धर्म के धंधे पुराने हो गए,
धीरे-धीरे वो सयाने हो गए!
रक्त-रंजित जीभ लेकर घूमते,
बद-सियासत के ठिकाने हो गए।
दिन-दहाड़े लूटकर मंदिर चले,
रघुनाथ भी उनके निशाने हो गए।
रात-दिन वो झूठ बोते,बाँटते,
सच सुने सच में, ज़माने हो गए।
इंतहा की आख़िरी शब आ गई,
क़ातिलों के दिन सुहाने हो गए !
• संतोष त्रिवेदी
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