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26 मार्च 2014

लहर जो सुनामी बन रही है !


बहुत ज़ोरदार लहर चल रही है। रास्ते में जो भी कूड़ा-करकट या उपयोगी-अनुपयोगी सामान मिल रहा है,वह सबको लपेट रही है। बड़े ही निर्विकार भाव की लहर है। अपने-पराये में कोई भेद नहीं कर रही है। सत्ता कितनी निर्मम और कितनी दयालु हो सकती है,यह लहर बता रही है। शिखर पर पहुँचने में कई निरीह कुचले जाते हैं पर इतिहास में उनका कोई नाम नहीं होता। इतिहास उन्हीं का लिखा जाता है जो शिखर पर काबिज होते हैं। अब यह महत्वपूर्ण नहीं है कि शीर्ष पर कैसे पहुँचा जाता है । इतिहास उन्हीं का गुणगान करता है जो अपनी तरह से नया इतिहास बनाते हैं। ऐसे में यह लहर इतिहास बना रही है। इससे बचना असम्भव है। हवा लहर का साथ बखूबी दे रही है।अंत तक लहर हवा हो जाए,बिना इसका विचार किये भी।

मठ के मठ उजड़ रहे हैं।दूसरे,तीसरे,चौथे सभी खम्भे ढह रहे हैं। कलम से क्रांति करने वालों के हाथों में  अब फूल खिल रहे हैं। लहर ने सबको प्रभावित किया है।देश सेवा के लिए अब जज्बे की नहीं उन्माद की ज़रूरत है।फ़िलहाल, दो ही विकल्प बचे हैं;या तो आप लहर के साथ बह जाइये या प्रतिरोध करके किनारे लग जाइये। लहर के साथ बहने वालों को विश्वास है कि वे ही असल किनारे तक पहुँचेंगे और उन्हें ही सीप के मोती मिलेंगे। अगर इस लहर में चूक गए तो ऐसे लोग वैतरणी पार करने का सुनहरा मौका गँवा देंगे। फ़िर उनको मोक्ष की प्राप्ति कैसे होगी ? इसलिए सबकी चाहत और नज़रें मोक्ष नगरी काशी पर ही टिकी हुई हैं।कुछ लोगों ने अभी तक जो पढ़ा था या दूसरों को समझाया था,वो सब अकारथ निकला। किताबी-उसूलों के बूते तो सारी ज़िन्दगी वृथा हो जायेगी। यह बात उनकी भोली आत्मा भी समझ गई है। अब जज्बात या दिल से नहीं,बल्कि दिमाग से सोचने का समय है। जो दिल,आत्मा,उसूल जैसी फ़िज़ूल चीजों को गले लगाये बैठे हैं,वे ही मुख्य धारा से बाहर हैं,किनारे हैं।

लहर की खासियत है कि वह अनियंत्रित होती है। उस पर कोई अनुशासन नहीं आयद होता। वह तेज हवाओं और आँधियों के साथ मिलकर कब सुनामी बन जाए ,पता नहीं। एक सामान्य लहर निर्माण या सृजन के लिए पथ-प्रशस्त कर सकती है पर सुनामी बन जाने पर केवल और केवल विध्वंस करती है। इसे बाहर से बैठकर देखने वाले सबसे पहले उसकी चपेट में आते हैं। फ़िलहाल,इस लहर से कबीर,बिस्मिल्ला और तुलसी बिलकुल किनारे लग गए हैं। बनारस में भूतभावन महादेव अपने लिए नया ठिकाना और नए भक्त खोज रहे हैं। भक्त अपने नए ईश्वर को पाकर आह्लादित हैं.उनको लगता है,उनके सारे दुःख हरने की क्षमता उसी में है.नया ईश्वर लहरों पर सवार होकर आ रहा है पर उसे अपने ही भक्तों पर भरोसा नहीं है,इसलिए उसने अपने बचने का विकल्प भी खोज लिया है.

लहर तगड़ी है फ़िर भी सुरक्षित कोना ढूँढ रही है.उसे पता है कि लहर से टकराने की हिम्मत किसी में नहीं है।यदि कोई ऐसी हिमाकत करता है तो उसे अंडे और पत्थर खाने का हुनर आना चाहिए।दाग से लड़ने के लिए दागी होना ज़रूरी है,इसलिए हवा में स्याह रंग भी ख़ूब उड़ाया जा रहा है।ऐसे में आम आदमी के पास लहर के साथ बह जाने,सुनामी में डूब जाने या कल्पना-समुद्र में गोता लगाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.फ़िलहाल,वह मैली हुई गंगा में दो-चार डुबकी लगाकर लहर के बीत जाने का इंतज़ार कर रहा है. 

