
सत्य,अहिंसा और प्रेम का ,
फिर से भारत में बिगुल बजा जा !
गाँधी,फिर इस देश में आजा !
जिस भारत में तूने अपने
रक्त से शांति-पौध को सींचा,
हिन्दू,मुस्लिम के हृदयों में,
सद्भाव,प्रेम की रेखा खींचा,
सर्व-धर्म समभाव जगाकर ,
फिर से प्यार के दीप जला जा !
गाँधी, फिर इस देश में आ जा !
मानव मूल्यहीन हो रहे,
आज तुम्हारे देश में,
घृणा भर रही है हृदयों में,
कुछ हैं पशुवत वेश में ,
ऐ मोहन, इस देश में आकर ,
फिर से 'रघुपतिराघव' गा जा !
गाँधी, फिर इस देश में आ जा !
विशेष : रचना काल
०२/१०/१९९० दूलापुर,रायबरेली