तो सहूलियत होगी नोचने में
बन जाऊँगा एक झटके में लेखक
और हाथ में दाम के साथ आएगा काम भी.
क्या कहते हो,क्या लिखूँगा ?
तुम मूर्ख हो इतना भी नहीं मालूम
क्या लिखा है इससे ज्यादा ज़रूरी है
किस पर लिखा है,कब लिखा है,क्यों लिखा है ?
मैंने तय कर लिया है
लिखूँगा धारा के साथ
लहर से खेलते हुए
भँवर और तूफ़ान से बचते
नदी के किनारे-किनारे
कीचड़ से मिलते हुए
लिखूँगा बाढ़ और प्रलय के गीत
मनु और शतरूपा को ठेंगा दिखाते हुए
हँसूँगा विजन में सिंह की दहाड़ से डरे पशुओं पर
और छाप दूँगा उन्हें अपनी कविता के मुखपृष्ठ पर
कलम से क्रांति की अगुवाई करूँगा
करूँगा कुटम्मस एक-एक कर उनकी
जिन्होंने किया था दरकिनार मुझे
किताब लिखकर साहित्य से और उनसे
ले लूँगा बदला,भले कुछ हो जाए
क्योंकि किताब लिखने से
उसके छपने-बिकने से ही

हम लेखक बनने वाले हैं
अच्छे दिन आने वाले हैं !

26 मार्च 2014

लहर जो सुनामी बन रही है !


बहुत ज़ोरदार लहर चल रही है। रास्ते में जो भी कूड़ा-करकट या उपयोगी-अनुपयोगी सामान मिल रहा है,वह सबको लपेट रही है। बड़े ही निर्विकार भाव की लहर है। अपने-पराये में कोई भेद नहीं कर रही है। सत्ता कितनी निर्मम और कितनी दयालु हो सकती है,यह लहर बता रही है। शिखर पर पहुँचने में कई निरीह कुचले जाते हैं पर इतिहास में उनका कोई नाम नहीं होता। इतिहास उन्हीं का लिखा जाता है जो शिखर पर काबिज होते हैं। अब यह महत्वपूर्ण नहीं है कि शीर्ष पर कैसे पहुँचा जाता है । इतिहास उन्हीं का गुणगान करता है जो अपनी तरह से नया इतिहास बनाते हैं। ऐसे में यह लहर इतिहास बना रही है। इससे बचना असम्भव है। हवा लहर का साथ बखूबी दे रही है।अंत तक लहर हवा हो जाए,बिना इसका विचार किये भी।

मठ के मठ उजड़ रहे हैं।दूसरे,तीसरे,चौथे सभी खम्भे ढह रहे हैं। कलम से क्रांति करने वालों के हाथों में  अब फूल खिल रहे हैं। लहर ने सबको प्रभावित किया है।देश सेवा के लिए अब जज्बे की नहीं उन्माद की ज़रूरत है।फ़िलहाल, दो ही विकल्प बचे हैं;या तो आप लहर के साथ बह जाइये या प्रतिरोध करके किनारे लग जाइये। लहर के साथ बहने वालों को विश्वास है कि वे ही असल किनारे तक पहुँचेंगे और उन्हें ही सीप के मोती मिलेंगे। अगर इस लहर में चूक गए तो ऐसे लोग वैतरणी पार करने का सुनहरा मौका गँवा देंगे। फ़िर उनको मोक्ष की प्राप्ति कैसे होगी ? इसलिए सबकी चाहत और नज़रें मोक्ष नगरी काशी पर ही टिकी हुई हैं।कुछ लोगों ने अभी तक जो पढ़ा था या दूसरों को समझाया था,वो सब अकारथ निकला। किताबी-उसूलों के बूते तो सारी ज़िन्दगी वृथा हो जायेगी। यह बात उनकी भोली आत्मा भी समझ गई है। अब जज्बात या दिल से नहीं,बल्कि दिमाग से सोचने का समय है। जो दिल,आत्मा,उसूल जैसी फ़िज़ूल चीजों को गले लगाये बैठे हैं,वे ही मुख्य धारा से बाहर हैं,किनारे हैं।