27/03/2014 को जनवाणी में,जनसत्ता में 21/04/2014 को 

16 सितंबर 2013

मोदी बनाम अडवाणी

मोदी के सर ताज है,अडवाणी कंगाल।
खुद का बोया काटते,काहे करें मलाल ?
काहे करें मलाल,बताया जिन्ना सेकुलर।
तिकड़म  सब बेकार, रहे ना हिन्दू कट्टर।
अब काहे रिरियांय,फसल जो पहले बो दी।
कट्टरता का खेत, काटने आए मोदी।।

 

8 जनवरी 2012

ई पवित्र होने का मौसम है भाई !


कुहरा और बरसात के मारे हम आज चौपाल मा तनिक देर से पहुँचे। जाते ही बदलू काका ने हमें घेर लिया और लगा दी झड़ी सवालों की। "सुने हो मास्टर जी ! ई भाजपा को का होइ गवा है ? अभी कुछ रोज पहिले तक यहिके नेता लोग अन्ना बाबा के गुन गावत फिरत रहे। अब सब भूलि गए का ?" मैंने लगभग अनजान बनते हुए पूछ ही लिया , "काका ! काहे इत्ता परेशान हौ ? का बात है ?" काका फुल जोश में बोले जा रहे थे, "ई बसपा के नेता हाल-फ़िलहाल तक बहिनजी के साथ मलाई पर हाथ साफ कर रहे थे, खूब लूट-लाट मचाई और इहाँ तक कि कुछ लोगन का टपकाय भी दिहेन पर अब भाजपा में शामिल होइ के अगड़ा-पिछड़ा और अन्याव का रोना रो रहे हैं। सबसे मजेदार बात तौ यह है कि भाजपा वाले कहि रहे हैं कि ऊ कुच्छौ गलत नाहीं किये हैं।"

मैंने उन्हें सांत्वना देने की कोशिश करते हुए समझाया ,"काका ! अब जमाना काफ़ी बदल चुका है और राजनीति भी। जब डाकू रत्नाकर अपना मन बदल कर महर्षि वाल्मीकि बन सकते हैं, हिन्दुओं का बड़ा ग्रन्थ लिख सकते हैं तो ये छोटे-मोटे धंधे करके अपने परिवार का पेट पालने वाले नेता क्यों नहीं बदल सकते ? इनके बदलने से अगर कोई पार्टी शुद्ध हो रही हो , सत्ता के नजदीक आकर लोगों की सेवा के लिए बेताब हो तो इसमें हर्ज़ ही क्या है ?"







काका मेरी बात से मुतमईन न लगे। मैंने उन्हें और पौराणिक उदाहरण  दिए। काका सुनो, "जब भगवान राम को लंका में बुराई पर अच्छाई की जीत चाहिए थी तो उन्होंने विभीषण को अपनी ओर मिलाया ताकि बुराई को ख़त्म करने में मदद मिल सके। अब वही काम राम के भक्तों वाली पार्टी कर रही है तो यह एक आदर्श स्थापित हो रहा है। आप नाहक परेशान हैं। इस पार्टी के लोगों ने यह भी कहा है कि उनके यहाँ जो भी आता है,पवित्र हो जाता है,बिलकुल पतितपावनी गंगा की तरह !"

काका ने फिर प्रतिवाद किया, "अभी दो दिन पहले ये सब संसद में हंगामा मचाय रहे कि मज़बूत लोकपाल लाना बहुतै ज़रूरी है और अन्ना बाबा का हमरा फुल सपोट है,तो उसका क्या ?" हमने कहा, "काका ! ई लोकपाल तो तभी जाँच करेगा न , जब कोई घपला-घोटाला होगा। सो, उसकी उपयोगिता को प्रमाणित करने के लिए पहले कुशल भ्रष्टाचारियों की भर्ती भी तो ज़रूरी है। बाद में जाँच शुरू होते ही वे उन्हें हटाकर डंके की चोट पर पाक-साफ भी बन जायेंगे। आखिर पार्टी विद डिफरेंट भी तो दिखना ज़रूरी है। जो भी सेवा कार्य या देश हित करना है, वह सत्ता में आये बिना कैसे हो सकता है ? सो, कुर्सी के लिए थोड़ा एडजस्टमेंट करने मा का बुराई है ?" 




