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30 अगस्त 2017

तनि ईसुर ते तरे रहौ !

मन की बातैं तुम केहे रहौ,
लोटिया,थरिया सब बिने रहौ।
पबलिक झूमि रही तुम पर
वहिका अफ़ीम तुम देहे रहौ।

देस भरे मा आगि लागि है,
लेकिन भागि तुम्हारि जागि है।
गाइ का ग्वाबरु बना मिसाइल
देखतै दुस्मन फ़ौज भागि है।

बाबा,गोरू अउ बैपारी
मौज उड़ावति हैं सरकारी,
गुंडा डंडा लइ दउरावैं
थर थर काँपैं खद्दरधारी।

पबलिक तुम्हारि, तुम पबलिक के
हरदम वहिका तुम छरे रहौ।
मरैं किसान,जवान मरैं
बातै खाली तुम बरे रहौ।

कोरट ऊपर शाह बइठि गे
क़ानूनौ का चरे रहौ।
गाँधी,नेहरू पीछे होइगे
तनि ईसुर ते तरे रहौ।


(लालकुआँ से कानपुर के रास्ते बस में )
२७ अगस्त २०१७

15 अगस्त 2016

हमका माफ़ करौ तुम गाँधी !

भटकैं कुप्पी लेहे तेवारी
नेतन के घर रोजु देवारी

जसन मनावैं पहिने खादी।
अइसी भली मिली आज़ादी।।
हमका माफ़ करौ तुम गाँधी।

चिंदी चिंदी बदन होइ गवा
दूधु सुड़क गा मोटा पिलवा
देस मा बांदर खूब बाढ़ि गे,
टुकुर टुकुर तकि रहे लरिकवा।।

अफसर,नेता काटैं चाँदी।
अइसी भली मिली आजादी।।
हमका माफ़ करौ तुम गाँधी।।

दालि-भातु सब दूभर होइगा
ख्यातन मा कोउ पाथर बोइगा
बूड़ा, सूखा कबौ न छ् वाड़ै,


मरैं भरोसे पीटैं छाती।
अइसी भली मिली आजादी।।
हमका माफ़ करौ तुम गाँधी।।

28 अगस्त 2013

मोहन और मनमोहन !

१)

बड़ी देर भई नंदलाला,तेरी राह तके हर ग्वाला.....!
देश की जनता भूखी-प्यासी,मौज उड़ायें लाला।
तुमने एक कंस मारा था,यमुना विषधर काला,
आज सर्प सर्वत्र विराजे,जनता बने निवाला।
फिर मुरलीधर चक्र सुदर्शन,उर वैजन्ती माला,
त्राहिमाम्, अब शरण तिहारी, तू ही है रखवाला।।
बड़ी देर भई नंदलाला।


२)

सोना नींद हराम केहे
औ रुपिया धरती फारे ,
बड़-बड़ी होइ गईं  हवा ,
गरियारु बैलु काँधा डारे।।
अब कउनो राह न सूझति है,
दिन मा ही अंधियारु भवा,
मनमोहन चुप्पे  देखि रहे,
काटु करै अब कउनि दवा ?


३)

 
मोहन आकर तुम्हीं उबारो,मनमोहन अब हारे।
धर्म,अर्थ की ग्लानि हुई,भक्त बने बेचारे।।
मुरली मधुर बजाओ अपनी,घर-घर ,द्वारे-द्वारे।
प्राण फूँक दो तुम रूपये में,अब तो तुम्हीं सहारे।।




 
 

23 मार्च 2013

होली में हुड़दंग !

कुण्डलियाँ

फागुन गच्चा दे रहा,रंग रहे भरमाय।
आँगन में तुलसी झरे,आम रहे बौराय।।
आम रहे बौराय,नदी-नाले सब उमड़े।
सुखिया रहा सुखाय,रंग चेहरे का बिगड़े।।
 
सजनी खम्भा-ओट , निहारे फिर-फिर पाहुन।
अपना होकर काट रहा ये बैरी फागुन।।(१)



होली में देकर दगा,गई हसीना भाग ,
पिचकारी खाली हुई ,नहीं सुहाती फाग !!