लहर की खासियत है कि वह अनियंत्रित होती है। उस पर कोई अनुशासन नहीं आयद होता। वह तेज हवाओं और आँधियों के साथ मिलकर कब सुनामी बन जाए ,पता नहीं। एक सामान्य लहर निर्माण या सृजन के लिए पथ-प्रशस्त कर सकती है पर सुनामी बन जाने पर केवल और केवल विध्वंस करती है। इसे बाहर से बैठकर देखने वाले सबसे पहले उसकी चपेट में आते हैं। फ़िलहाल,इस लहर से कबीर,बिस्मिल्ला और तुलसी बिलकुल किनारे लग गए हैं। बनारस में भूतभावन महादेव अपने लिए नया ठिकाना और नए भक्त खोज रहे हैं। भक्त अपने नए ईश्वर को पाकर आह्लादित हैं.उनको लगता है,उनके सारे दुःख हरने की क्षमता उसी में है.नया ईश्वर लहरों पर सवार होकर आ रहा है पर उसे अपने ही भक्तों पर भरोसा नहीं है,इसलिए उसने अपने बचने का विकल्प भी खोज लिया है.

लहर तगड़ी है फ़िर भी सुरक्षित कोना ढूँढ रही है.उसे पता है कि लहर से टकराने की हिम्मत किसी में नहीं है।यदि कोई ऐसी हिमाकत करता है तो उसे अंडे और पत्थर खाने का हुनर आना चाहिए।दाग से लड़ने के लिए दागी होना ज़रूरी है,इसलिए हवा में स्याह रंग भी ख़ूब उड़ाया जा रहा है।ऐसे में आम आदमी के पास लहर के साथ बह जाने,सुनामी में डूब जाने या कल्पना-समुद्र में गोता लगाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.फ़िलहाल,वह मैली हुई गंगा में दो-चार डुबकी लगाकर लहर के बीत जाने का इंतज़ार कर रहा है. 

27/03/2014 को जनवाणी में,जनसत्ता में 21/04/2014 को 

5 अगस्त 2012

संयुक्त-राष्ट्र चले जाओ जी !


जब से देश की राजनीति से लालू-तत्व नदारद हुआ है,हमें ठठाकर हँसने का मौका शायद ही मिला हो. लगता है कि इस बात को हमारी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने समझा है,तभी हमें पिछले कुछ दिनों से ज़ोरदार हँसी का अहसास कराया जा रहा है.सबसे मौलिक और सुखद अनुभूति हमारे कानून मंत्री ने कराई है.अन्ना टीम द्वारा लोकपाल की माँग पर उन्होंने सीधे और निष्कपट भाव से यह कहा कि भइया,इस बारे में अगर कुछ करना ही चाहते हो तो ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ चले जाओ,हम आपकी और सेवा नहीं कर सकते.सच पूछिए,इस बयान की साफ़गोई से हम तो बिलकुल गदगद हुए जा रहे हैं.

वैसे हम सबको आनंद प्रदान करने की यह इनकी पहली कोशिश नहीं है.इससे पहले उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में ये अपनी ज़ोरदार उपस्थिति दर्ज़ करा चुके हैं.तब हमें हंसाने के लिए ये खुद रोने लगे थे और सुबकते हुए बोले थे कि बाटला कांड को सुनकर उनकी नेता भी ऐसे ही जार-जार रोई थीं.हमें तो लगता है कि उनकी इस बात से इनकी पार्टी के समर्थक इतना दुखी हो गए कि वे वोट डालना ही भूल गए.फ़िर भी,अपने नुकसान की क़ीमत पर अगर इनका ज़ज्बा क़ायम है तो यह बड़ी बात है.

इस सरकार को महंगाई से इतना दुःख है कि वो लगातार हमें हंसाने और खुश रखने का प्रयास कर रही है.समय-समय पर इसके सहयोगी दल भी इस काम में अपना भरपूर सहयोग दे रहे हैं,पर मुख्य सत्ता दल होने के नाते कांग्रेस अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहती.इसलिए उसके एक और मंत्री ने अन्ना-टीम के आन्दोलन को ड्रामा करार देने में ज़्यादा समय नहीं लिया.उनका मतलब यही था कि ड्रामा होगा तभी तो जनता का मनोरंजन होगा.वे भी यही चाहते हैं कि जनता ड्रामा देखती रहे और बाकी चीज़ें भूल जाय.

