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15 सितंबर 2026

यूपीआई

सरकार हमरिही फिरिउ आइ 

तुम चिल्लाओ यूपीआइ।


जीडीपी कै ग्रोथ बढ़ी है 

तुम्है द्याँह मा चरबी छाइ।


काम तो करिहैं पूरा वई 

ट्रंप के आगे झुकि झुकि जाइ ।


बोकला ल्याहैं छीलि तुम्हार 

तुम्हई समझ मा मुला न आइ।


रुपिया अउँधा डॉलर आगे 

अब मुर्दा भै यूपीआइ !


आपनि सेहत ख़ूब चक्क है 

हम तो भइया भैंसि चराइ !!


7 सितंबर 2026

 घर में रहते घर ढहते, 

बाहर जाते पुल ढहते,

सड़कें धँसतीं, गड्ढे हँसते, 

वो केवल ‘फू-फा’ करते!


जान हमारी सबसे सस्ती, 

मौत की पूरी गारंटी,

अच्छे दिन फिर भी आए, 

दसों दिशाओं में कहते!


असमय जिसका लाल गया, 

माता विकल दुआर ताकती,

कब लौटेगा राजा बेटा, 

वो राहत का दम भरते!


लूट-खसोट औ कदाचार पर, 

बात अगर कोई करता,

नक्सल कहकर वो चिल्लाते, 

बिकी मीडिया संग बहते !


मंदिर लूट छला हिंदू को, 

ख़ुदा को भी बेदख़ल किया,

सब धर्मों को ख़ूब निचोड़ा, 

फिर ख़ुद को रक्षक कहते!


-संतोष त्रिवेदी

6 सितंबर 2026

 घोर बादल प्रलय के छँटने लगे हैं,

वो फिर पुराने वायदे रटने लगे हैं।


मंच कोई भी नहीं वो छोड़ते हैं अब,

ख़ुद की कही हर बात से हटने लगे हैं।


पढ़ने-लिखने का कोई मौसम नहीं रहा,

धर्म माथे पर सजा, मैदान में डटने लगे हैं।


नायक नए तैयार होते जा रहे हैं रोज़,

इंसाफ़ और सच भीड़ में पिटने लगे हैं।


रहनुमाओं से हमें उम्मीद अब भी ख़ूब है,

झूठ के परचे हमारे हाथ से बँटने लगे हैं !


लूट जारी है मुसलसल देश भर में आपकी,

हे राम! यह सब देखकर आइने फटने लगे हैं !


— संतोष त्रिवेदी


2 सितंबर 2026

अव्वल दर्जा

 वोट चुराकर वो उछले हैं,

जीडीपी में फिर फिसले हैं।

झूठा डाटा पेश कर रहे 

देखो वो कितने छिछले हैं!


आत्म-मुग्ध रहते ये हरदम,

काम न कोई अच्छा है।

हारी बाज़ी हरदम जीतें,

लोकतंत्र के ये पुतले हैं!


देश की मिट्टी रोज़ कुरेदें,

पुरखों की मूरत ढँकते।

भाईचारा ताक पे रक्खा 

मछली ताके वो बगुले हैं!


रोज़ उठाए फिरते झोला,

तंत्र, न्याय सब मुट्ठी में।

जल, जंगल, ज़मीन सब बेचा,

मंदिर तक में अब घपले हैं!


हिंदू-मुस्लिम राग अलापें,

राष्ट्रवाद के चोले में।

हम तो समझ रहे थे दोयम,

अव्वल दर्जे के निकले हैं!


- संतोष त्रिवेदी

28 अगस्त 2026

अच्छे दिन

 अच्छे दिन तो अब आए हैं !

घर कै सक्कर महँगी होइगै,

गाड़ी सब एथनॉल सुरुकि गै।

रूपिया लुढ़कि पहुँचिगा सौ तक,

रोजगारौ सरकार डकरि गै॥

कर्ज़ामाफ़ी साहेब के भै,

रामदीन धक्का खाए हैं।

अच्छे दिन तो अब आए हैं !!

हम मंदिर-मसजिद भटकि रहेन,

वी साख बढ़ाए हैं बिदेस मा।

जब जब कस्ट मिलत पब्लिक का,

रील-रूप धरि लेत देस मा।

भक्त अउर भगवान क लूटैं,

यह समरसता लाए हैं।

अच्छे दिन तो अब आए हैं!!

