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2 अक्टूबर 2010

गाँधी , फिर इस देश में आजा !

गाँधी, फिर इस देश में आजा. 
सत्य,अहिंसा और प्रेम का ,
      फिर से भारत में बिगुल बजा जा !
        गाँधी,फिर इस देश में आजा !

जिस भारत में तूने अपने
       रक्त से शांति-पौध को सींचा,
हिन्दू,मुस्लिम के हृदयों में,
      सद्भाव,प्रेम की रेखा खींचा,

सर्व-धर्म समभाव जगाकर ,
      फिर से प्यार के दीप जला जा !
      गाँधी, फिर इस देश में आ जा !

मानव मूल्यहीन  हो रहे,
         आज तुम्हारे देश में,
 घृणा भर रही है हृदयों में,
         कुछ हैं पशुवत वेश में ,

ऐ मोहन, इस देश में आकर ,
     फिर से 'रघुपतिराघव' गा जा !
     गाँधी, फिर इस देश में आ जा !


विशेष : रचना काल
०२/१०/१९९०  दूलापुर,रायबरेली