नहीं सुहाती फाग,बुढउनू खांसि रहे हैं,
पोपले मुँह मा गुझिया, पापड़ ठांसि रहे हैं।

अखर रहे पकवान,नीकि ना लगै रंगोली।
चूनर लेती जान, कहे आई अस होली।।(२)



 
फागुन के इस समय में,रोया,हँसा न जाय।
पिचकारी में रंग भरें, वो भी गवा बिलाय।।
वो भी गवा बिलाय,बढी अतनी मँहगाई।
देवर खाली हाथ,तकै मुँहु सब भौजाई।
होरी कइसे मनी, कहैं सजनी ते साजन,
बिपदा भारी लिए,खड़ा मुस्काए फागुन।(३)


दोहे

गुझिया,पापड़ छन रहे,रामदीन के संग।
होरी में सब मिल गए,चटख-स्याह एक-रंग।।(1)


आसमान में उड़ रहा,केसर रंग, गुलाल ।
बरस बाद अंबर मिला,धरती हुई निहाल ।।(2)



रंग काटने दौड़ते,होली में इस बार ।
हरिया के बरतन बिके, घरवाली बीमार।।(3)

फगुवा टोली देखकर,मन में उठे तरंग ।
साजन हैं परदेस में,नाचूँ किसके संग ।।(4)
...
पीली चूनर उड़ रही,आसमान की ओर ।
धरती पटी गुलाल से,जियरा डोले मोर ।।(5)

बादल होली खेलते,बारिश की बौछार।
फागुन गरज-बरस रहा,भीग गया त्यौहार।(6)

और अंत में गौरैया को समर्पित:

गौरैया गायब हुई,रही हमेशा साथ।
सूना सब उसके बिना,दूध-कटोरी-भात ।।


आँगन में दिखते नहीं, गौरैया के पाँव |
गोरी रोज़ मना रही लौटें पाहुन गाँव ||




विशेष :तीसरी कुंडलिया में बीच की दो लाइनें भारतेंदु मिश्र जी की हैं !

 

14 दिसंबर 2012

बहुत दिन हुए !

बहुत दिन हुए
जब आखिरी बार
चिड़िया चहचहाई थी,
पौधों में नई कोंपलें आईं थीं
सोंधी हवा चली थी,
आम बौराए थे और टपका था महुआ |
भोर होते ही बोले थे मुर्गे
और किसान गया था खेत सींचने
पूस की रात में 
ठण्ड में जलाये हुए कौड़ा
गांव में छप्पर के नीचे
आग तापे थे हम !
बहुत दिन हुए
जब आखिरी बार
माँ चौके पर बैठी थीं
घी का मर्तबान लेकर
और उड़ेल दिया था
ढेर सारा घी दाल मे,
ना-ना करते-करते !
याद नहीं आता 
पिछली बार कब खाया था
चने का साग
और जोंधरी की रोटी
या कडुवे तेल से चुपड़ी
धनियहा-नमक के साथ !
बहुत दिन हुए
आम,जामुन या बैर पर
निशाना साधते पत्थर मारे,
चने का झाड़ उखाड़े
और निमोना चबाये,
खेत में घुसकर
तोड़े हुए गन्ने !
याद नहीं रहा
कब जिए थे अपनी मर्ज़ी से
खुली हवा में साँस ली थी
और साइकिल में चलते हुए
दोनों हाथ छोड़कर
कब गुनगुनाये थे !
अब कुछ भी याद नहीं रहा,
बहुत दिन हुए
घर में रहे हुए
ज़िन्दगी से मिले हुए !

4 अक्टूबर 2012

हम सयाने हो गए !

बचपन में
आँगन से लेकर दुआर तक
दौड़ते थे साथ-साथ बड़ी बहन के,
दहलीज़ और डेहरी को
हमारे छोटे-छोटे पाँव
लांघते थे बेखटके
करते थे अठखेलियाँ
खेलते थे लुका-छिपी
दरवाजे की ओट में !

बहन जब पाथती थी गोबर
रहते थे साथ-साथ
वो बनाती थी कंडे
हम बिगाड़ते थे उनको
होली के आस-पास
हम दोनों मिलकर
बनाते थे होरी-बल्ला
गोबर में उकेरते
मछली,तितली,सूरज और चाँद 
आंगन में बनती रंगोली
बहन लीपती थी चौरा
और हम खोद डालते थे नहा !

सयानी बहन का 
दहलीज़ व डेहरी से
बाहर का सफ़र
अच्छा नहीं रहा ,
निकल गई वह घर से
हो गई पराई हमेशा के लिए, 
डेहरी को मैं समझता रहा 
उसका वास्तविक वारिस 
पर मैं भी तो नहीं रह पाया उसके पास 
रोजगार की तलाश में छोड़ आया
दहलीज़,डेहरी और खमसार  को
बना लिया आशियाना
दस बाई दस के बैरक को

छूट गए सारे रिश्ते
चंद कागज के पुलिंदों की खातिर
नहीं बचा पाए 
वो ऊँचा रोशनदान  
कमरे की खुली खिड़की
आँगन से लगा दालान
याद आती हैं हर रात
अम्मा की कहानियां
और अलस्सुबह
पिता की झिड़की !