अब तक बदलू काका हमारी बातों से सहमत हो गए लग रहे थे, हम फिर से मिलने का वादा करके घर चले आए क्योंकि शाम के समाचारों में क्या पता ...... कोई फिर पवित्र हो गया हो ?

21 दिसंबर 2009

रावन रथी, बिरथ रघुबीरा !

भारतीय जनता पार्टी इन दिनों संक्रमण काल से गुजर रही है। संघ के तथाकथित निर्देशों के तहत 'दुनिया' को दिखाने के लिए कुछ चेहरे इधर से उधर किये गए हैं,पर इससे इसका कायाकल्प हो जायेगा, यह सोचना फ़िज़ूल है। पार्टी के सर्वोपरि नेता आडवाणी जी अपने क्रियाकलाप से लगातार इसकी जड़ों में मट्ठा डालने का काम कर रहे हैं। कितना हास्यास्पद लगता है उनका यह कहना कि वे रथी हैं और रथ से नहीं उतरेंगे,ना ही उनका अभी संन्यास लेने का इरादा है! उनके इस कथन के निहितार्थ हम इस तरह समझ सकते हैं:
वे अपने को रथी बता रहे हैं और रथ पर सवार होकर ही सत्ता-प्राप्ति के लिए विरोधियों से लड़ने को तैयार हैं,जबकि उन्हें यह पता होना चाहिए कि लोकतंत्र की लड़ाई रथ पर बैठे-बैठे नहीं जीती जाती बल्कि उसके लिए पैदल,नंगे पाँव चलकर,आम लोगों के बीच जाकर माटी और घाम सहना पड़ता है। आडवाणी जी अपने आराध्य श्री राम को भी यहाँ भूल जाते हैं ,जब उन्होंने बिना रथ के होकर रथ पर चढ़े हुए रावण के खिलाफ धर्मयुद्ध छेड़ा था।अब यहाँ क्या यह बताने की ज़रुरत है कि वे किसकी परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं?
रही बात उनके संन्यास न लेने की ,तो यह किसी का भी व्यक्तिगत फैसला हो सकता है,पर कोई भी राजनेता स्वेच्छा से संन्यास नहीं लेना चाहता है, उसे तो परिस्थितियां और जनता स्वयं संन्यास में पहुँचा देती है। सत्ता का मोह होता ही इतना भ्रामक है कि व्यक्ति मजबूर हो जाता है और इसका खामियाज़ा दूसरों को भुगतना पड़ता है।
भाजपा में शीर्ष में कुछ भी नहीं बदला है सिवाय कुछ 'नेमप्लेटों 'के इधर-उधर होने के! जब तक कार्यकर्ताओं के स्तर से बदलाव की बयार नहीं आती तब तक उनमें जोश के संचार की कामना व्यर्थ है। जिस मुखिया को पद-त्याग का उदाहरण पेश करना चाहिए वह रथ पर चढ़ा हुआ है और उससे मिलने के लिए किसी रथी को ही इज़ाजत है ,आम आदमी को नहीं !

28 अक्टूबर 2009

कोई डॉक्टर है क्या ?

