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28 मई 2015

फेसबुक और लाइक, कमेंट !

फेसबुक पर कमेन्ट और लाइक करने की प्रवृत्ति पर कुछ दिनों से कहना चाह रहा हूँ.यह बेहद निजी अनुभव है। हो सकता है,आप इससे इत्तेफाक न रखते हों !

१)आपके खास मित्र आपके प्रिंट मीडिया पर छपे लेख पर व्यक्तिगत रूप से फ़ोन कर देंगे,इनबॉक्स में तारीफों के पुल बहा देंगे पर स्टेटस को देखते ही अपनी छाती पर बड़ा-सा पत्थर रख लेंगे .

२) आपकी जिस पोस्ट पर चारों तरफ से कमेन्ट और लाइक की बौछार होती है,उस पर भी कुछ खास लोग अपने चारों ओर कुहरे की चादर तान लेंगे.हो सकता है इससे उनकी छाती पर साँप लोटने की आशंका कम हो जाती हो .

३)मामला बेहद नजदीकी और न बचने जैसा हुआ तो लाइक करके निकल लेंगे,कमेन्ट फ़िर भी नहीं करेंगे !इस मामले में वे पूरे घाघ होते हैं.मानो एकाध कमेन्ट कर देने पर उनके पास  'जन-धन' खाते जैसा जीरो बैलेंस हो जायेगा !

४)ऐसे दोस्त या खास लोग तब ज़रूर कमेन्ट करेंगे ,जब किसी पोस्ट पर आप चौतरफ़ा घिर जायेंगे.वे उसमें कोई प्रतिकूल टिप्पणी तो नहीं करेंगे पर कमेन्ट करके यह ज़रूर जता देंगे कि इस फजीहत के चश्मदीद गवाह हैं वो.

५)ऐसा संभव नहीं है कि कोई हर पोस्ट में जाए या किसी को अच्छी ही लगे पर जिस पोस्ट को यदि कोई व्यक्तिगत रूप से सराहता है तो पब्लिकली क्यों नहीं कुछ कहता ? इसका मुख्य कारण मेरी समझ में यही आता है कि ऐसे खास लोग अपने दोस्त को बिला-वजह अहंकार आ जाने  या बौरा जाने से बचाते हैं। कुछ लोगों को यह भी आशंका होती है कि यहाँ उनके कमेन्ट के सहारे दूसरे लोग उनकी पोस्टों के लाइक और कमेन्ट के स्कोर की पड़ताल न कर लें !

६) ऐसे खास दोस्त मित्र की सुपरहिट पोस्ट में जाने के बजाय किसी देवी  के 'गुड मोर्निंग' या 'घास-पत्ती-फूल' पर कूल-कूल रिएक्शन ज़रूर देंगे.वहाँ वे फेसबुक के तीनों प्रारूपों का उपयोग कर लेते हैं,मसलन चैटबॉक्स,कमेन्ट और लाइक !

७) अपनी भैंस जैसी शक्ल पर हमसे कमेन्ट ले लेंगे पर हमारी गऊ जैसी मनमोहक सल्फी पर लाइक भी ना देंगे !

८) कुछ बड़के टाइप के लोग अपनी रेटिंग को लेकर बड़े सतर्क रहते हैं। वे हरदम इस बात से आशंकित रहते हैं कि लिखने वाला उनके आगे बच्चा है, उनके लाइक करने से कहीं एकदम से बड़ा हो गया तो उनका बड़ापन कहाँ मुँह छिपाएगा !

*इस पोस्ट का उद्देश्य ऐसे खास मित्रों से सावधान करने का है,जो फेसबुक पर आपकी लहलहाती फ़सल को देखकर जल-भुनते हैं.कृपया ऐसी भीषण गर्मी में उन्हें और न जलाएं :)

27 जून 2013

लिखने का माध्यम और सरोकार !