अब बहन और हम
दोनों सयाने हो गए
अपनी धरती और अपनों से
दूर-दूर बो गए !

14 मई 2012

पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !

घरवाली हमते समझदार,
पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !

वी घर का काम लेहेन  मूँड़े
हम बाहर घूमि-घामि आई,
मोबाइल अउ कम्पूटर ते 
जइसे हमारि भै होय सगाई !

लड़ते-झगड़ते हो गए बाइस बरस 
जब द्याखो बात सुनावैं चार 
पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !

कपड़ा-लत्ता ,बरतन-चउका 
खाना-पीना ,उनके जिम्मे,
ना कहीं घूमना,बाहर खाना
पूजा, बरत निभावैं रस्में !

हमही लरिकन के गुनहगार,
पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !

अब पूरे बाइस बरस बीते 
वी झेलि रहीं हमरी संगति,
'सत्ती होइ गईंन तुम्हैं साथै'
हमरी घरवाली रोजु कहति !

हमहीं यहि घर के बंटाधार ,
पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !




31 मार्च 2012

कइसे दिन फिरिहैं ?

अचानक कुछ याद आने पर फेसबुक में कुछ लाइनें लिखी थीं,पर अच्छा लगने पर उसे तुरत बड़ा कर ब्लॉग में डाल दिया जिसे आप लोगों ने पढ़ा  और  इतना सराहा  कि उसके बाद की पंक्तियाँ अपने आप बन गईं.उम्मीद हैं,अच्छी लगेंगी!


गारा-माटी के घर गायब
कुल्हरी,समसी,लोढ़वा गायब,
लढीहा,लग्घी,बैल कै गोईं
मुसका,चरही,पगही गायब !


ग्वाबरु,गोलई,टोकनी गायब
मूड़े कै वह गोड़री गायब,
अब कइसे दिन फिरिहैं सबके,
घूरे केरि रिहाइश गायब !


चारा-सानी, चोकरा गायब,
पड़वा,पड़िया,लैरा गायब ,
ख्यातन ते,खरिहानन  ते
सीला-गल्ला,पैरा गायब !


दुलहिनि,पाहुन,बालम गायब
जनवासे ठंढाई गायब,
दुलहा,सरहज ,नेगु-कल्यावा
लरिकन कै बरतउनी गायब !

भौजी संग ठिठोली गायब
बुआ चिढ़ाती हरदम, गायब ,
कब तक मनई बचा रहत है
चिट्ठी,पान-सुपारी गायब !




  


*लढीहा=बैलगाड़ी,लग्घी=अरहर की सूखी डाली ,ग्वाबरु=गोबर,गोलई=लग्घी से बनी टोकरी ,मूड़े कै वह गोड़री =सिर पर सामान  उठाते समय रखा जाने वाली कपड़े से बनी चीज़ ,लैरा=भैंस या गाय का छोटा बच्चा 

29 मार्च 2012

कहाँ गए वो गाँव ?


गाँव,गिद्ध,गौरेया गायब
कोठरी,डेहरी,कथरी गायब,
अब तो सूखे साख खड़े हैं
कुआँ ते हैं पनिहारिन गायब !

गाँव किनारे वाला पीपल,
बरगद और लसोंहड़ा गायब,
मूंज,सनई कै खटिया,उबहनि
दरवाजे कै लाठी गायब !

बाबा कै बकुली औ धोती
अजिया केरि उघन्नी गायब,
लरिकन केर करगदा,कंठा
बिटियन कै बिछिया भै गायब !

नानी केरि कहानी गायब,
लोटिया अउर करइहा गायब,
अम्मा कै दुधहंडि औ भठिया,
बप्पा कै रामायन गायब !

आम्बन ते अम्बिया हैं गायब
चूल्हे-भूंजा ह्वारा गायब,
सोहरै,बनरा,गारी गावै-
वाली सुघर मेहेरिया गायब !

पइसन के आगे अब भइया
रिश्ते-नाते,रस्ते गायब,
शहर किहे हलकान बहुत
अब तो चैन हुँवों ते गायब !

