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9 अक्टूबर 2013

नारी-शक्ति के मायने !

जब नारी-शक्ति की बात होती है तो सामान्य लोग इसे लैंगिक आधार पर देखने लगते हैं। इस तरह उनको लगता है कि यह स्त्री के पुरुष से अधिक शक्ति की बात है,जबकि ऐसा नहीं है। नारी सृजन का पर्याय है और सृष्टि में संतुलन के लिए वह अपनी शक्ति का प्रयोग करती है। इसमें सृजन और संहार दोनों समाहित हैं। इस प्रक्रिया में पुरुष भी एक तत्व है पर इसका मतलब नारी उसके विरुद्ध है,उचित नहीं है।
नर-नारी की तुलना करने के बजाय नारी-शक्ति को समझना चाहिए। लैंगिक आधार पर गुण-अवगुण दोनों में विद्यमान होते हैं पर सृजन के आधार-स्तंभ के रूप में  देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि लैंगिक-दृष्टि से देखने पर हम नारी के अर्थ और उसकी महत्ता को संकुचित कर देते हैं। शक्तिस्वरूपा नारियों ने बिना कोई लिंगभेद किए आसुरी-प्रवृत्तियों का नाश किया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि नारी को शक्ति कहने के पीछे कोई पुरुष-विरोधी मानसिकता नहीं है। यह भी सही नहीं है कि नारी को हम देवी-स्वरूप देकर उसे केवल पूजा-पाठ की वस्तु मान लें। अतीत में समाज के कुछ चतुर लोगों ने अवश्य यह जाल फ़ैलाने का प्रयास किया और वही मानसिकता अभी तक बरक़रार है। नारी पर फूल-माला चढ़ाकर उसे एक प्रतिमा में बदल देना उसके अस्तित्व को बाँध देना है।
 
समाज में लैंगिक भेदभाव के चलते नारी को प्रमुखता न दिए जाने से उसका महत्त्व कम नहीं हो जाता । मुख्य बात यह है कि कोई भी अपनी सत्ता को क्यों छोड़ना चाहेगा ? यह आज हर क्षेत्र में हो रहा है,इसके लिए स्वयम को पहचानना होता है,तभी अधिकार मिलते हैं। जब तक आप अधिकार देने की बात करेंगे,देनेवाले को आप स्वतः महान बना देते हैं। कौन से अधिकार नारी के लिए उचित हैं या अनुचित हैं,इसका निर्णय भी वही ले सकती है। समाज में नारी की स्वतंत्रता को लेकर जो हल्ला मचता है,दरअसल वो निरर्थक और अनुचित है। नारी आज अपनी स्वतंत्रता और उसका दायरा बाँधने के लिए स्वयं सक्षम है। स्वतंत्रता की इस राह में उसे यदि खुली हवा के झोंके मिलेंगे तो अंधड़ के थपेड़े भी। समाज इस विषय में अपना विचार तो दे सकता है पर अध्यादेश नहीं जारी कर सकता।
 
नारी को हम जब तक केवल  लैंगिक  आधार पर ही देखते रहेंगे,हर बात पर पुरुष से तुलनात्मक अध्ययन करते रहेंगे,वह अबला और शोषित बनी रहेगी। साहित्य और समाज में नारीवाद का अलग खेमा बनाकर हम नारी-शक्ति को केवल सीमित और प्रतिस्पर्धी बना रहे हैं। नारी समाज का कोई खेमा या वाद भर नहीं है। यह समाज की सूत्रधार है। इसलिए उसकी अपनी महत्ता है,उसे किसी से मांगने की ज़रूरत नहीं है।  
 

19 दिसंबर 2012

अराजकता का जिम्मेदार कौन ?