अभी जल्दी में एक ख़बर आई कि अपनी राष्ट्रिय पार्टी ,भाजपा बीमार है,सुनकर बड़ा दुःख हुआ क्योंकि अपने को इस पार्टी से बेहद लगाव है। उसे क्या बीमारी है इस पर बाद में बात करते हैं ,सबसे पहले तो उसकी बीमारी पर हमारी चिंता तो जान लें !
अगर एक देशभक्त पार्टी जो शुचिता ,स्वराज और संस्कृति की बात करती है उसे कुछ हो गया तो हम जैसे लोगों का क्या होगा,हिंदू धर्म का क्या होगा और सबसे बढ़कर उस संकल्प का क्या होगा जो देश की सेवा के लिए इसने लिया हुआ है। देश को परिवारवाद और रोमन साम्राज्य से कौन बचायेगा,अयोध्या में राम-मन्दिर कैसे बन पायेगा और अगर अपना कोई जहाज तालिबानी पकड़ ले गए तो उन्हें जलेबी कौन पहुँचायेगा?
कहते हैं कि उसकी बीमारी की ख़बर अपने ही भागवत साहब ने बताई है साथ ही निदान भी दिया है कि यह बीमारी केवल शल्यक्रिया के द्वारा ही ठीक हो सकती है। अब यह देखने की बात है कि यह सर्जरी पूरे शरीर की होनी है या दिमाग की? हालाँकि राजनाथ जी ने पूछा भी है कि किसका दिमाग ख़राब है, तो एक तरह से उनने भी माना है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है ।
वैसे अपन जैसे कहने वाले बहुत पहले से कह रहे हैं कि पार्टी नहीं उसकी विचारधारा बीमार है पर सुनने वाला कोई नहीं है,उल्टे इसका इलाज़ नरेंद्र मोदी और आडवाणी जी से कराना चाह रही है जबकि सारी बीमारी कि जड़ यहीं है। जिन आडवाणी जी को अगले चुनावों के लिए अनफिट मान लिया गया हो उन्हीं को बेमन ढोते रहना कहाँ की समझदारी है? भाजपा का बीमार होना देश के लिए ठीक नहीं है और समय रहते पार्टी के लोगों द्वारा इसका इलाज़ कर लेना चाहिए नहीं तो जनता सही इलाज़ करना बखूबी जानती है !
इस उम्मीद के साथ कि भाजपा की तबियत जल्द सुधर जायेगी ,ढेर सारी सदिच्छाओं के साथ.....

8 अक्टूबर 2009

अटलजी का संदेश !

बहुत दिनों बाद अटलजी की तरफ़ से कोई ख़बर आई,मन को थोड़ी ठंडक सी पहुँची कि अभी भी देश में ऐसी कोई आवाज़ है जो ख़बर बनती है !अटलजी का यह संदेश महाराष्ट्र व हरियाणा में हो रहे विधानसभा चुनावों के मद्दे-नज़र आया है,पर इसका प्रभाव मतदाताओं पर भी पड़ेगा ,इस बात से अटलजी भी शंकित होंगे।
दर-असल अटलजी की पारी तो कब की ख़त्म हो ली और अडवाणी जी की हालत तो लोकसभा चुनावों के बाद से ही पतली हो रही है। भाजपाइयों ने ही उन्हें पुराना 'अचार ' कहकर उनके अस्तित्व पर हँसने का मौका मुहैया कराया, ऐसे में पार्टी के रणनीतिकारों ने अपने पुराने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया है,पर उन्हें पता भी है कि एक चुका हुआ कारतूस कितना काम कर सकता है?
अटलजी ने अपने संदेश में लोगों से कांग्रेस के कुशासन से बचने को कहा है,गोया उन्हें भी इस बात का इल्हाम हो गया हो कि भाजपा गठबंधन सत्ता में वापस नहीं आ रहा है, नहीं तो वे अपने दल की तरफ़ से जनता को नया क्या देने जा रहे हैं ,इस बारे में बताते।
जिस दल में नेत्रत्व को लेकर बराबर अनिश्चितता बनी हुई हो वह किसी देश या प्रदेश को किस निश्चित राह पर ले जाने को सक्षम होगा ,यह संघ और भाजपा के तमाम बुद्धिजीवी भी जानते होंगे। अडवाणी जी के नेत्रत्व की खुलेआम विफलता के बाद भी पद न छोड़ने की मानसिकता भाजपा के लिए बहुत भारी पड़ने वाली है।
ऐसे संदेश यदि काम करते तो शायद पार्टी इस हाल में न होती क्योंकि जनता को अटलजी का वह संदेश अभी भूला नहीं है जो उन्होंने 'गोधरा' के बाद नरेंद्र मोदी को 'राज-धर्म' निभाने के बारे में दिया था। तब मोदी और अडवाणी जी ने उसके निहितार्थ नहीं समझे ।
एक पार्टी को अपनी चुनावी जीत पक्की करने का पूरा अधिकार है,पर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह उपलब्धि वह किस मूल्य पर पाना चाहती है?

27 अगस्त 2009

जिन्ना,जसवंत और वो !

पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव कब के ख़त्म हो गए पर भारतीय जनता पार्टी का ख़ुमार अभी तक उतर रहा है। जो सिपाही कल तक पार्टी के लिए जी-जान से हुँकार भर रहे थे,वही आज उसका गिरेबाँ पकड़ कर अपना हिसाब माँग रहे हैं। ताजा संकट जिन्ना के बारे में किताब लिखने के बहाने जसवंत सिंह को एकतरफा तरीके से बाहर निकालने से पैदा हुआ है। सुधीन्द्र कुलकर्णी ,अरुण शौरी की तलवारबाज़ी तो हमें देखने को मिली ही है इसके पहले से वसुंधरा राजे और खंडूडी का असंतोष पहले से ही खदबदा रहा था। इन सबमें पार्टी को जसवंत सिंह कमज़ोर कड़ी दिखाई दिए और उन्हें 'किक' मारने में ज़्यादा देर नहीं लगाई गई ।
अब मूल मुद्दे पर आते हैं। दर-असल पार्टी के लिए जिन्ना कोई बहुत बड़ा बहस का विषय हैं भी नहीं। पार्टी के प्रेरणा-स्रोत रहे आडवाणी जी के उच्च विचारों से पार्टी पहले ही लाभान्वित हो चुकी है। उनके नेत्रत्व में 'मज़बूत' प्रधानमंत्री का नारा देकर पार्टी पहले तो सत्ता गवां बैठी और अब उन्हीं की 'मजबूती' से वह विपक्ष का रोल भी अदा कर रही है। कितनी हास्यास्पद बात है कि भाजपा में एक हारे हुए सेनापति को कुर्सी से चिपका दिया गया है और दूसरे लोगों को कहा जा रहा है कि वे हार की ज़िम्मेदारी लेकर अपनी-अपनी कुर्सी छोड़ें ।
यह ऐसी भाजपा है जिसका नेता हारने के बाद भी कुर्सी-मोह में जकड़ा हुआ है और वह ऐसी कांग्रेस से टक्कर लेने को सोचती है जिसकी नेता प्रधानमंत्री -पद को पाकर भी ठुकरा देती हैं। ऐसे में किस तरह कोई अपने दल के लिए आदर्श प्रस्तुत करेगा? जब ऊँचे पद पर बैठे लोगों में ऐसी लालसा रहेगी तो नीचे वाले न तो ऐसे बनेंगे और न ही वे कोई अनुशासन मानेंगे।
जसवंत सिंह भी कोई दूध के धुले नहीं हैं। वे इतने दिनों से आँख ,कान बंद किए बैठे रहे तब उन्हें धर्मनिरपेक्षता की चिंता नहीं हुई (खासकर गुजरात दंगों पर ) और अब अगर वे ऐसा कर रहे हैं तो यह विशुद्ध व्यावसायिक हितों के लिए ताकि उनकी किताब ख़ूब बिके और इस बहाने उन्हें रोज़गार मिल जाए। और अपने रोज़गार के लिए वे क्यों न कुछ करें जब उनका नेता ही अपने लिए 'रोज़गार' (नेता-विपक्ष)ढूँढ लेता है!
अरुण शौरी ने न जाने क्या-क्या कहा पर पार्टी उनको निकालने की ज़ल्दी में नहीं है। कही ऐसा न हो कि किसी दिन पार्टी में से निकालने वाला ही कोई न बचे क्योंकि जसवंत और शौरी की तरह रोज़गार का संकट कइयों को है!

24 मार्च 2009

वरुण भाजपा के नए हथियार !

