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20 नवंबर 2011

ब्लॉगिंग जब नशा बन गया !

पहले बता चुका हूँ  कि ब्लॉगिंग का विधिवत श्रीगणेश प्रवीण त्रिवेदी जी के मार्ग-निर्देशन में हुआ.इसके बाद रफ़्ता-रफ़्ता यह सफ़र शुरू हुआ.इस दरम्यान मैंने कई ब्लॉग्स झाँके,टटोले और कहीं टिके भी ! मेरे ब्लॉग पर प्रवीण पाण्डेय जी  का आना उल्लेखनीय रहा.मैं इस वज़ह से उनके ब्लॉग पर पहुँचा और बिलकुल अलग अंदाज़ ,स्टाइल का  अनुभव महसूसा ! प्रवीण जी का ,हर टीप का उत्तर देना ,उन्हीं  से सीखा,बाद में उन्होंने यह कर्म बंद कर दिया तो अपुन ने भी. अब हर टीप के बजाय ज़रूरी टीप का ही उत्तर देता हूँ !उन्होंने एक नवोदित-ब्लॉगर को जिस तरह नियमित रूप से (बिला-नांगा किये )  सहयोग किया ,इसका बहुत आभारी हूँ !


इस बीच ई पंडित से भी यदा-कदा तकनीक के बारे में बातें होती रहीं.निशांत मिश्र से भी परिचय हुआ .ज़बरदस्त ब्लॉगर अजय कुमार झा  से  भी संपर्क हुआ और मुलाक़ात हुई ! डॉ. अमर कुमार जैसे वरिष्ठ भी मेरे ब्लॉग पर आकर आशीर्वाद दे गए,जिससे बड़ी प्रेरणा मिली .इसी मिलने-मिलाने के क्रम में भाई अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी से विशेष जुड़ाव हुआ और कई मुलाकातें भी !भाई अमरेन्द्र के संपर्क से श्रीयुत अनूप शुक्ल जी  (फुरसतिया) से संपर्क सधा जो आगे जाकर एक क्रान्तिकारी घटना सिद्ध हुई ! मुझे अविनाश वाचस्पति जी  से भी विशेष स्नेह मिला,इंदु पुरी जी  जैसी लौह-महिला (असली वाली ) ने भी बड़ी शाबाशी दी.इन सबका भी विशेष आभार !



जैसा मैंने बताया कि फुरसतियाजी के माध्यम से जो संपर्क और जुड़ाव मुझे हुआ वाक़ई में उसने मेरी ब्लॉगिंग की सोच,शैली और रंग सब पर अहम् असर डाला.पहले मैंने ब्लॉगिंग को शौक़िया शुरू किया था  बिलकुल श्वेत-श्याम की  पुराने ज़माने की टीवी-स्क्रीन जैसा,पर उस एक संगत ने ब्लॉगिंग में कई तरह के रंग भरे और इसकी सेहत भी दुरुस्त करी ! औपचारिक लेखन से शुरुआत करने वाले एक नए कुदाड को ब्लॉगिंग के अखाड़े का एक खाया-पिया पट्ठा बनाने में इस गुरू ने अहम् रोल अदा किया.ये हमारे आदरणीय और हर कदम पर प्रोत्साहित करने वाले और कोई नहीं ब्लॉग-जगत के 'मर्द-ब्लॉगर' डॉ. अरविन्द मिश्र जी हैं.उनसे प्राप्त हुए अनुभव और बदलाव को बताने से पहले मैं यहाँ यह स्पष्ट कर दूँ कि  ब्लॉगिंग कोई अखाड़े का मैदान नहीं है और हम यहाँ कुश्ती लड़ने नहीं आये हैं,बल्कि हमारा प्रशिक्षण कुछ ऐसा हुआ कि  हम बिना नफ़ा-घटा  सोचे ,अपने भावों को निर्भीकता से प्रकट कर सकें !


