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5 जनवरी 2012

सरदी,सड़क और कोहरा !

दोपहर बीत जाने के बाद 
कोहरा और घना हो चला था
मैं कब तक सेल में बंद रहता 
थोड़ी ही देर में 
ढके आकाश के नीचे ढका था,
रास्ते पर चल  चुका था !


चल रहा था फुटपाथ पर ,
क्योंकि सड़क  पर आदमी नहीं,
गाड़ियाँ  चलती हैं,
यह मुझे अख़बार से मालूम हुआ था !
थोड़ी दूर बढ़ने पर 
कान बांधे,मूँगफली की ढेरी पर  
मटकी से धुआँ निकालते
एक आदमीनुमा गट्ठर से मैंने कहा,
'भाई,अठन्नी की दे दो '
उसने कहा,'बस ,छू लो !'
मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ 
मैंने पाँच का पत्ता आगे बढ़ाया
मूँगफली लेकर आगे बढ़ आया !


अब ,
घना कोहरा,दिल्ली की सड़क,
गरम मूँगफलियाँ और हम !
सब एक साथ थे
जेब में हाथ थे .
थोड़ा आगे बढ़ने पर 
लालबत्ती का अहसास हुआ ,
उसकी लालिमा भी जैसे बिला गई हो हमारी तरह ,
फिर भी रह-रह कर दमक रही थी,
किसी बुजुर्ग की ज़िम्मेदारी की तरह !


मैंने आव न देखा ताव,
सड़क को रुका हुआ देखकर 
अपना वज़न आगे किया,
फुर्र से एक लम्बी गाड़ी ने 
बिल्ली की तरह रास्ता काट दिया,
काले-सफ़ेद शीशों के बीच से 
एक गोलमटोल आकृति ने हड़का ,
'अबे ! दिखता नहीं है क्या ?'
मैं सन्न था,सुन्न था ,
क्या बोलता !
हाथ में पकड़ी हुई मूँगफलियाँ 
साथ छोड़ चुकी थीं.
तभी मैंने कंधे पर एक गरम हाथ महसूसा,
'बेटे,आप ही देखकर चला करो,
इनके पास तो देखने,चलने,
यहाँ तक कि जीने की भी मशीने हैं !
हम,आप तो बस इन्हें देखने के लिए हैं.'


मैं जब तक कुछ बोलता,
एक बुज़ुर्ग आगे जा चुके थे.
मैं चल रहा था,
सोच भी थोड़ा रहा था.
'ये तो मौसम का कुहरा है,छँट जायेगा,
पर,
जिनके दिमाग शीशों में बंद हैं,
संवेदनाओं की खाल पर बर्फ जमा है ,
वो किस गर्मी से पिघल रहे हैं ?
बाहर के कोहरे से भी ज्यादा धुंध 
क्या कभी वे हटा पाएंगे,
उन शीशों और उस कोहरे के पार 
कभी देख पाएंगे ?'