अब लगने लगा है कि अपना देश पूरी तरह से चुनावी बुखार की गिरफ़्त में आ चुका है। सत्ता की दौड़ में बने रहने के लिए सभी पार्टियाँ आखिरी वार में जुटी हैं लेकिन भाजपा का चुनावी अभियान बड़ा ही दिलचस्प है। पार्टी के 'पी.एम.' पद के घोषित उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी लिए यह आखिरी समर है। इस अभियान की शुरुआत करते हुए नए व आधुनिक तरीके आजमाने का काम शुरू हुआ था पर चुनाव की औपचारिक घोषणा होते-होते पार्टी अपने परम्परागत हथियारों की शरण लेने को मजबूर हो रही है। इसकी खास वजह यही रही कि चुनाव में बहुमत की बात तो दूर उसके अपने सहयोगी दल किनारा करने लगे और पार्टी के अन्दर ही मतभेद शुरू हो गए । ऐसी दशा में आडवाणी जी को अपना 'सिंहासन' बहुत दूर भागता दिखायी दिया और अंत में वरुण गाँधी जैसे छोटे मोहरे को आगे करके हारी हुई बाज़ी को जीतने की कोशिश की गयी । वरुण ने पीलीभीत की सभा में जो कहा उसका जितना प्रचार-प्रसार और जितनी हील-हुज्ज़त हो उतना ही भाजपा से भागती-कुर्सी उसके पास आयेगी,ऐसा उन लोगों को लगता है जो भारतीय मतदाता का मानस ठीक तरह से नहीं जानते । वरुण के कहे हुए शब्दों को यहाँ दुहराने की ज़रूरत नहीं है ,वे शब्द भाजपा को थाती और कमाई समझकर अपने पास रख लेने चाहिए क्योंकि चुनाव बाद आडवाणी जी को तसल्ली देने के लिए कुछ नहीं होगा तो वे ही काम आएंगे।
यह भारतीय लोकतंत्र और राजनीति की विडम्बना ही है कि आप गैर-कानूनी ,गैर-मानवीय बात करके भी अपनी छाती चौड़ी कर सकते हो और यह सोचते हो कि कोई तुम्हारा क्या कर लेगा?
भाजपा ने तो अपना अन्तिम अस्त्र चला दिया है क्योंकि उसे भी पता है कि अगले चुनाव उसे बहुत सुखद परिणाम नहीं देने जा रहे हैं पर वह शायद यह भूल रही है कि आखिरी वार तो मतदाताओं के ही हाथ में है और बहुत दिनों तक उसे कोई बरगला नहीं सकता है।

10 मार्च 2009

आडवाणी और उनके मुखौटे !

अपने आडवाणी जी वाकई बहुत जल्दी में हैं। 'पी एम इन वेटिंग ' का खिताब पाने के बाद वे 'ओरिजनल' पी एम बनना चाहते हैं। इसके लिए वे युद्ध-स्तर पर काम कर रहे हैं। एक ओर जहाँ वे मनमोहन को सोनिया गाँधी की कठपुतली बनाकर मजाक उड़ा रहे हैं,वहीं दूसरी ओरउन्होंने चुनावी-मैदान में अपने मुखौटे उतार दिए हैं।
आडवाणी जी के मुखौटे उतारने के पीछे यह सोच हो सकती है कि अटल जी तो भाजपा के मुखौटे के रूप में विख्यात थे और वे पी एम भी बने,मनमोहन जी ,उनके अनुसार एक मुखौटे की ही तरह काम कर रहे हैं! फिर गुजरात में नरेन्द्र भाई मुखौटे लगवाकर दोबारा सत्ता पा सकते हैं तो यह 'फार्मूला' अपन पर भी फिट हो सकता है!
दर-असल जनता को और देश को आज मुखौटों की ही ज़रूरत है। अपने सही और वास्तविक रूप में न नेता जनता के सामने आ सकते हैं और न जनता ही उन्हें सर-माथे पर बिठा सकती है। इसलिए जब मुखौटों से ही काम चलता हो तो 'ओरिजनल लुक' कौन देखता है? अब राजनीति के साथ-साथ नेता भी एक 'उत्पाद' बन गया है और यह जनता की नियति है की वह 'कस्टमर' बनकर कष्ट से मरती रहे!
अब हमें तो पूरा यकीन हो गया है कि आडवाणी जी 'पी एम ' बनने जा रहे हैं आपको हो या न हो !

3 जनवरी 2009

माया मिली न राम !