जब मिश्रजी से हमारा संपर्क हुआ तो वह भी अप्रिय प्रसंग से ,पर बाद में तो हम ऐसे घुल-मिल गये  कि  हमने आपसी बोलचाल में औपचारिकता को भी तिलांजलि दे दी .मेरी बोलचाल में 'सुनो,देखो,चलो,करो...'आदि शब्द बैसवारा के अपने सहज-स्वभाव से उत्पन्न हैं,पर मिश्राजी को यह कतई नागवार गुजरा और इतना कि इस बहाने उन्होंने मेरा ''प्रमोशन ' भी कर दिया.मिश्राजी ने मुझे लिखने  का ऐसा मन्त्र दिया कि ब्लॉगिंग मेरा नशा बन गया.कई पोस्टें उनकी प्रेरणास्रोत रहीं.उनके संपर्क में आने पर दोस्त अधिक और दुश्मन कम (बस दो,कृपया नाम न पूछियेगा) मिले.सतीश सक्सेना जी ,अनुराग शर्माजी  , डॉ.दराल  , देवेन्द्र पाण्डेय जी (बेचैन आत्मा ),पाबलाजी और अपने अली साहब  जैसे वरिष्ठ ब्लॉगर उन्हीं के संसर्ग में मिले !


जो सबसे ज्यादा बात मुझे प्रभावित करती है वह यह की मिश्राजी का ब्लॉग केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है.यहाँ लेख के बाद बक़ायदा एक लम्बा संवाद चलता है जो कई बार बड़ा रुचिकर लगता है.दूसरी  जगह इस वज़ह से लोग शायद ही बार-बार जाते हों कि  अब 'इस' कमेन्ट का क्या उत्तर आया ! क्वचिदन्यतोsपि महज़ एक ब्लॉग नहीं बल्कि भरा-पूरा शिक्षण-संस्थान  है,जहाँ सीखने वाले को अपनी भावनानुसार  हर तरह की सीख दी जाती है.उनके पास ऐसा 'मसाला' है जिसे वे अपनी पोस्ट में तड़का देकर लंबे संवाद की नींव रख देते हैं !उनके लेखन में  तंज,चिकोटी और चुटकी तीनों का भरपूर सम्मिश्रण है !


मैंने जो काम शौकिया  शुरू किया था उसे दीवानगी की हद तक अरविन्दजी ने परवान चढ़ाया,जिसके लिए हमें 'घर' से शिकायत भी मिलती रहती है,पर अब यह सब मेरी रूटीन में आ चुका है.यह ऐसा अनोखा संपर्क है कि  जिसमें किसी से मिले बिना ही आप उसके इस हद तक दीवाने हो जाएं ! अमूमन हमारे शौक भी एक जैसे हैं.मेहंदी  हसन और मुन्नी बेगम के हम जहाँ कद्रदान हैं,वहीँ मिश्राजी इनके बड़े वाले 'फैन' ! हाँ ,अभी एक चीज़ से हम महरूम हैं.अभी मिश्राजी ने मुझे दोस्ती के  खिताब से नहीं नवाज़ा है,इस पर वो कहते हैं कि इसका लाइसेंस केवल सतीश सक्सेना जी और अली साब के ही पास है. मैं फिर सोचता हूँ कि जिस तरह वे मुझसे घुलमिल कर बातें करते हैं,मेरी नालायकियों  को नज़र-अंदाज़ करते हैं,वह दोस्ती के सिवा क्या हो सकता है ?बिलकुल 'गुन प्रकटे  अवगुननि दुरावा' की तर्ज़ पर !


मुझे कई बार लगता है कि क्या इस आभासी-दुनिया में मात्र लिखने-लिखाने से भी कोई इतना अपना बन जाता है जो किसी की लेखन-शैली में मूलभूत अंतर ला देता है.अब मैं कहीं ज़्यादा आत्मविश्वास से कम्प्यूटर के की-बोर्ड से छेड़छाड़ करता हूँ,सहज महसूस करता हूँ,और जो बात सबसे मार्के की है कि खूब निचो-निचो के रस पीता हूँ ,मौका मिलते ही लेखों को पढता और टिपियाता हूँ.

डॉ. अरविन्द मिश्र 
ब्लॉग-जगत ऐसे ही अक्खड और फक्कड ढंग से अलख जगाने वाले लोगों की वज़ह से जिंदा और रस-युक्त है,नहीं तो इसे गंदला और मटमैला करने वालों की भी गिनती कम नहीं है. अरविन्द मिश्र जी से ,हो सकता है कई लोग कुछ बातों में असहमत हों,पर उनका ब्लॉग-जगत में होना हम जैसे प्रशंसकों से ज़्यादा उनके लिए अपरिहार्य है ! वे हैं तो वस्तुतः विज्ञानी लेकिन मानव-मनोविज्ञान पर उनकी ज़बरदस्त पकड़ है ! विज्ञान  का  उनका अलग  से विज्ञान-ब्लॉग  है !


