डायरी के पुराने सफों में
हर सफे के हर्फ़ में ,
दिखती हो तुम,
खो जाती हो तुम !
ढूंढता हूँ तुम्हें
हर वक़्त,हर शय में
पास होकर भी
दूर हो जाती हो तुम !
इतनी शिद्दत से कभी
कुछ नहीं किया,
तलाश में अब हूँ मगर
कहाँ आती हो तुम ?
डायरी नहीं बनाता
अब सफों से दूर हूँ,
हर्फ़ भी पहचानते नहीं
प्रेम नहीं पढ़ाती हो तुम !
हो सकता है कभी
प्रेम मिल जाय कहीं,
पर प्यार में सोंधापन ,सहजता
कहाँ से लाती हो तुम ?