चुप्पी के भी अर्थ बड़े हैं
यूँ ही ताले नहीं जड़े हैं ।
संविधान को घोट रखा है
लोकतंत्र की राह अड़े हैं ।
बच्चों को पुचकारी देकर
डंडा-लाठी लिए खड़े हैं।
पेपर लीक तमाशा लगता
रोजगार ख़ुद लिए पड़े हैं ।
आँसू सूख चुके हैं उनके
अब तो केवल काँट गड़े हैं।
दुनिया उलट-पुलट हो जाए
कुर्सी औ ज़ुबान जकड़े हैं ।
मौन तभी टूटेगा अब तो
राम कहें ‘प्रभु आप बड़े हैं’।
-संतोष त्रिवेदी