मेरी ब्लॉगिंग को जहाँ प्रवीण त्रिवेदी जी ने ककहरा सिखाकर शुरू किया,उसे आदरणीय मिश्रजी ने परवान चढ़ाया,उसमें रंग मिलाया !अपने इस गुरू को सादर नमन और शुभचिंतक दोस्त को प्रेमालिंगन !




* अरविन्द मिश्रजी का चित्र उनकी घोर-आपत्ति के बाद बदला गया,क्योंकि उनको आशंका थी कि  कुछ लोग उसे देखकर बिदक सकते हैं.

*जब मिश्र जी के चित्रों पर इतना कौतूहल हो रहा है ,सो हम यहाँ पर लिंक दे रहे हैं,जिससे दर्शनार्थी कृतार्थ हो लें !

20 सितंबर 2011

न जाओ सैंया,छुड़ा के बैंया !

आजकल पितर-पक्ष चल  रहे हैं !हिन्दू मान्यताओं के अनुसार कुछ बढ़िया या अच्छे काम इस समय नहीं किये जा सकते ! पर,ब्लॉग-जगत में कुछ ऐसा होने की घनघोर आशंका हो गयी है.इसलिए हम सभी को ऐसा न होने देने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देना चाहिए !हम तो ब्लॉगिंग में रस और मज़ा लेने आये थे,वह मिलना शुरू ही हुआ था कि इसका मुख्य-तत्व 'मसखरापन'(नौटंकी से तौबा) गायब होने की मुनादी पीट दी गयी है !

ब्लॉग-लेखन में उस समय भयानक कोहराम मच गया जब मसखरेपन ने इस ज़मात से बाहर होने की घोषणा कर दी.जितने भी गंभीर-टाइप के ब्लॉगर हैं उनको तो साँप ही सूँघ गया ! अब लिखने-लिखाने के बाद फ़ुरसत के क्षणों को हम सब लोग कैसे समायोजित करेंगे,यह परेशान करने वाला सवाल उठ खड़ा  हुआ है.

मसखरेपन का सबसे बड़ा कष्ट टीपों को लेकर है.उसका मानना  है कि टीपें इतनी मसखरी और मारक हो गयी हैं कि अब हमारे ऊपर ही भारी पड़ने लगी हैं.अगर ऐसे ही चलता रहा तो पोस्ट में जो 'लौह-तत्व' है ,वह भी बर्फ की  मानिंद ठंडा और कुंद हो जायेगा !इस सबसे बचने के लिए हालाँकि उसने शुरूआती और अहतियाती कदम उठा रखे हैं फिर भी मुँहनोचवा-क़िस्म के लोग अपनी आदत से बाज़ नहीं आ रहे हैं.लौह-तत्व की संरक्षा के लिए बकायदा टीपों को छानने का इंतज़ाम है.इसमें केवल पारिवारिक-सदस्य अपना प्यार ,मनुहार उड़ेल सकते हैं.और हाँ,ज़रुरत के अनुसार पिता,माँ,और भाई की संख्या घटाई-बढ़ाई जा सकती है !


अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे मसखरेपन ने मचान पर फिर चढ़ाई कर दी है,'सबते कठिन जाति अवमाना' का भी टोटका किया गया  है !उस पर विदेशी-आक्रमण भी लगातार हो रहा है तो कोई उसे छीलने में जोर का अट्टहास लगा रहा है,यह  हम सबके लिए भी चिंता का सबब होना चाहिए.आखिर जब मसखरेपन का तत्व ही नहीं अस्तित्व में होगा तो हम सिरफिरे और नाकारा लोग अपनी टीपों में धार कैसे ला पाएँगे ?


अभी भी समय है.जिस तरह राजनीति में जबसे 'लालू-तत्व' गायब हुआ है,पत्रकारों और व्यंग्यकारों की कलम   निष्प्राण हो चुकी है,उससे कम गहरा संकट नहीं है इस मसखरेपन का जाना.इसलिए इन बुरे दिनों में इस तत्व को तिलांजलि देने पर हम क्यों तुले हुए हैं ? बार-बार ऊपर  चढ़ने से वह मचान या टंकी जो भी है,धंस जाए ,उसके पहले ही  इस अद्भुत व अनमोल तत्व को बचा लेना चाहिए ! क्या आप तैयार हैं ?