अभी लगातार दो दिन तक हमारे देश में बिजली के ग्रिड फेल हो गए ,तो अधिकतर हिस्से अँधेरे में ही मगन थे.बिजली मंत्री ने उन्हें यह कहकर खुश कर दिया कि इसी तरह के हालात से अमेरिका भी जूझा है और उसे उबरने में तो चार दिन लगे थे,जबकि हमने यह कमाल सिर्फ दस घंटे में ही कर दिखाया है.सरकार ने भी उनकी बात और उनके काम को गंभीरता से लिया और तुरत ही पदोन्नति के आदेश दे दिए.सुनते हैं कि मंत्रीजी ने भी नए मंत्रालय को सँभालने से पहले ही अमेरिका में हुई कई ऐसी घटनाओं का रिकॉर्ड तलब कर लिया है ताकि समय आने पर वे उनकी नज़ीर देकर हमारा मनोरंजन कर सकें.

हम तो कहते हैं कि बिजली नहीं है,पानी नहीं है,सड़क नहीं है तो बेखटके हम सबको संयुक्त राष्ट्र की शरण में जाना चाहिए क्योंकि वो भी समझदार है कि हमारी सरकार का मुखिया कितना लाचार है.अब जब तक राहुल बाबा का आगमन नहीं होता,लोकपाल तो छोड़ो, हमें हर ऐसे काम के लिए अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र का मुँह देखना पड़ेगा.इससे हमारी पीर भी कम होगी और सरकार की भी.पर,यह भी हो सकता है कि ऐसा करते-करते हमारी इतनी आदत पड़ जाय और आगामी चुनावों में भी हम वोट मांगने वालों से कह दें कि भइया,आप भी संयुक्त राष्ट्र चले जाओ,वोट भी वही देगा,तब कैसा रहेगा ? कभी उनको भी तो हँसने का मौका हमें देना चाहिए कि नहीं..?


8 जनवरी 2012

ई पवित्र होने का मौसम है भाई !


कुहरा और बरसात के मारे हम आज चौपाल मा तनिक देर से पहुँचे। जाते ही बदलू काका ने हमें घेर लिया और लगा दी झड़ी सवालों की। "सुने हो मास्टर जी ! ई भाजपा को का होइ गवा है ? अभी कुछ रोज पहिले तक यहिके नेता लोग अन्ना बाबा के गुन गावत फिरत रहे। अब सब भूलि गए का ?" मैंने लगभग अनजान बनते हुए पूछ ही लिया , "काका ! काहे इत्ता परेशान हौ ? का बात है ?" काका फुल जोश में बोले जा रहे थे, "ई बसपा के नेता हाल-फ़िलहाल तक बहिनजी के साथ मलाई पर हाथ साफ कर रहे थे, खूब लूट-लाट मचाई और इहाँ तक कि कुछ लोगन का टपकाय भी दिहेन पर अब भाजपा में शामिल होइ के अगड़ा-पिछड़ा और अन्याव का रोना रो रहे हैं। सबसे मजेदार बात तौ यह है कि भाजपा वाले कहि रहे हैं कि ऊ कुच्छौ गलत नाहीं किये हैं।"

मैंने उन्हें सांत्वना देने की कोशिश करते हुए समझाया ,"काका ! अब जमाना काफ़ी बदल चुका है और राजनीति भी। जब डाकू रत्नाकर अपना मन बदल कर महर्षि वाल्मीकि बन सकते हैं, हिन्दुओं का बड़ा ग्रन्थ लिख सकते हैं तो ये छोटे-मोटे धंधे करके अपने परिवार का पेट पालने वाले नेता क्यों नहीं बदल सकते ? इनके बदलने से अगर कोई पार्टी शुद्ध हो रही हो , सत्ता के नजदीक आकर लोगों की सेवा के लिए बेताब हो तो इसमें हर्ज़ ही क्या है ?"







काका मेरी बात से मुतमईन न लगे। मैंने उन्हें और पौराणिक उदाहरण  दिए। काका सुनो, "जब भगवान राम को लंका में बुराई पर अच्छाई की जीत चाहिए थी तो उन्होंने विभीषण को अपनी ओर मिलाया ताकि बुराई को ख़त्म करने में मदद मिल सके। अब वही काम राम के भक्तों वाली पार्टी कर रही है तो यह एक आदर्श स्थापित हो रहा है। आप नाहक परेशान हैं। इस पार्टी के लोगों ने यह भी कहा है कि उनके यहाँ जो भी आता है,पवित्र हो जाता है,बिलकुल पतितपावनी गंगा की तरह !"

