अली सैयद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अली सैयद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

28 जनवरी 2012

हम वो परिंदे हैं !

उनकी याद भी अब उनकी तरह नहीं आती,
कोई खुशी अब खुशी की तरह नहीं आती !(१ )


हमने मौसम की तरह,उनका इंतज़ार किया,
पतझर के बाद भी ,बासंती-हवा नहीं आती ! (२)


वे खूब खुश रहें ,अपने जहान में,
हमें तो अब दुआ भी,देनी नहीं आती !(३)


शाख़ से गिर गए हम वो परिंदे हैं,
आस्मां न हाथ आया,ज़मीं नहीं सुहाती !(४)


बीते हुए लम्हों को पकड़ने की ज़िद में, 
ख़ुशी न रोक सका,ज़िन्दगी चली जाती !(५)


यह भी देखें:

अपने अली साहब को यह ग़ज़ल भेजकर सम्मति ली थी ,
उनने तीसरे शेर में कुछ यूं तबदीली की,हालाँकि मैंने अपना 
वाला वर्ज़न ज्यों का त्यों रखा है ताकि उसका भाव हमारा हो !

दुआ ये दिल से वो शादाब हों आबाद हों अपने जहान में,
लुटे से हम ज़रुर हैं फिर भी ,लबों पे बद्दुआ नहीं आती !
--अली सैयद
और यह देखिये मेरी हिमाकत:
दुआ ये दिल से वो ,आबाद हों अपने जहान में,
लुटे तो हम ज़रूर हैं,पर बद्दुआ नहीं आती !