गाँठ जो है
तेरे मेरे बीच,
बाँधती भी है
अलगाती भी है।
गाँठ जो खुलती है
तेरे मेरे बीच,
राह बढ़ती है,
तन्हा छोड़ जाती है ।
गाँठ गर पड़ती नहीं
तेरे मेरे बीच,
एक-दूजे की अहमियत
समझ में आती नहीं ।
गाँठ
का बँधना सदा
पक्का नहीं होता,
इतनी कसावट में भला
सहजता टिक पाती कहीं ।