16 सितंबर 2011

टंकी-आरोहण नहीं नौटंकी है यह !

हमने अपने बचपन में नौटंकी का आनंद खूब लिया था. उत्तर प्रदेश की  यह लोकरंजक शैली अब लुप्त प्राय है,पर इसी को फिर से ब्लॉग-लेखन के ज़रिये जिंदा रखने की अद्भुत मिसाल सामने आई है !

ब्लॉग-लेखन में आये हमें अभी ज्यादा अरसा  नहीं बीता.आने का उद्देश्य अपने मन के अन्दर के भावों की सहज अभिव्यक्ति और एक छोटा-मोटा झंडा फहराने का शौक था.शुरू किया तो बहुत ज़्यादा उत्साहवर्धक परिणाम नहीं निकले.दो-चार टीपों तक के लिए तरसना पड़ रहा था,जिसमें अभी भी कोई बहुत उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है और न होने की गुंजाइश दिखती है.हमने भी कुछ 'स्वान्तः सुखाय' और कुछ समाज-हित का भरम समझकर लिखते रहे.

अचानक ही जैसे मेरी तन्द्रा भंग हुई और इसमें ब्लॉग-लेखन का ऐसा चेहरा भी दिखाई दिया जो जिसे किसी भी सूरत में ब्लॉगिंग नहीं कहा जा सकता है.मैंने यह ब्लॉग आरोप-प्रत्यारोप या किसी की व्यक्तिगत निंदा के लिए नहीं बनाया था पर पिछले दिनों ब्लॉग-जगत में कुछ ऐसी हरकतें की जा रही हैं जिन्हें न चाहते हुए भी कहना पड़ रहा है क्योंकि लगातार गलत चीज़ों को देखते हुए भी अनजान बने रहना कम से कम किसी रचनाकार  का कर्म नहीं है.मुझे बहुत पीड़ा के साथ कुछ तल्ख़  बातें उद्घाटित करनी पड़ रही है ,उम्मीद करता हूँ कि सुधीजन यह विवशता समझेंगे !


ब्लॉग-जगत की लौह-महिला के ब्लॉग पर  यह् पोस्ट पढ़ें और उसमें आई हुई टिप्पणिया देखें तो इस ब्लॉगिंग से ही 'घिन' का भाव पैदा हो जायेगा. वह ब्लॉग 'आत्म-प्रशंसा' का मठ और गाली-गलौज  का उत्पादन-केंद्र बन गया है.जी भरकर वरिष्ठ ब्लोगर्स को गरियाया जाता है,पर विरोध करने के लिए यदि आप चाहें तो उसमें सफलता संदिग्ध है क्योंकि यदि उसमें  कही गयी बातों से आपकी सहमति नहीं है तो आपकी टीप अस्तित्व में ही नहीं आएगी.'मीठा-मीठा गप्प और कड़वा-कड़वा थू' की तर्ज़ पर माडरेशन का सहारा उस ब्लॉगरा को लेना पड़ता है ,बावजूद इसके कि वह स्व-घोषित लौह-महिला है ! ख़ासकर, इसी पोस्ट में मेरी एक टीप प्रकाशित की गयी और बाद वाली नहीं !


यह सारी पोस्ट एक-आधी अधूरी टीप को लेकर लिखी गयी और इसी बहाने घटिया टीपों को इस पोस्ट में जगह दी गई .डॉ.अरविन्द मिश्र जी और अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी को नाम लेकर व्यक्तिगत खुंदक निकाली जाने लगी.जिसका मैंने बिलकुल संयत शब्दों में प्रतिवाद किया,पर मेरे अलावा कई अन्य वरिष्ठ ब्लागर्स  को बातें कहने से रोका गया और  उन के कथित भाई के द्वारा अभद्र टीपें वहां तो की ही गयीं डॉ. मिश्र के ब्लॉग पर भी की  गईं.यहाँ चालाकी देखिये कि उस वीर-महिला ने खुद तो माडरेशन लगा रखा है और डॉ. मिश्र के यहाँ नहीं है,जिसका अपने हितों के तईं भरपूर इस्तेमाल किया गया.लेखन से आनन्द की जगह ज़हर फैलाया  जा रहा है !