काका ने फिर प्रतिवाद किया, "अभी दो दिन पहले ये सब संसद में हंगामा मचाय रहे कि मज़बूत लोकपाल लाना बहुतै ज़रूरी है और अन्ना बाबा का हमरा फुल सपोट है,तो उसका क्या ?" हमने कहा, "काका ! ई लोकपाल तो तभी जाँच करेगा न , जब कोई घपला-घोटाला होगा। सो, उसकी उपयोगिता को प्रमाणित करने के लिए पहले कुशल भ्रष्टाचारियों की भर्ती भी तो ज़रूरी है। बाद में जाँच शुरू होते ही वे उन्हें हटाकर डंके की चोट पर पाक-साफ भी बन जायेंगे। आखिर पार्टी विद डिफरेंट भी तो दिखना ज़रूरी है। जो भी सेवा कार्य या देश हित करना है, वह सत्ता में आये बिना कैसे हो सकता है ? सो, कुर्सी के लिए थोड़ा एडजस्टमेंट करने मा का बुराई है ?" 




अब तक बदलू काका हमारी बातों से सहमत हो गए लग रहे थे, हम फिर से मिलने का वादा करके घर चले आए क्योंकि शाम के समाचारों में क्या पता ...... कोई फिर पवित्र हो गया हो ?

6 सितंबर 2011

मैं शक्ति हूँ !



मैं शक्ति हूँ !

मुझमें अपार ऊर्जा समाहित है
असीमित संसाधन हैं मेरे पास 
हर अस्त्र से सुसज्जित हूँ मैं
हर वार का प्रत्युत्तर हूँ !

मेरी शक्तियाँ अखंड और प्रचंड हैं
मैं निरंतर और सनातन हूँ !
संविधान द्वारा प्रदत्त 
सारी शक्तियाँ मेरी हैं
मैं ही संघ हूँ,गण हूँ,तंत्र हूँ !
किसी और संघ का निषेध है मेरे रहते 
अपने आप में अद्वितीय हूँ,अविकल्प हूँ
हर किसी से गुरुतर हूँ !

मैं गाँधी हूँ,जेपी हूँ
आदर्श हूँ,परिपाटी हूँ !
महात्मा और दुरात्मा की 
पहचान है मुझमें,
किसको पाठ पढ़ाना है 
किसको गले लगाना है,
इसके लिए खुली आँख से देखता हूँ
फिर बंद कर लेता हूँ !

शिव का तीसरा नेत्र 
जब चाहूं खोल सकता हूँ,
जनतंत्र और सभ्य-समाज को
सच्चा जीवन-दर्शन देता हूँ !
कुछ आसुरी प्रवृत्तियाँ 
हर युग में होती हैं,
इसीलिए शक्ति का अवतार 
सुनिश्चित कर रखा है मैंने ,
अस्तु मैं निर्भय हूँ !

मैं सर्वत्र हूँ,सदा हूँ
मैं ईश्वर हूँ,ख़ुदा हूँ !
अनादिकाल से प्रवाहित हूँ मैं
अथाह हूँ,प्रशांत हूँ !
इसलिए निशंक रहो,
मेरी सत्ता अक्षुण है,
अपराजेय है,चिरकालिक है
मैं विध्वंश हूँ,महाकाल हूँ !
हुँकार हूँ,ललकार हूँ मैं,
प्रतिशोध हूँ,अधिकार हूँ !

मैं शक्ति हूँ !
मुझमें भक्ति रखो
असीमित सुख भोगोगे ,मोदक खाओगे !
भटकोगे तो त्रस्त और संताप मिलेगा,
हर अपराध तुम्हारे माथे होगा, 
हर सुख से तुम वंचित होगे !
मैं समय हूँ,सत्य हूँ
शक्ति हूँ !!



1 जून 2011

यदि मैं नेता होता !

अच्छा होता ,अच्छा होता
भइया ,यदि मैं नेता होता !

मैं कुछ भी कहता,बक देता
साभार:गूगल बाबा
जो भी चाहे कर लेता,
कहे हुए की माफ़ी मिलती
ज़िम्मेदारी से बच जाता,
यारों, यदि मैं नेता होता।

लोक-लुभावन वादे करता
भड़काऊ भाषण दे लेता
शपथ-पत्र देकर बच जाता
फिर भी नाम कमा जाता,
लेकिन यदि मैं नेता होता !

