लेखक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लेखक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

15 अप्रैल 2014

मैं भी लिखूँगा किताब ....!


मैं भी लिखूँगा किताब
और नोच लूँगा एक झटके में सारे नकाब
उतार दूँगा खाल उसकी
पर इससे पहले उसे
मौन तो होने दो
मुर्दा होगा तो सहूलियत होगी नोचने में
बन जाऊँगा एक झटके में लेखक
और हाथ में दाम के साथ आएगा काम भी.
क्या कहते हो,क्या लिखूँगा ?
तुम मूर्ख हो इतना भी नहीं मालूम
क्या लिखा है इससे ज्यादा ज़रूरी है
किस पर लिखा है,कब लिखा है,क्यों लिखा है ?
मैंने तय कर लिया है
लिखूँगा धारा के साथ
लहर से खेलते हुए
भँवर और तूफ़ान से बचते
नदी के किनारे-किनारे
कीचड़ से मिलते हुए
लिखूँगा बाढ़ और प्रलय के गीत
मनु और शतरूपा को ठेंगा दिखाते हुए
हँसूँगा विजन में सिंह की दहाड़ से डरे पशुओं पर
और छाप दूँगा उन्हें अपनी कविता के मुखपृष्ठ पर
कलम से क्रांति की अगुवाई करूँगा
करूँगा कुटम्मस एक-एक कर उनकी
जिन्होंने किया था दरकिनार मुझे
किताब लिखकर साहित्य से और उनसे
ले लूँगा बदला,भले कुछ हो जाए
क्योंकि किताब लिखने से
उसके छपने-बिकने से ही

हम लेखक बनने वाले हैं
अच्छे दिन आने वाले हैं !

17 मई 2012

लेखक या ब्लॉगर होने के नाते !

 

अकसर ऐसा क्यों होता है कि हम समाज या मौज-मजे के लिए लिखते-लिखते व्यक्तिगत आक्षेपों या तुच्छ बहसों में आकर उलझ जाते हैं ? यह ऐसी संक्रामक बीमारी है कि हम इससे अछूते नहीं रह सकते।चाहे बड़े लेखक हुए हों,कवि या आज के ब्लॉगर ,सभी कभी न कभी इस अवस्था से दो-चार होते हैं।कुछ लोग ज़रूर थोड़े सयाने दिखते हैं जो इन बातों को नज़र-अंदाज़ करके निकल जाते हैं पर इससे पूर्णकालिक समाधान नहीं मिलता।

हम अगर इस भागमभाग ज़िन्दगी में थोड़ी देर आराम से सोचें कि हम क्यों और क्या लिखते हैं तो शायद कहीं ज़्यादा सार्थक बातें बाहर आएँगी और इस का उत्तर भी । ऐसा नहीं है कि हमारे लिखने भर से समाज या देश में क्रांति आ जायेगी पर  अगर इस लिखने से कहीं कुछ हलचल होती है,बहस शुरू होती है या खालिस मनोरंजन ही होता है तो भी संतोष की बात है।दिक्कत तब होती है ,जब आपके लेखन को नकारात्मक दिशा में मोड़ने का प्रयास होता है और आप इस जाल में फंसकर वही करने लग जाते हैं जो दूसरों का उद्देश्य होता है।

सबसे ज़रूरी बात लिखने के लिए यही है कि खुले मन से ,बिना किसी दुराग्रह के ,यदि हम कुछ लिख रहे हैं तो समाज और देश के लिए तो अच्छा होगा ही,हमें भी सुकून देगा । हम अपने अजेंडे पर ही कायम रहें और सार्थक व स्वस्थ लेखन करते रहें तो ही हमारा लिखना सही मायने में लिखना होगा।लिखने का मतलब केवल पन्ने और जगह भरने से व अपने बने रहने के लिए बिलकुल नहीं होना चाहिए। अगर लिखने वाले होकर भी इतनी-सी बात समझ में न आ पाए तो काहे के लेखक ?

