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6 मई 2012

तुम और तुम्हारी याद !

डायरी के पुराने सफों में 
हर सफे के हर्फ़ में , 
दिखती हो तुम, 
खो जाती हो तुम !

ढूंढता हूँ तुम्हें 
हर वक़्त,हर शय में 
पास होकर भी 
दूर हो जाती हो तुम !

इतनी शिद्दत से कभी
कुछ नहीं किया,
तलाश में अब हूँ मगर
कहाँ आती हो तुम ?

डायरी नहीं बनाता  
अब सफों से दूर हूँ,
हर्फ़  भी पहचानते नहीं 
प्रेम  नहीं पढ़ाती हो तुम !

हो सकता है कभी 
प्रेम मिल जाय  कहीं,
पर प्यार में सोंधापन ,सहजता 
कहाँ से लाती हो तुम ?