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26 अगस्त 2011

डॉ.अमर कुमार :एक इंसानी-ब्लॉगर !

जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो,
कि आस-पास की लहरों को भी पता न  लगे !'

मुन्नी बेगम की गायी हुई एक ग़ज़ल का यह शेर पिछले दो दिनों से बरबस याद आ रहा  है! डॉ.अमर  कुमार  के  जाने का तरीका कुछ ऐसा ही रहा.उनके बहुत नजदीकियों  को भी कुछ  अहसास जब तक होता ,तब तक वे अपनी महायात्रा पर निकल चुके थे !उनके दैहिक अवसान के बाद पूरे ब्लॉग-जगत में स्तब्धता छा गयी और बड़े पैमाने पर हर किसी ने उन्हें अपने ढंग से याद किया.

मेरा उनका संपर्क बहुत कम रहा.न मैं उनको ज्यादा पढ़ पाया,न सुन पाया और न जान पाया! जब पहली और आखिरी बार बारह अगस्त को उनसे मिला था तो सोच रखा था कि डॉ. साहब से बहुत बातें करूँगा,टीपों में उनकी मारक-शैली का राज जानूँगा,पर उनकी दशा ऐसी न थी कि उन्हें सुना जाय,इसलिए मैंने ही अपनी तरफ से उनसे संवाद ज़ारी रखा था.वे बीमार ज़रूर थे,पर निश्चय ही मन के सारे भाव उनकी आँखों में देखे जा सकते थे.वे जीवन के प्रति निराश भी नहीं दिखे!

उनको नजदीक से जानने वाले  और उनका दिया 'संताप' झेलने वाले डॉ. अरविन्द मिश्र  , अनूप शुक्ल ,फुरसतिया और अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी से हुई बातों से ही उनके बारे में थोडा-बहुत जान पाया .वे शायद पहले ऐसे शख्स थे जो किसी को अपनी तंज-टीप से उकसाते थे और घोषित-अघोषित आलोचना भी सहते थे ! उनमें अपने दोस्तों और लिक्खाड़ लोगों को पहचानने की अद्भुत क्षमता थी.अनूप जी कहते हैं कि जब कोई उनकी टीप से 'आहत' होकर कोप-भवन में बैठा होता हो तब डॉ. साहब ऐसी गुदगुदी मचाते कि वह बरबस ही सहज हो जाता.शुक्ल जी के शब्दों में,'संवादहीनता को ख़त्म करने की उनकी 'साज़िश' सफल हो जाती थी'!ऐसे कई लोग अब उनके जाने के बाद निश्चित ही फडफडा रहे होंगे !मुझे तकलीफ है कि उस 'संताप' का दंश मुझे नहीं मिल पाया !

 उनको जो भी थोडा बहुत मैं समझ पाया उससे  एक बात ज़रूर नुमाया होती है कि इस 'अंतरजाल' को उन्होंने अपने लेखन से तो सजाया ही,पूरी तरह जिया भी.केवल लिखते रहना ही उनका उद्देश्य नहीं था.लिखने के साथ उन्होंने जीने को 'मिक्स' कर रखा था.उन्होंने कोई हास्य नहीं लिखा,वरन  वे संजीदा बात को हास्य की चाशनी में लपेट देते थे .अब यह स्वाद लेने वाले के ऊपर निर्भर था कि वह चाशनी का ले या असली माल का !

डॉ. साहब को मैंने 'इंसानी-ब्लॉगर' कहा है क्योंकि वे दिल से लिखने और मिलने वाले व्यक्ति थे! अवधी और बैसवारी में उनका लेखन अनूठा और आकर्षक था.वे अपनी दो-या तीन शब्दों की टीप से बहुत कुछ कह देते थे. मेरी एक पोस्ट 'सरकार का प्रेसनोट'  में उन्होंने अपने अंदाज़ में 'जउन  हुकुम  हाकिम' टीप कर उसका सारा 'पानी' उतार दिया था.कई लोगों ने उनको समझने में देर लगाई ,पर डॉ.साहब अपना 'शिकार' जल्द पहचान लेते थे. एक देशी कहावत के अनुसार वे चलत बैल क अरई मारै वाले किस्म के मनई रहे !उनकी सबसे बड़ी सम्पदा उनकी 'कोचन-शैली' और दोस्ताना मिजाज़ था.