यहाँ मैं इस बात पर ज़रूर ज़ोर देना चाहूँगा कि गंभीर-लेखन में बनावट या दोहरेपन से बचे रहना ज़रूरी है।हम लिखें तो खूब आदर्श, मानवता और संवेदना की बातें मगर असल ज़िन्दगी में हम इनसे कोसों दूर हों,तो फिर हम किसके लिए लिखते हैं ?यदि हम अपनी कही बातों को खुद अमल में नहीं ला पाते तो उसका असर भी नगण्य होगा और हम हँसी के पात्र होंगे ।हमारी लिखने और पढ़ने की योग्यता हमारे मुँह और कलम से निकले शब्दों से ध्वनित हो जाती है।एकबारगी मुँह से भले ही हम भूलवश कुछ अन्यथा निकाल दें पर लिखे हुए का अभिलेख होता है और इसमें हल्कापन बिलकुल उचित नहीं ।

लेखक या ब्लॉगर इसी समाज का हिस्सा हैं।हमारे बीच में विचारों को लेकर तो टकराहट होनी चाहिए पर यह टकराहट किसी के व्यक्तित्व को चोट पहुंचाए बिना ही हो।बड़े लेखक और कवियों के भी आपस में मनमुटाव होते रहे हैं पर वे इसे सद्भाव और आपसी संबंधों के खराब होने की हद तक  नहीं ले गए । अगर हम समाज को दिशा देने वाले बनते हैं तो समाज को वास्तव में अपने बड़प्पन से कुछ दें,न कि झूठे अहंकार में डूबे रहें।यह जिम्मेदारी लेखक या ब्लॉगर होने के नाते हम पर ज़्यादा है क्योंकि यही वर्ग उपदेशक भी अधिक है । कभी लिखने से मौका मिले तो इस विषय पर भी सोचें ।

 

12 दिसंबर 2011

लेखक बड़ा या ब्लॉगर ?


 बचपन से ही पढ़ने-लिखने का शौक रहा है.बाज़ार  या मेले जाता तो कोई खाने की चीज़ न लेकर एक-दो किताबें ज़रूर धर लेता ! किताबों या पत्रिकाओं की दुकान पर जाना निश्चित था.साहित्यिक पुस्तकों का पढ़ना अब भले ही कम हो गया हो,पर समाचार पत्रों  (एक दिन में कई-कई ) का क्रेज बदस्तूर जारी है !लिखने की हुडक भी तब से लगातार जारी है,पर पहले डायरियों में,फिर अख़बारों,पत्रिकाओं में 'संपादक के नाम पत्र' लिखकर अपनी छपास की प्यास बुझा लेते थे.अब जब से यह ब्लॉगिंग का प्लेटफॉर्म  मिला है,न कोई छपने-छपाने की आशंका,काट-छाँट का डर और न हर्रा-और फिटकरी की खोज ! विचार जब उबलने शुरू हो गए ,की-बोर्ड पकड़कर खटर-पटर करने लग गए !


ब्लॉगिंग के क्षेत्र में आकर हम 'लेखक' कहलाने का भी अवर्णनीय आनंद उठाने लगे पर क्या एक ब्लॉगर एक लेखक भी है ,इस विषय में ज़रूर मेरी कुछ मान्यताएं अब बन गयी हैं लेखक जब लिखता है उसे गंभीरता और साहित्यिक -स्पर्श देता  है, लिखने के बाद उस पर किसी प्रतिक्रिया की दीर्घकालीन अपेक्षा रखता है ,उसकी प्रतिक्रिया देर से आती है तो उसका प्रभाव भी चिरकालीन या सदा-सर्वदा रहता है,उसके लेखन से उसके सहृदयता की पहचान मुश्किल होती है,लेखक अपने पाठक से सीधे संवाद की स्थिति में नहीं रह पाता,ऐसे में उसका लेखन एकपक्षीय होता है.लेखक के पाठक ज़्यादातर सिर्फ पाठक होते हैं ,लेखक नहीं ! इसलिए उसका पढ़ा जाना पारस्परिक आदान-प्रदान नहीं होता !