 
कई बार यह बहस उठती है कि अभिव्यक्ति के लिए कौन-सा माध्यम उचित है या सबसे उत्तम है,पर मेरी समझ से मूल प्रश्न यह होना ही नहीं चाहिए। हर माध्यम की अपनी सम्प्रेषणता होती है और पहुँच भी। बदलते समय और नई तकनीक के साथ इसमें भी उत्तरोत्तर बदलाव हो रहा है। यह सहज और स्वाभाविक प्रकिया है। इससे,पहले वाले या परम्परागत माध्यमों की उपयोगिता या प्रासंगिकता खत्म नहीं हो जाती। यह व्यक्तिगत रूप से इसका उपयोग करने वाले पर निर्भर है कि उसे किस माध्यम में सहजता और सहूलियत होती है। माध्यमों के बदलने से लिखने वाले के सरोकार नहीं बदल जाते। इसलिए लेखक के सरोकार हर माध्यम से जुड़े होते हैं। इसलिए लेखक के लिखे पर या कंटेंट पर बहस तो ठीक लगती है पर माध्यम के साथ उसके सरोकारों पर सवाल उठाना उचित और तर्कपूर्ण नहीं है।
कुछ लोग फेसबुक ,ट्विटर या ब्लॉगिंग को आपस में गड्डमड्ड कर देते हैं। उनके अनुसार ये तीनों माध्यम एक जैसा उद्देश्य पूरा करते हैं,पर सच तो यह है कि तीनों एक-दूसरे के विकल्प नहीं हैं। ये आपस में अच्छे पूरक बन सकते हैं। एक छोटी मगर महत्वपूर्ण बात को जल्द से जल्द पूरी दुनिया में ट्विटर के द्वारा अधिक सुगमता से फैलाया जा सकता है। किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर चर्चा-परिचर्चा के लिए,बहस-मुबाहिसे के लिए फेसबुक सबसे अच्छा माध्यम है,पर यह इसकी उम्र इस लिहाज़ से कम है क्योंकि अगले अपडेट के साथ ही यह संवाद बिला-सा जाता है । ब्लॉग पर हम अपनी बात पूर्ण रूप से व सहज ढंग से व्यक्त कर सकते हैं। इसमें आपसी संवाद की भी गुंजाइश होती है और इस पर कहा-लिखा गया ढूँढना भी मुश्किल नहीं होता।
इन तीनों माध्यमों से आगे का माध्यम प्रिंट-मीडिया है। यह इन तीनों का विकल्प नहीं है क्योंकि यह इनसे पहले भी था और इनके बाद भी है। तमाम इलेक्ट्रोनिक और इन्टरनेटीय विकल्प होने के बावजूद प्रिंट मीडिया की पठनीयता लगातार बढ़ी है। ऐसा नहीं है कि सोशल साईट पर लिखने वाले और प्रिंट मीडिया में लिखने वालों के सरोकार अलग होते हैं। सबका उद्देश्य यह होता है कि उसके द्वारा प्रेषित सूचना अधिकाधिक लोगों तक पहुँचे और विश्वसनीय तरीके से भी। प्रिंट मीडिया विश्वसनीयता के मामले में अभी औरों से काफ़ी आगे है। अखबार और पत्रिका में छपा हुआ पाठक को अधिक विश्वसनीय लगता है क्योंकि अंतरजाल में जबरदस्त ‘पाइरेसी’ के चलते कई लोग शंकित रहते हैं। किसी के लिए भी उसका प्रिंट में छपना स्वाभाविक रूप से आकर्षित करता है। साथ ही यदि अर्थ-लाभ भी हो रहा है तो इसमें हर्ज़ भी क्या है ? ज़रूरी बात यह है कि लेखक जो लिख रहा है,उससे समाज को,देश को कुछ मिल रहा है कि नहीं।
लेखक के सरोकारों पर सवाल उठाना गलत नहीं है,जब यह लगे कि उसका लेखन किसी भी तरह मानवीय सरोकारों से बहुत दूर है। कोई भी व्यक्ति आत्म-मुग्धता के लिए या ‘स्वान्तः सुखाय’ लिखता है,तो अनुचित नहीं है पर यदि उसके लिखे से सामाजिक या मानवीय सरोकार पूर्ण होते हैं,तो वही टिकाऊ साहित्य बन जाता है। हर माध्यम में कुछ लोगों के सीमित सरोकार भी होते हैं,इनमें कोई लाल,केसरिया तो कोई हरा झंडा थामे रहता है। ऐसे लोगों को उस व्यक्ति के लेखन से बड़ी तकलीफ पहुँचती है,जो उसके एजेंडे को पूरा नहीं करता। यदि पाठक अपना एजेंडा तय करने के लिए स्वतंत्र हैं तो लेखक क्यों नहीं ? कहने-लिखने का माध्यम कुछ भी हो सकता है,इससे लेखक की निष्ठा या उसके सरोकार पर संदेह करना अनुचित है।

4 फ़रवरी 2012

बीमार ब्लॉगर क्या सोचता है ?