 
जब से दिल्ली में चलती बस में बलात्कार की वारदात हुई है,संसद से लेकर सड़क पर खूब उबाल दिख रहा है। सड़क पर तो आम आदमी इस तरह के वाकयों के बार-बार होने से परेशान होकर निकल पड़ा और संसद में हमारे प्रतिनिधि तार्किक चिंताएं दिखाने में पीछे नहीं रहे। सड़क पर महिलाओं का गुस्सा क्षोभ,अपमान और व्यवस्था की निष्क्रियता से सातवें आसमान पर था। आम महिला की इस चिंता को समझना बिलकुल कठिन नहीं है। संसद के अंदर बैठे हुए हमारे कई प्रतिनिधि इसकी जघन्य भर्त्सना कर चुके हैं। कोई अपराधियों को फाँसी की सजा से कम पर मानने को तैयार नहीं तो कोई पुलिस-आयुक्त को हटाने पर आमादा है तो कोई इस बेबसी पर आँसू बहा रहा है । आखिर,ये जन-प्रतिनिधि किससे यह सब माँग कर रहे हैं जबकि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस व्यवस्था के यही लोग जिम्मेदार और गुनाहगार हैं !

बलात्कार जैसी घटनाएँ सीधे-सीधे कानून-व्यवस्था का मामला हैं। हमारे समाज में जब तक यह धारणा नहीं मज़बूत होगी कि किसी भी दुष्कृत्य के लिए अभियुक्त को जल्द और निश्चित रूप से उसके परिणाम भुगतने होंगे,तब तक ऐसी घटनाओं पर पचास बार फाँसी देने या गोली मार देने की सज़ा का प्रावधान महज़ कागजी ही रहेगा। आज यह धारणा पुख्ता हो चुकी है कि कोई  ,कहीं भी किसी महिला को छेड़ दे,उसे ज़बरिया उठा ले और यहाँ तक कि हवस पूरी करके मार भी दे तो कोर्ट-कचहरी में कुछ नहीं होना है। अव्वल तो कई मामले थाने या न्यायालय तक आते ही नहीं और यदि आए भी तो उनमें से अधिकांश सबूतों के अभाव में न्याय की दहलीज पर ही दम तोड़ देते हैं। इसलिए कई बार इन मामलों की शिकायत भी नहीं की जाती।

संसद में कई महिला-प्रतिनिधियों की चिंताएं सच्ची जान पड़ती हैं पर आखिर में कानून-व्यवस्था को लागू करना-करवाना आम जनता की जिम्मेदारी तो नहीं है। कानून अभी भी इतने कमज़ोर नहीं हैं पर मुख्य बात इन्हें लागू करने की है। जब हमारी राजनीतिक-व्यवस्था भ्रष्टाचार और अपने-अपने सत्तारोहण पर जुटी हुई हो,ऐसे में नौकरशाही या पुलिस-प्रशासन क्यों पीछे रहे ?हमारे प्रतिनिधि इस तरह की घटनाओं की सीधी जिम्मेदारी पुलिस-प्रशासन पर डालकर निश्चिन्त हो जाते हैं पर क्या सबसे बड़े जिम्मेदार वे स्वयं नहीं हैं?सरकार गरीबों को कैश-सब्सिडी का झुनझुना पकड़ाकर आत्म-मुग्ध हो रही है और उसकी लुटती हुई आबरू की कोई कीमत नहीं है.यह आम जनता के साथ मजाक नहीं तो क्या है ?हास्यास्पद तो यह है कि कानून-व्यवस्था तहस-नहस होने पर सरकार और हमारे प्रतिनिधि ही चिंताएं भी ज़ाहिर कर देते हैं. आखिर जनता ने सत्ता की लगाम जिनको सौंपी है तो किसी भी प्रकार की अराजकता  होने पर वे पल्ला कैसे झाड़ सकते हैं ?

आज पूरे देश में कानून का कोई खौफ नहीं है। जिसको जो मन में आ रहा है,कर रहा है। संसद में हमला करके,हत्याएं-बलात्कार करके,सरे-आम उगाही करके भी अगर कोई सुरक्षित रह सकता है तो ऐसे जंगलराज में कोई क्यों डरे ?हम पूरी तरह से अराजक-राज में रह रहे हैं। अब ज़रूरत केवल कानून के राज को स्थापित करने की है,संसद में भाषणबाज़ी करने की नहीं। ऐसा न हो पाने पर वहाँ फफक-फफककर रोना महज़ घडियाली आँसू बहाने से ज़्यादा कुछ नहीं है।