पाँच साल तक वादे करता
मीठी-मीठी गोली देता
रोज़ी-रोटी भाड़ में जाए
धर्म-जाति की टॉनिक देता
जेल पहुँचना अच्छा होता ,
सबका यदि मैं नेता होता !

जेल,ज़मानत आदत पड़ती
सत्ता फिर भी हमको मिलती
जनता डरती,जेबें भरती
जिस भी दल में शामिल होता
ये सब कुछ 'कानूनी' होता
भइया,यदि मैं नेता होता !

टूजी -सूजी सब खा जाता,
'कामन-वेल्थ ' हड़प कर जाता,
काला-धन बाहर पहुँचाता ,
 हंसी-खुशी मैं तिहाड़ जाता,
'फर्स्ट-क्लास ' सुविधाएँ पाता,

भइया  ,यदि मैं नेता होता !



विशेष :संशोधित संस्करण (पहला १८-०४-२००९ )








10 अप्रैल 2011

एक खत अपनों के नाम !

हर भेष में,हर देश में !
अन्ना हजारे के अनशन से खुश होने वालों से मैं एक बात कहना चाहता हूँ कि उन्हें ज़्यादा खुशी जताने या फुदकने की ज़रूरत नहीं है.ऐसे लोगों की संख्या उँगलियों में गिनने लायक है जो किरण बेदी या अरविन्द केजरीवाल के बहकावे में आ गए हैं.दर-असल उन्हें हमारी ताकत और एकजुटता,प्रतिबद्धता का रंचमात्र अनुमान नहीं है.हम अपनी बिरादरी को आश्वस्त करते हैं कि उन्हें तनिक भी घबडाने की ज़रूरत नहीं है.अपनी आबादी के आगे ये मुट्ठीभर लोग क्या कर लेंगे?

हम लोग पिछले पचास-साठ सालों से यूँ ही  भाड़ नहीं झोंक रहे हैं .हमने अपनी ताकत में लगातार इजाफा किया है.अपने लोगन क हम तनी अपनी बोली मा समझाय देइ कि हमैं संगठन के लोग हर दल,हर कोनवा और हर ठीहे पे मिल जइहैं .सबते बड़ी बात या है कि हर सरकार मा हमरी साझेदारी है !यहिते अन्ना के अनशन ते घबड़ाय के तनिकौ ज़रूरत ना है !

हम लोग बीते सालों में समाज में इतने घुल-मिल गए हैं कि दूसरी प्रजाति लुप्त होने की कगार पर है.उसी प्रजाति के बचे-खुचे लोग अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं.एक बात यह भी है कि ऐसे कुछ लोग मौका पाते ही हमारी बिरादरी में शामिल हो जाते हैं .इसलिए भी अपने अस्तित्व और भविष्य की चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि हमारे आका लोग अपनों को बचाने के लिए इस बिल में भी छेद कर देंगे !हमें अपने काम को थोड़ा सतर्कता और होशियारी से करना पड़ेगा .कुछ दिन तक पुरानी दर पर ही काम करना पड़ सकता है,इसलिए बाल-बच्चों को थोड़ा तकलीफ हो सकती है !

इसलिए आखिरी जश्न तो हम ही मनाएंगे और फिर इस बिल को तो अभी पास भी तो होना है.इसमें पलीता लगाने की कोई न कोई तरकीब ज़रूर निकल आयेगी !हम लोग इसलिए भी चिंतित नहीं हैं क्योंकि कानून तो पहले के भी कोई कम नहीं बने हैं.हमारी बिरादरी बिंदास होकर अपना काम करे,ये थोड़े समय का बुलबुला है,जल्द ही  पिचक जायेगा !

और हाँ,तब तक अन्ना हजारे जी के हर कार्यक्रम में आप सब लोग ढोल-नगाड़े लेकर अपनी उपस्थिति अवश्य दर्ज कराते रहें !

8 नवंबर 2010

ओबामा जी आए हैं !

ओबामा जी आए हैं,ओबामा जी आए हैं ,
हम सब उनको  ताक रहे हैं
हमरी  ख़ातिर  का लाए हैं ?

पर ऊ तो निकले बड़े शिकारी
आए करने हमको ख़ाली,
हमको तो झुनझुना दे दिया
सरका दी पड़ोस में थाली !