अभी पिछले सप्ताह मित्र की शादी के सिलसिले में दिल्ली से दूर अपने गाँव गया.जाते ही ऐसी सरदी लगी कि कल दिल्ली आकर भी उस बीमारी से पार नहीं पा सका हूँ.इस बीच अपने मित्रों से कटा रहा,लिखा-पढ़ी से दूर रहा,शादी का भी आनंद न ले पाया,पर फेसबुक के माध्यम से कुछ कहता रहा,चुनिन्दा देख लीजिए !

१)पड़ा हूँ बिस्तर में 
अपने गाँव में ,
बच्चों से दूर 
मेरे प्रेरणास्रोत निराला

माँ-बाप की छाँव में ,
ख़ुद बच्चा बनकर !

२)मैंने जो देखा मौत को इतने क़रीब से,
जिंदगी को रश्क हुआ ,उसके नसीब से !


और कल दिल्ली आकर :
१)बहुत थकान से हलकान हुआ जाता हूँ,
मुंद रही हैं आँखें,इंसान हुआ जाता हूँ !

२)आ गया हूँ घर में ,होश-ओ-हवास ग़ुम,
समय से पहले कितना ,बुढ़ा गया हूँ मैं !


इस बीच निराला जी के जीवन चरित को रुक-रुक कर पढ़ रहा हूँ.


थोड़ी देर पहले कुछ ऐसे ख़याल आये ,एक बीमार होते हुए ब्लॉगर को,वह आपसे बाँट रहा हूँ,सिरा ढूँढने की कोशिश न करना,मुझे तो मिला नहीं !!

गीत ख़ुशी के बहुत गा चुका,
फसल सुनहरी बहुत बो चुका,
अब  असली राग सुनाऊंगा,
बंज़र खेत दिखाऊँगा !! (१)

जीवन का वह मोड़ आ गया,
कुछ रिश्तों को छोड़ आ गया,
फिर से पतवार संभालूँगा,
नाव किनारे लाऊँगा  !!(२)

उजलेपन को जितना देखा,
पीछे थी श्यामल-सी रेखा,
अंधियारे को अपनाऊँगा,
अपने में ही खो जाऊँगा  !!(३)

मैंने दुःख को अपना माना,
तभी ठीक से  ख़ुद को जाना ,
रिश्तों से सुख में मिल लूँगा,
इसे अकेले ही सह लूँगा !!(४)

अच्छा या हो रहा बुरा,
समय कभी नहीं ठहरा,
कुछ समझौते भी कर लूँगा,
गाकर दर्द दवा कर लूँगा !!(५)

24 मई 2011

तिहाड़ जेल लाइव !

राजा: आओ कनिमोझी स्वागत है!
कनि: हाँ,अब तो तेरे कलेजा में ठण्ड पड़ गयी होगी .
राजा: हमरे तो हाथ बंधे थे,केवल अकाउंट खुला था.
कनि : हे राजा,ई तूने ठीक नय किया है.
राजा : अब हमरा नाम भी भूल गई हो,मैं ए राजा हूँ .
कनि: तुमरा नाम तो 'टाइम' पर आया है,एक लाख सत्तर हज़ार करोड़ मा खाली दू सौ करोड़ हमरे नाम !
राजा: शुक्र मनाओ,हमरी वज़ह से ही 'फर्स्ट-क्लास' जेल मिली है !छोटी-मोटी रकम में तो 'टाइम' क्या 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में भी न आ पाते !

इसी बीच फूलों का गुच्छा लेकर कनि के पप्पा आ जाते हैं ,राजा साइड में छुप जाते हैं !


ब्रेक के बाद ....