इस पोस्ट से पहले जो पोस्टें लिखी गईं  उनमें टीपों के लिखने पर ही खिल्ली उड़ाई गयी,उन्हें बद्बूदार कहा गया क्योंकि जो टीपें विरुदावली की श्रेणी में नहीं आतीं उनमें से उनको बदबू आती है.लगातार पिछली पोस्टों को देखा जाए तो कहीं भी सार्थकता नहीं है !यह इस बात का प्रमाण है कि उनका लेखन  किस दिशा और दशा में है? ब्लॉग-लेखन में टीपों  या तंज को इस रूप में परिभाषित किया जा रहा है.नए आदर्श और प्रतिमान गढ़े जा रहे हैं इसलिए भी मेरा लिखना आवश्यक हो गया ,फिर भी उस असभ्य ढंग से लिखी गई पोस्ट और उस पर की गयी अशालीन टीपों को मैं मैं यहाँ नहीं लगा रहा हूँ,वहीँ पर वह गंदगी रहे ,यही उचित है.


लौह-महिला का दाँव  इस पोस्ट के  लिखने और उनके तथाकथित भाई द्वारा खूब गरियाने के बाद भी अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने के कारण जब खाली जाता दिखाई दिया  तो उन महोदया ने अपने स्त्रीत्व की दुहाई दी और अपने लेख के अंतिम होने की घोषणा कर दी.इस उम्मीद में कि ब्लॉग-जगत में कोहराम मच जायेगा ! पर, हाय ! ऐसा भी  न हो सका .इस बीच इसी पोस्ट में 'रक्षाबंधन' का पर्व भी मनाया गया और उनके जाने से 'असहाय' और 'अनाथ' हो जाने वाले चंद लोगों के मान-मनौवल के बाद चंद घंटों बाद ही विधिवत पुनरागमन हुआ ! घोषणा यह होती है कि अब बिलकुल नए अंदाज़ में अवतरण होगा !


हँसी आती है इस आयोजन पर !डॉ. अरविन्द मिश्र ने ऐसे आयोजनों को 'टंकी-आरोहण' का नाम दे रखा है.इसका आशय है कि जब भी अपनी पोस्ट पर टीपों का अभाव होने लगे तो यह फार्मूला 'हिट' है! पर मैं समझता हूँ यह 'टंकी-आरोहण' नहीं पूरी नौटंकी है ! जिसमें ब्लॉग-लेखन के साथ खिलवाड़ किया जाता है.पात्र भी आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं.यह नौटंकी ख़त्म नहीं हुई है,'नई' ऊर्जा के साथ फिर से मण्डली बैठ गयी है और हम नए तमाशे के लिए तैयार रहें !क्या यही ब्लॉग-लेखन का उद्देश्य है ?


इतने पर भी एतराज नहीं है. आप स्वतन्त्र हैं,अपने ब्लॉग पर खूब खेल खेलें पर और यदि किसी से कोई आपत्ति है,जमकर गरियायें मगर यह क्या कि गालियाँ दे-देकर लिहाफ़ में दुबक जाएँ और आपके 'भक्त' आपको यह कहें कि 'लौह-महिला का ख़िताब ऐसे ही नहीं मिला है !'आलोचना सुनने की ताब और माद्दा दोनों होना  चाहिए !


 अपनी आलोचना से घबराकर न मैं टंकी में चढ़ने जा रहा हूँ और न मैं टेसुए बहाकर सहानुभूति अर्जित करना चाहता हूँ.यदि आपको लगता है कि वास्तव में ब्लॉग-लेखन को हम कहाँ ले जा रहे हैं तो ज़रूर अपनी चिंता,सहमति,असहमति व्यक्त करें और हाँ,मैं बहुत मजबूत और बलशाली तो नहीं हूँ पर मेरा आत्मविश्वास इतना ज़रूर है कि हम अपने ब्लॉग पर माडरेशन का ताला नहीं लगाकर  बैठे हैं !शालीन लहजे में तर्कपूर्ण बात या तंज का भरपूर स्वागत है !