लेखक लगातार अच्छा  लिखने से ही महान बन पाता है, इस वज़ह से उसमें अहंकार का इलहाम भी नहीं आ पाता  या देर से आता है.लेखक तथ्यपूर्ण लिखने का अधिकतम प्रयास करता है क्योंकि उसके एक बार लिख लेने के बाद संशोधन की गुंजाइश सुगम नहीं होती.लेखक का विस्तार व्यापक होता है और वह भी बिना किसी नेटवर्क के ! पाठक के लिए लेखक एक सेलेब्रिटी हो जाता है.उसके लिखे का अर्थ होता है और वह अर्थ भी पाता है !लेखकों के भी गुट होते हैं पर इनसे पाठकों का ज़्यादा लेना-देना नहीं होता ! ये गुट उन्हें पुरस्कार दिलाने के काम भले आते हैं !


एक ब्लॉगर जब चाहे ,जितना चाहे लिख सकता है. एक नहीं दर्जनों ब्लॉग बना सकता है,भले ही उनमें लिखना कम या निरर्थक-सा रहे.साहित्यिक-स्वाद भी मिल सकता है पर गंभीर और उत्तम कोटि का साहित्य ढूँढना मुश्किल-सा है.निरा साहित्य पढ़ने के लिए नामी-गिरामी और स्थापित लेखक (मुंशी प्रेमचंद,निराला,प्रसाद आदि )कहीं बिला थोड़ी गए हैं.ब्लॉगिंग  हलके-फुल्के लेखन और मनोरंजन का भरपूर जरिया है .इसी आड़ में कई लोग अपनी निरर्थक-भड़ास भी उडेलने लगते हैं,पर उन्हें न पढ़ने का विकल्प तो है ही ! यदि आप टीपों की संख्यात्मकता के प्रति संवेदनशील नहीं हैं तो कुछ अच्छे और  साहित्यिक ब्लॉग भी मिल जायेंगे !


ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी खूबी यह है कि आप इसके ज़रिये अपने पाठकों (जो स्वयं ब्लॉगर होते हैं) से सीधा जुड़े होते हैं. अपने लिखे पर उसकी त्वरित-प्रतिक्रिया ले-दे सकते हैं.हालाँकि ,ज़्यादातर मामलों में यह संवाद दो-तरफ़ा होता है.यदि कहीं आप टीपते हैं ,तभी प्रति-टिप्पणी की  सम्भावना अधिक  होती है.थोड़ी-बहुत नकारात्मकता के बाद भी यह संवाद-शैली इसको दस्तावेजी-लेखन से बेहतर बनाती है.


ब्लॉगिंग का एक स्याह-पक्ष यह भी है कि थोड़ा-सा गरुआ जाने पर आप की आत्मीयता और सहृदयता की पोल भी खुल जाती है.यदि आप आत्म-श्लाघा नामक बीमारी से प्रेरित हो गए तो आप कई लोगों के प्रेरक भी नहीं रह पाते. जहाँ लेखक केवल लिखकर प्रेरणा देता है,वहीँ इस विधा में लिखना और टीपना दोनों आवश्यक हो जाते हैं. कुछ लोग अपने को लिखने से भी बड़ा मानने लगते हैं जबकि कोई भी लिक्खाड़ उतना ही आदर्शवादी,सहृदय होता है जितना वह अपने लेखन में दर्शाता है. इस तरह ब्लॉगर को मानवीय संवेदना-युक्त  होना ज़्यादा आवश्यक है,क्योंकि उसकी ब्लॉगिंग की लोकप्रियता  संख्यात्मकता पर अधिक आधारित हो सकती है,गुणवत्ता पर कम !


इस तरह ब्लॉग-लेखन आपसी संवाद का जरिया ज्यादा है,साहित्य भूख मिटाने का कम.अब ब्लॉगिंग की धमक प्रिंट-मीडिया ने भी महसूसी है,लगभग हर समाचार-पत्र नियमित रूप से ब्लॉग-पोस्टें छाप रहे हैं. इसलिए इधर ब्लॉग-लेखन में भी गंभीरता आई है.लेकिन एक ब्लॉगर को लेखक समझ लेना भरम ही है और जितनी जल्दी यह भरम मिट जाय ,ब्लॉगिंग सुखद ,आत्मीय और पारिवारिक लगेगी !