इस 'अंतर्जाल' में लिखने-लिखाने वाले लोग तो बहुतायत में हैं,पर मिलने -मिलाने वालों की गिनती बहुत कम है.डॉ. साहब के जाने पर यह संकट और गहरा गया है.उनको याद करने का सबसे बढ़िया तरीका यही है कि उनकी बनाई लकीर पर चला जाये !


डॉ. साहब ,आप तो चले गए पर हम मरीजों को नीम-हकीमों के लिए छोड़ गए !

फिलहाल के लिए,

तुम इतना छोड़ गए हो अपने पीछे,
भूख मिटाते  चले चलेंगे  सदियों-सदियों !




23 अगस्त 2011

डॉ.अमर कुमार ,जो अब अमर हो गए !




जिन्होंने हमसे वादा किया था कि आठ-दस दिन में अपनी बीमारी से पार पाकर फिर से ब्लॉग-जगत में हम सबसे मुखातिब होंगे,सक्रिय होंगे पर वह अपना वादा पूरा नहीं कर पाए.अपने को टाइम-खोटीकार कहने वाले,हर दिल अज़ीज़,हिंदी के मशहूर तंजकार और तकनीकी रूप से विशुद्ध ब्लॉगर डॉ.अमर कुमार हमारे बीच में अब भौतिक रूप से नहीं रहे.वे अपने लेखों से तो हमें प्रभावित करते ही थे,उनकी टीपों का हर ब्लॉगर को बेकरारी से इन्तज़ार रहता था!

अभी थोड़ी देर पहले भाई अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने फोन करके इस दुखद घटना की जानकारी दी .मैं बिलकुल सन्न और हतप्रभ रह गया.अभी पिछली बारह अगस्त को पहली बार उनसे भेंट हुई थी.उनसे मिलने के बाद हमने उनसे यह कहा था कि मैं उन पर एक पोस्ट लिखूँगा,वापस आने के बाद कुछ लिखा भी पर न जाने कैसे-कैसे व्यवधान आते गए और आज देखो उस कहानी का उपसंहार लिख रहा हूँ जिसकी प्रस्तावना, कथानक कुछ भी न लिख पाया था!

बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए,जबसे मैं डॉ. साहब से परिचित हुआ ! कोई छः महीने हुए होंगे जब वो अचानक मेरे ब्लॉग पर आये और उनकी टीप पढकर मैं उनके ब्लॉग पर पहुँचा ! उनका लेखन तो अच्छा लगा ही ,रायबरेली के हैं, यह जानकर मेरी जिज्ञासा उनके बारे में और बढ़ी और मैंने उनको अपना नंबर देकर संपर्क करने की गुजारिश की .दो-तीन दिन बाद ही उनका फोन आया,उन्होंने बड़ी आत्मीयता से बात की और हमने भी वादा किया कि जब अगली बार रायबरेली आयेंगे तो उनसे ज़रूर मिलेंगे !

मैं इसी जुलाई को उनसे बात करके भी मुलाकात न कर सका,साथ में प्रवीण त्रिवेदी को भी जाना था पर उसी दिन फतेहपुर में कालका मेल दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से हम लोग नहीं जा सके.डॉ. साहब कह रहे थे कि उन्हें दो पंडितों को भोजन कराने का पुण्य मिलेगा पर शायद यह पुण्यलाभ हम दोनों को नसीब नहीं था.मैं उसी दिन दिल्ली लौट आया !

जब इस रक्षाबंधन में गाँव गया तो रायबरेली जाना सुनिश्चित कर रखा था.साथ में डॉ.अरविन्द मिश्र की भी हिदायत थी कि वहाँ जा रहे हो तो डॉ.अमर कुमार से मिलते आना,काफी दिनों से उनकी खोज-खबर नहीं मिली है!अमरेन्द्र भाई,प्रवीण जी और अनूप शुक्ल (फुरसतिया) की भी यही इच्छा थी.रायबरेली शहर मेरा जनपद है जो मेरे गाँव से पचास किमी दूर है.इसलिए वहाँ ज्यादा जाना नहीं हो पाता!.


बहरहाल,मैं बारह अगस्त की शाम को फोन पर बात करके डॉ.साहब के घर पहुँचा और थोड़ी देर में मैं उनके सामने खड़ा था.मन में जो जोश-खरोश था वह गायब था.डॉ.साहब बिस्तर पर बिलकुल सीधे लेटे हुए थे,मुझे देखते ही उनके मुँह से निकला,हम आप से मिल चुके हैं ,पर मैंने तुरत कहा कि 'नहीं ,यह हमारी पहली मुलाकात है !" काश ! यह आखिरी न होती !