बीता साल पूरी दुनिया के लिए भारी रहा ,सब ज़गह मंदी की मार पड़ी और कई कंपनियों का बोरिया-बिस्तर तक बंधगया पर भारत की एक राष्टीय पार्टी भाजपा के लिए तो 2008 जाते-जाते ऐसे ज़ख्म दे गया है जिन्हें वह ठीक से सहला भी नहीं पा रही है। पहले तो विधानसभा चुनावों ने ऐसा परिणाम दिया कि उसके 'मिशन-2009' के अभियान में ही पलीता लग गया। इन नतीजों ने पी एम इन वेटिंग आडवाणी जी के दिल की धड़कन बढ़ा दी है क्योंकि आने वाला समय अच्छे संकेत नहीं दे रहा है। उस पर कोढ़ में खाज यह हुआ कि पार्टी के मुख्यालय से भाई लोगों ने 'गाढ़ी - कमाई' से ढाई करोड़ रकम साफ़ कर दी! अब इस हालत में पार्टी खुलेआम कुछ भी कहने से बच रही है ,यहाँ तक कि वह इसके विषय में पुलिस-रिपोर्ट करने से बच रही है । जानकारों का मानना है कि अगर रिपोर्ट की गयी तो कई अप्रिय सवाल भी पूछे जायेंगे, मसलन इतना पैसा कहाँ से आया,इसका कहीं लेखा-जोखा है कि नहीं,वगैरह-वगैरह।
अब जबकि लोकसभा चुनाव सर पर हैं ,पार्टी को कुछ सूझ नहीं रहा है कि ऐसे में क्या किया जाए और उसके लिएये मुसीबतें ख़ुद उसके ही लोगों द्वारा दी गयी हैं । आज के हालात में न तो उसके हाथ सत्ता लगी है और जो जमा-पूँजी थी वह भी चली गयी । कहाँ तो अडवाणी जी मनमोहन सिंह को सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री कहकर उनका मज़ाक उड़ा रहे थे और कहाँ तो आज वे ख़ुद ही मज़ाक बने हुए हैं। उधर मनमोहन हैं कि 'सिंह इज़ किंग ' की धुन बजाये जा रहे हैं। अभी भी बहुत से लोगों को भाजपा से सहानुभूति है और उनके लिए यही कहना है कि इस 'सहानुभूति'
को अभी बचाए रखें , बहुत ज़ल्द पार्टी को इसकी और ज़रूरत पड़ने वाली है!


11 दिसंबर 2008

आप लाइन में हैं ,कृपया इंतज़ार करें !

पाँच विधानसभा चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को चौंकाया है। दूसरे राज्यों के नतीजों ने उतना अप्रत्याशित परिणाम नहीं दिया जितना कि दिल्ली ने। भाजपा को तो मानो साँप ही सूंघ गया हो,उसकी सारी हसरतें और कसरतें एकदम से हवा के गुब्बारे -सी फुस्स हो गयीं । कहाँ तो हमारे आडवाणीजी प्रधानमंत्री की कुर्सी में तेल-मालिश लगाकर उसमें बैठने की तैयारी में थे और कहाँ इस मल्होत्रे ने उनकी सारी उम्मीदों पर पलीता लगा दिया। ख़ुद तो वह 'सीएम इन वेटिंग' रह गया और अब इस बात का डर उनके दिल में भी बैठा गया कि वह भी 'पीएम इन वेटिंग' बनकर न रह जाएँ !


वैसे भाजपा ने दिल्ली में नारा दिया था कि 'हारेगा आतंक' और यह बात मतदाताओं ने उसे अच्छी तरह से बता दी है। मुंबई की घटना के दिन पहले भाजपा ने सरकार के हर कदम का साथ देने का एलान किया ,आडवाणीजी मनमोहन सिंह के साथ वहां जाने को तैयार होते हैं लेकिन शाम होते - होते राजनीति हावी हो गई और भाजपा यू-टर्न लेकर वोटों की फसल काटने को बेताब हो गई। दूसरे दिन जब दिल्ली में मतदान होना था ,तब उनका लगभग हर अखबार में एक स्याह विज्ञापन आता है, अटल की आतंक के प्रति 'चिंता' इस संदेश के साथ छपती है कि लोग भाजपा के राज में ही सुरक्षित रहेंगे ,पर मुआ वोटर को कौन समझाए उसने तो अपनी नम आँखों से मुम्बईवासियों को श्रद्धांजलि दी और भाजपा के द्वारा डराए और फैलाये 'आतंक' को हरा दिया।
क्या आडवाणीजी अपने संभावित मंत्रिमंडल की लिस्ट को परे रखकर एक बार यथार्थ की दहलीज़ पर पैर रखेंगे ? अब उन्हें 'पीएम इन वेटिंग ' शब्द से क्या चिढ़ नहीं महसूस होगी ? बहरहाल जनता ने जो परिपक्वता दिखाई है उसके लिए उसे सलाम!



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