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5 जून 2014

जेठ दुपहरी !

तपती दुपहर में
सूरज से बचकर
हम लुके बैठे हैं किसी कोने-अतरे में,
हरिया आज भी
बैलों की गोईं लिए
सूखी धरती का फाड़ रहा है सीना,
माटी के ढेलों-से
दरक रहे हैं उसके स्वप्न,
स्याह और खुरदुरी देह ने
सोख लिया है उसका पसीना !





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यूँ ही

नहीं भूला तुम्हें,हर पल हमें तुम याद आते हो।
हम नहीं कहते किसी से,तुम मगर सबको बताते हो।।






 

18 अप्रैल 2013

गर्मी के दोहे !


गरम हवा अगिया रही,बरस रहे अंगार !
चैत महीना हाल यह,आगे हाहाकार !!(१)

सूरज हमसे दूर हो,चंदा आए पास !
पंछी पानी ढूँढते,नहीं बुझाती प्यास !!(२)

पकी फसल को चूमता,हँसिया लिए किसान !
माथे पर चिंता लदी,बिटिया हुई जवान !!(३)

सोना गिरे बजार में,हरिया मुख-मुस्कान !
गेहूँ सोना ही लगे ,जब  आए खलिहान !!(४)

गोरी पनघट पे खड़ी,पानी बिन हैं कूप !
बालम प्यासे खेत में,संग खड़ी है धूप !!(५)
 

3 जुलाई 2012

सूरज की साजिश !

बादल हमको दे दगा,चले गए उस ओर |
बिन बारिश दम सूखता,नहीं नाचते मोर || (१)


धरती झुलसे उमस से,प्यासे पंछी मौन |
दादुर दर्शन हैं कठिन,अब टर्राये कौन ? (२)


सूखा सावन आ गया,गोरी खड़ी उदास |
झूले खाली पड़े हैं,बिरवा बिना हुलास || (३)


काया पत्थर की हुई,नहीं बरसते नैन |
रूठे बादल-बालमा,सूने हैं दिन-रैन || (४)


खुल्लमखुल्ला कर दिया,मेघों ने ऐलान |
सूरज की साजिश यही,नहीं बचे इंसान || ५)


जामुन काले हो रहे,बचा न उनमें स्वाद |
आम बिना टपके गिरें,मीठापन बर्बाद || (६ )

31 मई 2012

निखंड घाम में !



निखंड घाम में काम करता आदमी,
पसीने को भी तरसता है ,
बंद कमरों में बैठे भद्र जन
बाहर का तापमान नाप रहे हैं ||

निखंड घाम में बाहर जाता आदमी
होठों से प्यास को दबाता है,
मॉल में घूमते बड़े लोग
ठंडी बियर डकार रहे हैं ||

निखंड घाम में सफ़र करता आदमी
गमछे से मुँह ढाँपता है,
बी एम डब्ल्यू में बैठे लोग
पॉप संगीत पर ठहाके मार रहे हैं ||

निखंड घाम में घर लौटता आदमी
एक नींबू के लिए मोलभाव करता  है,
कोठियों में आते संभ्रांत जन
अंगूर की पेटियाँ ला रहे हैं ||