ओबामा जी आए हैं,ओबामा जी आए हैं !

उनके स्वागत में तो हमने
सारी 'लाल-दरी' बिछवा  दी,
बदले में कोरे वादे पाए,
ख़ुद कर ली अपनी बर्बादी !

कब तक मुँह ताकेंगे उनका
स्वाभिमान कब सीखेंगे ?
घिसट-घिसट कर चलना छोड़ें
तभी विश्व के साथ बढ़ेंगे !

ओबामा जी आए हैं,ओबामा जी आए हैं !

28 जून 2010

कहाँ है महँगाई ?

इस समय देश भर का मीडिया इन ख़बरों से अटा पड़ा है कि महँगाई मारे डाल रही है ,पर अपुन की समझ में नहीं आ रहा है कि ये महँगाई आख़िर है कहाँ ?यह बात तब और साफ़ हो जाती है जब सरकार का कोई पढ़ा-लिखा (खाया-अघाया) बाबू अख़बारों में बक़ायदा विज्ञापन छपवाकर साबित कर देता है कि अभी तो महँगाई कोसों दूर है!अज़ी ज़नाब,पाकिस्तान,लंका,भूटान,बांग्लादेश आदि को देखिये ,उनसे तो हम अभी बालिश्त भर नीचे हैं! यह तो ग़नीमत है कि उस बाबू ने हत्या,आतंक,लूट-पाट और भ्रष्टाचार के आंकड़े नहीं दिखाए नहीं तो हम उनमें भी अव्वल निकलते !
भई, पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बाज़ार-भरोसे सरकार ने अभी किया है,पर यह देश तो पता नहीं कब से बाज़ार के ही भरोसे चल रहा है!आम आदमी की इस बाज़ार में एक ख़रीदार की हैसियत न होकर बेकार और खोटे सिक्के की तरह रह गयी है और उसे चुनाव के पहले तालियाँ पीटने और चुनाव बाद पेट बजाने का सम्मान-जनक काम मिला हुआ है ।
ख़र्चे तो हमारे माननीयों के होते हैं,मेहमान भी उन्हीं के होते है और जितने सारे पकवान हैं उनमें उन्हीं का नाम लिखा है,इसलिए यदि वे अपना 'मेहनताना' बढ़ाने की बात करते हैं तो यह बिलकुल ज़ायज है और अपनी सरकार अब इतनी भी निर्दयी नहीं है कि उनकी फ़रियाद न सुने !
रही बात 'कामनवेल्थ' के खेलों को लेकर हल्ला मचाने की,तो अपना देश 'अतिथि देवो भव' की परिपाटी पर चल रहा है और इसके लिए हम चाहे कंगाल हो जाएँ पर हमारे मेहमानों को लगना चाहिए कि हम भूखे-नंगे नहीं हैं ,इसीलिये दस दिनों के मेहमानों के लिए पूरी तिज़ोरी खोल दी गयी है,और जो यहाँ हमेशा रहते हैं उनके लिए दरी झाड़ दी गयी है!

इसलिए,महँगाई हमारी सोच में है,वास्तव में ऐसा है नहीं.

14 मार्च 2010

बाबाओं के पीछे क्यों !

आजकल बाबाओं के चर्चे अखबारों ,चैनलों और आम आदमी की ज़ुबान पर खूब हो रहे हैं। मैं यह पूछना चाहता हूँ कि बाबाओं ने ऐसा कौन सा अपराध कर दिया है जिसके लिए लोग उनके पीछे लट्ठ ले के पड़े हैं।
भई,आज के बाबा हमारे ही समाज के अंग हैं,इसी से निकले हैं और अगर इसी में रम रहे हैं तो क्या बुरा है ?जिस समाज में जो रहता है तो उसको वैसा ही रहना पड़ता है नहीं तो वह इससे अलग-थलग नहीं पड़ जायेगा !जिस तेजी से हम सब आधुनिकता की दौड़ में भाग रहे हैं ,उसमें हमें कुछ भी साधन अपना लेना बुरा नहीं लगता है। आज नैतिकता और चरित्र की बातें करने और सुनने वाले दोनों भूखे मरेंगे,तो क्योंकर कोई ऐसा 'बेहूदा 'और लम्बा रास्ता अपनाये ?पैसे बनाने के खेल में जब समाज का हर तबका(नौकरीपेशा,राजनेता,चौथा स्तम्भ ,पुलिस,कार्यपालिका,न्यायपालिका,साहित्यकार,कलाकार)लगा हो तो केवल बाबाओं से उच्च नैतिक व सतयुगी मानदंडों की अपेक्षा करना क्या न्यायसंगत है ?