कनि बिटिया से मिल-मिला के जब उनके पप्पा चले गए तो राजा तिलमिला गवा !ओटरे से निकल के कनि से बूझै लगा:

राजा: ई आदमी केतना अहसानफरामोश निकला !हम इसके खातिर ससुर रिज़र्व बैंक बने थे और ऊ एक बार भी हमसे मिलने नय आवा.
कनि: लगता है तुम अब संठियाय गए हो !हमरे पप्पा अभी-अभी 'गद्दी' से उतरे हैं,उनको कुच्छौ नय सूझ रहा है.एकदम ललुयाय गये हैं.
राजा : अब ई लालू से उनकी कउनो बराबरी है का ?
कनि: हे राजा ,ऊ चारा खा के  ज़मीन  पर आये और हमरे पप्पा ,ई का कहत हैं टू जी-सूजी से !

अचानक तिहाड़ में बिजली गुल हो जाती है और उसके बाद आँखों देखा हाल तो कउनो उल्लू ही बताएगा !

23 मई 2011

क़यामत की फेसबुकिया डायरी !


तारीख :ठीक महाप्रलय से एक दिन पहले (२१ मई २०११ )

क़यामत के पहले की आखिरी रात है,
कम-अस-कम आज तो जी भर सो लें!

सन्दर्भ:आजतक,कलतक,इंडिया टीवी,अमेरिका टीवी,आधुनिक बाबा (जिन बाबाओं के नाम नहीं दे पा रहा हूँ,वादा है यदि हम जिंदा रहे तो उनको मरणोपरांत श्रद्धांजलि तो दे ही देंगे !


 महाप्रलय का दिन(२२ मई २०११)

क़यामत का लाइव टेलीकास्ट:

सूरज डूब गया है,अँधेरा छा रहा है,तेज हवाएं चलने लगी हैं!
हमारे 'तेज' चैनलों के बहादुर संवाददाताओं को फील्ड पर कैमरे ,माइक लेकर'रेडी' (ढींग चिका ढींग स्टाइल )कर दिया गया है.कई स्पांसर भी मिल गए हैं.आप सब लोग जाते-जाते यह भी देख सकें कि आपका कौन साथी आपके साथ जा रहा है ?मतलब,मजे से मरते हुए ऊपर जाएँ !


महाप्रलय का अगला दिन (२३ मई २०११)

आज सुबह नींद जल्दी खुल गई तो जिंदा होने का अहसास नहीं हो पा रहा था.इसलिए मैंने अपने बदन पे दो-तीन चिकोटी काट कर तसदीक करी कि वाकई में जिंदा हूँ ? बदन में फुल हरकत पाकर सुकून हुआ.भाई लोगों की तमाम कोशिशों के बावजूद हम कायम हैं ,दुनिया कायम है!


पिछले कई रोज से सबसे तेज चैनल ख़बरों से ही क़यामत ढाए हुए थे.कल रात को भी समाचार सुनने बैठा तो इसी के बारे में चर्चा होने वाली थी,झट से टीवी ऑफ करके सो गया.

इस बीच समाचार आये हैं कि कल आँधी-पानी से कुछ जगहों पर बीसेक लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं.ई ल्यो ,अब इसको भी वे अपने तईं खबर बना देंगे,जैसे पहली बार कोई बारिश या तूफ़ान में मरा हो !


चलते-चलते

वाकई इस 'क़यामत' ने बहुतों को 'मटीरियल' दे डाला है,इससे जो बच भी गवा तो ससुर पढ़-पढ़ के मरेगा !


18 अप्रैल 2011

तीन लघु कवितायें !


फेसबुक पर लिखी हुई तीन रचनाएँ

(१)
इस जीवन में

सुख होते हैं

दुःख होते हैं,

हम हँसते हैं,हम रोते हैं .

सुख नकली है,दुःख असली है,

जब हम अपने से मिल रोते हैं,

पास हमारे हम होते हैं !

अपने गम हम खुद धोते हैं,

शायद इसीलिए रोते हैं ! 


सन्दर्भ:साथी अजय झा के पिताजी के देहावसान पर

(२)

सुबह हुई तो मुरझाये थे
कुम्हलाये थे,
हम अब ऐसे दरख़्त हैं,
जो ढलती शाम में खिलते हैं 


सन्दर्भ :एक दिन का निजी अनुभव 


 (३)

पुराना जा रहा है
नया आ रहा है
न जाने वाले का गम
न आने वाले का ख़ैर मकदम
जिसे जाना चाहिए
वह मजबूती से जमा है
भ्रष्टाचार  अब पांचवां खम्बा है !

सन्दर्भ:नए साल पर (२०११)