जड़ से सबको साफ़ किया
फिर कहते हैं माफ़ किया !
लाठी-गोली बच्चों को दी
कहते हैं इंसाफ़ किया।
‘डायर’ बनकर हमला बोला
कायर बनकर माफ़ किया।
जो भी सच की हाँक लगाता
उसको वतन-ख़िलाफ़ किया।
फ़स्ल ज़हर की पकी खड़ी है
काटो निकलो माफ़ किया !
जड़ से सबको साफ़ किया
फिर कहते हैं माफ़ किया !
लाठी-गोली बच्चों को दी
कहते हैं इंसाफ़ किया।
‘डायर’ बनकर हमला बोला
कायर बनकर माफ़ किया।
जो भी सच की हाँक लगाता
उसको वतन-ख़िलाफ़ किया।
फ़स्ल ज़हर की पकी खड़ी है
काटो निकलो माफ़ किया !
चुप्पी के भी अर्थ बड़े हैं
यूँ ही ताले नहीं जड़े हैं ।
संविधान को घोट रखा है
लोकतंत्र की राह अड़े हैं ।
बच्चों को पुचकारी देकर
डंडा-लाठी लिए खड़े हैं।
पेपर लीक तमाशा लगता
रोजगार ख़ुद लिए पड़े हैं ।
आँसू सूख चुके हैं उनके
अब तो केवल काँट गड़े हैं।
दुनिया उलट-पुलट हो जाए
कुर्सी और ज़ुबाँ जकड़े हैं ।
मौन तभी टूटेगा अब तो
राम कहें ‘प्रभु आप बड़े हैं’।
-संतोष त्रिवेदी
किसी के आँसुओं पर मत हँसो,
आह उसकी ख़ाक कर देगी तुम्हें।
तख़्त पर बैठा नहीं रहता कोई
इक दिन जमीं ही आसरा देगी तुम्हें।
दक्षिणा देना ग़लत कब से हुआ
पर रसीद उसकी गिरा देगी तुम्हें।
सियासी चाल चलिए ख़ूब लेकिन
धूल में भी ये मिला देगी तुम्हें ।
शायर फिर से बोला है,
ज़हर फ़िज़ा में घोला है।
रोज़ सियासत रिसती है,
जब भी मुँह खोला है।
कट्टरता,पाखंड में चुप्पी,
रंगा मज़हबी चोला है।
पक्के गाँधीवादी ठहरे,
हाथ ‘अहिंसा-गोला’ है।
मज़हब सबसे ऊपर है,
असली यही फफोला है।
‘हम सब मानव हैं पहले’
शायर क्यूँ ना बोला है !
—संतोष त्रिवेदी
#MunawwarRana