हम वहाँ करीब पैंतालीस मिनट रहे.डॉ, साहब की शारीरिक दशा ऐसी नहीं थी कि उनसे ज्यादा बात की जाए,पर उन्होंने इतने कम समय में भी हमें अपने सम्मोहन में ले लिया था.वह बहुत कम बोल पा रहे थे,हमारी ज्यादा सुन रहे थे.मैंने ब्लॉगिंग के बारे में,ब्लॉगर मित्रों के विषय में उनसे बात की और उन्होंने पूरी तन्मयता से सुना.अरविन्द मिश्रजी,अनूप शुक्ल जी,प्रवीण त्रिवेदी,ज्ञानदत्तजी के बारे में उन्होंने बड़ी रूचि और आदर प्रकट किया.समीर लाल जी (उड़नतश्तरी) के भी एक बार वहाँ आने का जिक्र किया था!

जिस बिस्तर पर वे लेटे थे ,सामने कंप्यूटर रखा और हिंदी के पुराने गाने बज रहे थे. उन्होंने बताया कि वायस ऑफ अमेरिका से लगातार गाने आते रहते हैं,वही स्टेशन लगा लेते हैं!इसी बीच अपने मोबाइल पर आया हुआ एक चुटकुला भी उन्होंने हमें पढवाया !

उनको सबसे ज़्यादा तकलीफ़ बोलने को लेकर थी .उठ कर बैठना बहुत कठिन था.जब बातों-बातों में मैंने यह कहा कि मैं उन पर एक पोस्ट लिखना चाहता हूँ और इसके लिए एक तस्वीर चाहिए.अस्वस्थता के बावजूद उन्होंने मेरा मन रखने के लिए अपना चित्र लेने दिया!उन्होंने दो-तीन बार अपनी उस हालत पर विवशता प्रकट की और कहा कि वह इस दशा में उनसे मिल रहे हैं.मैंने अपनी ओर से भरपूर ढाढस दिया कि वे बिलकुल चिंतित न हों ,जल्दी ही हमारे बीच होंगे!वे बीमार ज़रूर थे पर जीवन के प्रति निराश नहीं !


चलने का समय आया तो मैं कह नहीं पा रहा था,वे भरी और गहरी निगाह से मुझे देख रहे थे.मैंने हाथ बढ़ाया तो उन्होंने मेरे हाथ को अपने माथे से लगा लिया! सच में,यह मेरी जिंदगी का सबसे भावुक क्षण था !मैंने भी उनके हाथ को अपने माथे पर लगाकर कहा कि बस,आप हमें आशीर्वाद दें,हमारा मार्गदर्शन करें,हम आपको जल्द सक्रिय रूप में देखना चाहते हैं.उन्होंने चलते-चलते मुझसे आठ-दस दिन का समय माँगा था,जो अब कभी नहीं आएगा.उनके कमरे से निकलकर मुझमें पीछे मुड़ने की शक्ति नहीं थी,पर उनकी आवाज़ सुनाई दी,रूबी,(डॉ.साहब की धर्मपत्नी) देखो,इन्हें छोड़ दो

मैं उनसे मिलकर बाहर आने के बाद समझ नहीं पा रहा था कि इस मुलाकात पर खुश होऊँ या डॉ. साहब की हालत पर दुखी!मेरे मन में जहाँ उनसे मिलने का संतोष था,वहीँ उनकी ऐसी दशा पर शोक !

दिल्ली आने पर एक दिन कुछ लिखने की कोशिश की,आगे नहीं बढ़ पाया.कहाँ से शुरू करूँ,कहाँ खत्म,पर डॉ.साहब ने हमारी दुविधा को शायद भाँप लिया था और उन्होंने इस पोस्ट को पोस्ट(बाद) की सार्थकता दे दी .हमें उनसे बहुत कुछ सीखना,जानना था,पर वह हम सबके साथ खोट कर गए.वास्तव में वे पक्के दगाबाज़ निकले.अपने दोस्तों को इस अंतरजाल’,कंप्यूटर और की-बोर्ड की दुनिया में खटर-पटर करने को अकेला छोड़ गए !

उनसे मिलकर आने के तुरत बाद उनकी दशा पर दिमाग में ये लाइनें अचानक आईं थीं :

जिंदगी मुझसे मिली कुछ इस तरह,
वह बोलती,कहती रही,सुनता रहा मैं

उस महान पुण्यात्मा को शत-शत नमन !