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6 सितंबर 2026

 घोर बादल प्रलय के छँटने लगे हैं,

वो फिर पुराने वायदे रटने लगे हैं।


मंच कोई भी नहीं वो छोड़ते हैं अब,

ख़ुद की कही हर बात से हटने लगे हैं।


पढ़ने-लिखने का कोई मौसम नहीं रहा,

धर्म माथे पर सजा, मैदान में डटने लगे हैं।


नायक नए तैयार होते जा रहे हैं रोज़,

इंसाफ़ और सच भीड़ में पिटने लगे हैं।


रहनुमाओं से हमें उम्मीद अब भी ख़ूब है,

झूठ के परचे हमारे हाथ से बँटने लगे हैं !


लूट जारी है मुसलसल देश भर में आपकी,

हे राम! यह सब देखकर आइने फटने लगे हैं !


— संतोष त्रिवेदी


23 अक्टूबर 2012

चींटी और हाथी !

हाथी चींटी से कहे,तू ना समझे मोहि ।
मेरे पांवों के तले,मौत मिलेगी तोहि ।।

चींटी बोली नम्र हो,मद से मस्त न होय ।
वंशहीन रावण हुआ,कंस न पाया रोय ।।

मरने से बेख़ौफ़ हूँ ,चलती अपनी चाल ।
हर पल जीती ज़िन्दगी,नहीं बजाती गाल ।।

छोटी-सी काया मिली,इच्छाएँ भी न्यून ।
छोटे-से आकाश में,खुशियाँ फैलें दून ।।

पेट तुम्हारा है बड़ा,धरती घेरे खूब ।
परजीवी बन चर रहा,इसकी-उसकी दूब ।।


सावधान लघु से रहो,सदा उठाये सूंड़ ।
चींटी मारेगी तुझे,तू अज्ञानी,मूढ़ ।।