कई बरस बाद अबकी बार कतकी (कार्तिक पूर्णिमा) पर गाँव में हूँ.आने की कोई योजना नहीं थी पर अचानक दो दिन पहले घर से बड़ी अम्मा (दादी) का फोन आया,वो सख्त बीमार थीं और हमें याद कर रही थीं. अभी दिवाली पर जब घर आया था तो उनसे मुलाक़ात हुई थी,पर उनकी मिलने की ख्वाहिश ने बेचैन कर दिया और मैं बिना किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के ,गाँव आ गया.वे अब कुछ ठीक हैं ! इस तरह बहुत दिन बाद कतकी पर अपने गाँव में हूँ !
आज सुबह से ही मैं इस त्यौहार के बारे में सोच रहा हूँ.कहीं भी कुछ रौनक या उल्लास नहीं दिखती है.सब कुछ सामान्य-सा लग रहा है.हाँ,घर में ज़रूर पूड़ी,कचौड़ी और रबड़ी के व्यंजन तैयार किये गए हैं.गंगा-स्नान के लिए सोच रहा था कि जाऊँगा,पर न मन ने हुलास भरी और न दूसरों का संग मिला.अब अगर जाऊं तो बाइक या साईकल के अलावा कोई विकल्प नहीं है.साईकल चलाना अब छूट गया है,बाइक अपन कभी चलाये नहीं !सो,घर में ही दो बूँद गंगाजल छिड़ककर यहीं पर गंगा-स्नान का पुण्य ले लिया और पूड़ी-रबड़ी का आनंद भी !
मुझे पचीस-तीस साल पहले की गाँव की कतकी आज बहुत याद आ रही है.लोग महीने भर पहले से बैलगाड़ी को तैयार करने में लग जाते थे. बैलों की पगही,गाड़ी की पैंजनी और जुआं( जिस पर बैल अपना कन्धा रखते हैं)सँभाले जाते .लढ़िया (बैलगाड़ी) की इस तरह पूरी साज-सज्जा होती और हम सब कतकी की सुबह का बेसब्री से इंतज़ार करते. इस दिन सुबह चार बजे से घरों में खाने की तैयारियाँ होने लगती और सात बजे तक हम गंगा-स्नान को निकल जाते .वहाँ स्नान करके घाट के किनारे ही रबड़ी का लुत्फ़ लिया जाता और लौटते समय मेला घूमते.दो-तीन घंटे मेला देखने के बाद घर लौटते वक़्त रास्ते में गाड़ियों की आपस में दौड़ भी होती.सड़क किनारे डमरू,किडकिडिया ,घोड़े,हाथी ,जांत आदि खिलौने बिकते, जिन्हें हर बच्चे को लेना ज़रूरी-सा था.
इस तरह कतकी का आकर्षण स्नान,मेला और खिलौनों की वज़ह से बना रहता और बैलगाड़ी में घर-परिवार के साथ पूरे परब का मज़ा लेते ! आज के बच्चों को उसकी तनिक भी झलक नहीं मिलती है और इसलिए उन्हें ऐसे परब महज़ खान-पान का एक विशेष दिन बनकर रह गए हैं. शहरों में यह 'कल्चर' पहले से ही नहीं था, अब तो गांवों से भी यह गायब हो गया है.
इस सबके लिए क्या हमारी आधुनिकता ज़िम्मेदार है या नई पीढ़ी ? हम प्रकृति (नदी,पहाड़,जंगल) से दूर होकर कितने दिन अपने परब और मेलों से सामंजस्य बिठा पाएँगे,अपने को बचा पाएँगे ?
* पहली बार यह पोस्ट गाँव से जुगाड़-कंप्यूटर द्वारा लिखी गई !
आज सुबह से ही मैं इस त्यौहार के बारे में सोच रहा हूँ.कहीं भी कुछ रौनक या उल्लास नहीं दिखती है.सब कुछ सामान्य-सा लग रहा है.हाँ,घर में ज़रूर पूड़ी,कचौड़ी और रबड़ी के व्यंजन तैयार किये गए हैं.गंगा-स्नान के लिए सोच रहा था कि जाऊँगा,पर न मन ने हुलास भरी और न दूसरों का संग मिला.अब अगर जाऊं तो बाइक या साईकल के अलावा कोई विकल्प नहीं है.साईकल चलाना अब छूट गया है,बाइक अपन कभी चलाये नहीं !सो,घर में ही दो बूँद गंगाजल छिड़ककर यहीं पर गंगा-स्नान का पुण्य ले लिया और पूड़ी-रबड़ी का आनंद भी !
मुझे पचीस-तीस साल पहले की गाँव की कतकी आज बहुत याद आ रही है.लोग महीने भर पहले से बैलगाड़ी को तैयार करने में लग जाते थे. बैलों की पगही,गाड़ी की पैंजनी और जुआं( जिस पर बैल अपना कन्धा रखते हैं)सँभाले जाते .लढ़िया (बैलगाड़ी) की इस तरह पूरी साज-सज्जा होती और हम सब कतकी की सुबह का बेसब्री से इंतज़ार करते. इस दिन सुबह चार बजे से घरों में खाने की तैयारियाँ होने लगती और सात बजे तक हम गंगा-स्नान को निकल जाते .वहाँ स्नान करके घाट के किनारे ही रबड़ी का लुत्फ़ लिया जाता और लौटते समय मेला घूमते.दो-तीन घंटे मेला देखने के बाद घर लौटते वक़्त रास्ते में गाड़ियों की आपस में दौड़ भी होती.सड़क किनारे डमरू,किडकिडिया ,घोड़े,हाथी ,जांत आदि खिलौने बिकते, जिन्हें हर बच्चे को लेना ज़रूरी-सा था.
इस तरह कतकी का आकर्षण स्नान,मेला और खिलौनों की वज़ह से बना रहता और बैलगाड़ी में घर-परिवार के साथ पूरे परब का मज़ा लेते ! आज के बच्चों को उसकी तनिक भी झलक नहीं मिलती है और इसलिए उन्हें ऐसे परब महज़ खान-पान का एक विशेष दिन बनकर रह गए हैं. शहरों में यह 'कल्चर' पहले से ही नहीं था, अब तो गांवों से भी यह गायब हो गया है.
इस सबके लिए क्या हमारी आधुनिकता ज़िम्मेदार है या नई पीढ़ी ? हम प्रकृति (नदी,पहाड़,जंगल) से दूर होकर कितने दिन अपने परब और मेलों से सामंजस्य बिठा पाएँगे,अपने को बचा पाएँगे ?
* पहली बार यह पोस्ट गाँव से जुगाड़-कंप्यूटर द्वारा लिखी गई !