18 अक्टूबर 2011

अच्छा लगता था !

घर की डेहरी  पर 
घंटों बैठे 
बिना काम के 
अम्मा से चिज्जी की फ़रमाइश करते 
झूठ-मूठ का रोना रोते 
मांगें अपनी पूरी करवाना 
अच्छा लगता था!

छोटी-सी गप्पी में 
कंचों को लुढकाना
ऐंठ मारकर 
बड़ी दूर से टिप्पा साधे 
हर बाज़ी चाहते जीतना
अपने कंचों की थैली को 
रोज़ बढ़ाते ही रहना 
अच्छा लगता था !

डंडे पर गुल्ली को रखकर 
दूर भगाते और लपकते 
रात को चाँद  की निगरानी में 
अपने कई दोस्तों के संग 
पाटा लगे हुए खेतों पर 
भुरभुर माटी की छाती पर 
दौड़ लगा झाबर* खेलना
अच्छा लगता था !

आमों की बगिया में 
ढेला लेकर आम टीपना 
झुकी हुई डाली को कसकर 
और झुकाना उसे हिलाना 
जामुन को भी आँख दिखाना 
चोरी से अमरुद तोड़ना
गोल बनाकर बेर गिराना   
अच्छा लगता था !

कतकी के मेले में जाना,
पूड़ी,रबड़ी खूब उड़ाना,
भइया* की उंगली  पकड़े
डमरू और पिपिहरी लेना,
पट्टी और जलेबी खाना 
बैलों की गाड़ी में चढ़कर 
चलत बैल को अरई मारना  
अच्छा लगता था !!

खेतों की मेड़ों पर सरपट 
नंगे पाँव भागते जाना ,
गन्ने के खेतों में घुसकर 
गन्ने का हर पोर चूसना ,
बित्ते भर का झाड़ चने का 
जड़ से उखाड़ कर ख़ूब छीलना
अच्छा लगता था !



झाबर*=पकड़ा-पकड़ी का खेल, भइया*=अपने पिताजी को हम यही कहते हैं 



10 अक्टूबर 2011

राम विलास शर्मा को पढ़ते हुए !



क़रीब दस-बारह साल बाद  दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी गया था.हालाँकि घर में पढने लायक अथाह भंडार मौज़ूद  है,पर कई दिनों से अज्ञेय की आत्मकथा 'शेखर :एक जीवनी' को पढने की प्रबल  इच्छा थी मन में ! पुस्तकालय में जाकर पुनः सदस्य बनने का तात्कालिक कारण यह भी रहा.बहरहाल,आसानी से सदस्यता ग्रहण करके मैंने अपनी वांछित पुस्तक की खोज शुरू की ,पर वह उस समय वहां उपलब्ध नहीं थी. मैंने उसका विकल्प खोजना शुरू किया तो सहसा मेरी नज़र 'अपनी धरती,अपने लोग' पर पड़ी और उसे खोलते ही जिस तरह की भाषा मुझे दिखी,उससे मैं सहज ही आकर्षित हो गया.यह राम विलास शर्मा की आत्मकथा के तीन खण्डों का पहला भाग था.मैं लेखक के नाम से पहले से ही परिचित था,चूंकि वे हमारे बैसवारा के ही रहनेवाले थे,इसलिए उनकी आत्मकथा पढने में अतिरिक्त रूचि लगी और मैंने उस पुस्तक को ले लिया.हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा व जिन्ना के जीवन के बारे में अमेरिकी लेखक की लिखी पुस्तक ही इससे पहले मैंने जीवनी के नाम पर पढ़ीं थीं !


'मुंडेर पर सूरज' इस आत्मकथा का पहला भाग है,जिसमें लेखक के बचपन से लेकर अध्यापन-कार्य से मुक्त होने तक की अवधि को तफ़सील से बताया गया है.उनका शुरुआती जीवन अपने बाबा के साथ गाँव में बीता और इस दौरान होने वाले अनुभव मेरे लिहाज़ से सबसे ज़्यादा रोमांचकारी रहे क्योंकि उन प्रसंगों को राम विलास शर्माजी ने जस-का -तस धर दिया है .इसमें देशज शब्दों की भरमार  है.जिन शब्दों को मैं भूल-सा रहा था,उन्हें किताब में पाकर निहाल हो उठा.जिस जीवन को मैंने अपने बचपन में जिया था,इतने बरसों बाद लग रहा है कि यह मेरी अपनी ही कहानी है. इस तरह के कुछ अंश यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ.