धनी उड़ावैं मउज, बूड़ि गै

गाँव-गिराँव किसानी।

वोट लूटि ल्यो,देस लूटि ल्यो,

बचै न एकु निसानी।

रास्ट्र गीत रमदिनवा गावै,

तुम करौ ट्रंप-जजमानी।।

आँधरि-बहिरि बनायो पब्लिक,

पत्रकार सब बउराए हैं। 

अच्छे दिन तो अब आए हैं !!


-संतोष त्रिवेदी

8 जून 2020

बुरे दिनों में ईश्वर

बचपन में 

बहुत मानता था ईश्वर को

पढ़ते हुए भी कभी नहीं छोड़ा उसे

शालिग्राम की बटिया को कराता था स्नान 

और कंठस्थ कर लिया था सुंदरकांड 

सुनता था साधुओं के मुख से निकले ब्रह्म-स्वर

और आनंदित था ‘स्व-धर्म’ में चलते हुए।


तब कभी जब डर लगता

रात में गाँव वाले पीपल के पास से गुजरते हुए

तो जपने लगता हनुमान चालीसा 

भूत भी भागते थे सरपट 

बिना किसी लाठी या डंडे से मारे 

ईश्वर ही मेरे लिए सरकार थी।


और अंततः एक दिन बड़ा हुआ 

पढ़-लिखकर समझदार और आत्म-निर्भर बना

ईश्वर को धर दिया था कहीं दूर 

अब न डरता था किसी से

न झुकता था किसी ईश्वर के सामने 

स्कूल में जब बच्चों को पढ़ाता कबीर को 

तब हँसता था उसकी हाज़िरी पर 

बिना यह जाने कि ईश्वर भी हँसता होगा 

हमारी मूढ़ता और अलपज्ञता पर

हम रोज़ बढ़ रहे थे नास्तिकता की ओर

अक्सर रहते थे नाराज़ सरकार से 

 कि न जाने क्यों

शिक्षालय और हस्पतालों के बदले 

वह बनवाती है देवालय 

और स्थापित करती है मूर्तियाँ


उसकी दूरंदेशी तब समझ आई

जब मौत से भी अधिक डराने लगी महामारी


सरकार दूरदर्शन पर रोज़ आने लगी

बंद पड़ा रेडियो चल पड़ा

‘घरबंदी’ में जब सब कुछ बंद था

चुपके से घर में आ गया था ईश्वर

मानो सारी सत्ता के साथ हमें भी सौंप दिया हो उसे 

चूँकि ईश्वर ख़ुद नहीं बोलता

तो स्वयं बोली सरकार 

“तुम्हें कुछ नहीं होगा 

हम हैं तुम्हारे साथ आख़िरी वक़्त तक 

बस तुम हौसला बनाए रखो इस पैकेज के साथ।”

हमने बजाईं तालियाँ इस पर

लट्टू हो गया था सरकार की उदारता पर


पर उस हौसले को सबसे पहले उसने ही छोड़ा

फिर छोड़ दिया मज़दूरों को उनके हाल पर

आत्माओं को रौंदती रहीं सड़कें

हम फिर भी बचे रहे

रुक-रुक कर थाली पीटते रहे

फिर यकायक एक दिन

उसने विज्ञापन में बताया कि सब कुछ ठीक होगा

ईश्वर पर भरोसा रखो

और उसने खोल दिए सभी देवालयों के कपाट

 बंद करके ज़िंदगी का आख़िरी रोशनदान

और हमें धकेल दिया फिर से उसी ईश्वर के पास

जिसे हम समझदार होने से ऐन पहले

छोड़ आए थे पाखंड और प्रपंच की तरह 

फिर से उसका आह्वान आरंभ किया है 

कर रहा हूँ पुनर्पाठ चौपाई और मंत्रों का

फ़िलवक्त कबीर को रख दिया है ‘होल्ड’ पर 

भूल चुका हूँ पुराने पाठ और तर्क

जान चुका हूँ असली सरकार कौन है

भले ही बोलता नहीं है ईश्वर

पर ध्यान से सुनता तो है हमारी


हमें फिर से ईश्वर के हँसने की आवाज़ सुनाई दे रही है !


संतोष त्रिवेदी 

०८/०६/२०२०