मुझे अपने बचपन की याद आती है,जब हमारे गाँव में वर्ष में एक-दो बार साधुओं का आगमन होता था। कई बार तो वे मेरे यहाँ भी आकर व्यक्तिगत ढंग से ठहरते थे या कुछ अन्य लोगों के यहाँ। मेरी भागीदारी समान रूप से हर जगह होती थी क्योंकि मुझे ,पता नहीं किन कारणों से सत्संग प्रिय था। शाम को कई बार साधुओं द्वारा कीर्तन-प्रवचन होता था जिसमें भारी संख्या में लोग शामिल होते थे। तब उनके लिए खान-पान की यथा-संभव व्यवस्था होती थी तथा विदाई के वक़्त मामूली-सी दक्षिणा।

अब आज के बाबाओं की कार्यशैली देखो तो पांच-सितारा सुविधाएँ भी फीकी लगेंगी। कहीं भी प्रवचन या सत्संग का कार्यक्रम हो तो बाबा के चेले पूरा ठेका लेके आयेंगे और यदि लेन-देन में कमी-बेसी हो जाए तो खूँटा गाड़ने से पहले ही वे अपना तम्बू उखाड़ लेंगे !वहाँ जाना भी आम आदमी के वश में नहीं होता । उनके प्रवचन की शुरूआती 'दक्षिणा' ही ५०० रुपये से शुरू होती है।

अब ऐसे कर्म-धर्म वाले बाबाओं से क्या उम्मीद रखी जाये? वे तो ईश्वर के बजाय अपने चित्रों,पत्रिकाओं का प्रचार-प्रसार करने में ही लगे रहते हैं इससे नाम और दाम दोनों मिल जाते हैं। इसलिए उन पर प्रहार करने वाले इसके स्रोत को भी देखें यदि वे इस बीमारी से मुक्त हों !

25 जनवरी 2010

थप्पड़ मारा ,क्या बुरा किया ?

अभी कुछ रोज़ पहले एक खबर टी वी चैनेलों ने खूब दिखाई कि लखनऊ में डी एम साहेब ने एक 'अदने' से कर्मचारी को थप्पड़ रसीद कर दिया है ! इस खबर को भाई लोग बेकार में ही रबड़ की तरह खींच रहे हैं। अरे भाई ,कहाँ अपने आदरणीय डी एम साहेब और कहाँ वह अदना सा कर्मचारी ? यह तो उस कर्मचारी का सौभाग्य कहिये कि इतने ऊंचे ओहदे वाले ने उसका 'स्पर्श' किया है,नहीं तो यहाँ गरीबों के पास जाने की फ़ुरसत आज किसे है? ओहदे-दार आदमी का काम ही है की वह अपनी शान को हर हाल में क़ायम रखे और आम आदमी का यह कर्तव्य है कि वह उसकी शान बढ़ाने के लिए अपना सारा सम्मान लगा दे !
फिर , कुछ नया भी तो नहीं हुआ है उत्तर प्रदेश में। माया मेमसाब ने एक बार निरीक्षण के दौरान एक डी एम साहेब को थप्पड़ जड़ दिया था।तो भाई,कही न कहीं रूतबा तो 'काउंट' करता है। हो सकता है कि इन डी एम साहेब ने यहीं से प्रेरणा ली हो। अब सरकार के खिलाफ़ कोई बोलेगा तो या तो उसका घर जलेगा या थप्पड़ खायेगा। इसमें चिल्ल-पों मचाने की क्या ज़रुरत है? जिसके पास जो होता है ,वही तो वह दूसरे को देता है। अब डी एम साहेब ने इसलिए थोड़े ही पढ़ाई की थी कि उनके काम में कोई टोका-टाकी करे, तभी तो सुनते हैं कि थप्पड़ मारने वाले को पदोन्नति मिलने जा रही है और अपना 'राम प्रकाश ' (आम आदमी) थप्पड़ खाकर ज़ेल के दर्शन कर आया है। जुग-जुग जीवे ऐसी सर्वजन समाज सरकार !