रसोई के बगल में  छोटी खमसार थी.एक तरफ सौरिहाई जहाँ मेरा जन्म हुआ था,दूसरी तरफ आटा,दाल,चावल,गुड़ रखने की कोठरी;खमसार में एक तरफ बड़ी चकिया ,दूसरी तरफ धान कूटने की  ओखली,उसी के ऊपर दीवाल में घी,तेल की हांडियां रखने का पेटहरा  !

                                                             ***************
कुछ  दिन में बाबा ठीक हो गए और मैं उनके साथ सोने लगा.सोने के पहले घुन्घूमनैयाँ करते थे .चित लेटकर पैर मोड़ लेते थे,उन पर मुझे लिटाकर घुटने छाती की तरफ़ लाते,फिर पीछे ले जाते. इस तरह झूला झुलाते हुए गाते जाते थे,घुन्घूमनैयाँ ,खंत खनैया ,कौड़ी पइयां,गंग बहइयां...और अंत में पैरों पर मुझे उठाते हुए  कहते थे,बच्चा का बिहाव होय,कंडाल  बाजे भोंपड़ प पों,पों !


इस तरह और भी कई जगह रोचक और जीवंत-प्रसंग हैं. कथरी,नहा ,पगही,चीपर,अंबिया,कुसुली गड़  आदि न जाने कितने शब्द हैं जो बैसवारे में ही बोले और सुने जाते हैं! इस तरह उन्होंने हचक के अवधी व बैसवारी शब्दों का प्रयोग किया है.


राम विलास शर्मा जी की ख्याति एक आलोचक के रूप में ही ज़्यादा रही,इसलिए भी आम पाठक उन्हें अधिक नहीं पढ़ या जान पाया.कहते हैं कि निराला के बारे में  जितनी प्रामाणिक जानकारी  शर्माजी के पास थी,शायद ही किसी के पास रही हो.वे अपने लखनऊ -प्रवास के दौरान निरालाजी के संपर्क में आये और उनकी गाढ़ी दोस्ती हो गयी.वे निराला के गाँव गढ़ाकोला(उन्नाव) भी गए थे.निरालाजी ने कई बार उनको मानसिक सहयोग दिया,जिसका उन्होंने पुस्तक में जिक्र भी किया है.'तुलसी' के बारे में भी राम विलास जी ने ख्याति पायी है.इन्होंने निराला और तुलसी पर अलग से काफी-कुछ लिखा है !आलोचना के क्षेत्र में राम चन्द्र शुक्ल के बाद उस समय के आलोचकों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है.


महावीर प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्माजी के गाँव आस-पास ही थे,यह मेरा सौभाग्य है कि  मेरा गाँव भी इन दोनों विभूतियों से बहुत दूर नहीं है ! दिल्ली में रहते हुए भी शर्माजी से मिल नहीं पाया ,इसकी टीस ज़रूर हमेशा रहेगी !

पुस्तक पढने के दौरान ही यह जाना कि शर्माजी का जन्मदिन दस अक्टूबर को पड़ता है,संयोग से आज वही दिन है और  ख़ास बात यह है कि  यह उनके जन्मशती-वर्ष की शुरुआत का दिन भी है !इस नाते भी हमें उनको,उनके किये गए कामों को याद करना ज़रूरी है.उस महान आलोचक और लेखक की याद को शत-शत नमन ! 


 



25 नवंबर 2008

बैसवारा कै कथा

यार, हम बैसवारा के अहिन औ बहुत दिनन ते सोचित अहिन कि अपनी बोली मा कुछु लिखी मुदा आजु मौका मिला है । सबते पहिले यहि बोली क पहिचान देवावै के बरे रमई काका यानी चंद्रभूषण त्रिवेदी क यादि करिथ.हमार बैसवारा राजा राव रामबख्श सिंह,महावीर प्रसाद द्विवेदी ,निराला,राणा बेनी माधव ,पंडित रघुनन्दन प्रसाद शर्मा ,काका बैसवारी ,चंद्रशेखर आजाद ,लल्लू बाजपेई, शिव बहादुर सिंह भदौरिया अउर न जाने केतनी विभूतिन ते भरा परा है ,अगर कभी मौका मिला तो सारी लिस्ट गिना द्याबै.अब जब शुरुआत होइ चुकी है तो हम सब बैसवारा प्रेमिन ते विनती करिथ कि उनके पास जौनि जानकारी होय वहिका स्वागत है .