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31 अक्टूबर 2020

शायर फिर बोला है !

 शायर फिर से बोला है,

ज़हर फ़िज़ा में घोला है।


रोज़ सियासत रिसती है,

जब भी मुँह खोला है।


कट्टरता,पाखंड में चुप्पी,

रंगा मज़हबी चोला है।


पक्के गाँधीवादी ठहरे,

हाथ ‘अहिंसा-गोला’ है।


मज़हब सबसे ऊपर है,

असली यही फफोला है।


‘हम सब मानव हैं पहले’

शायर क्यूँ ना बोला है !


—संतोष त्रिवेदी 


#MunawwarRana

25 जून 2012

मुनव्वर राना की शायरी और हम लोग !

कल का दिन हमारी ज़िन्दगी का एक यादगार दिन रहा.परसों अविनाश वाचस्पति जी का फ़ोन आया कि रविवार को 'एनडीटीवी' के 'हम लोग' कार्यक्रम के लिए निमंत्रण आया है,चलना है तो बताओ.मैंने सहर्ष स्वीकृति दे दी और साथ ही मित्र शाहनवाज़ सिद्दीकी और सानंद रावत जी से चलने के लिए कहा तो वे लोग भी तैयार हो गए.कल करीब ग्यारह बजे हम स्टूडियो पहुँच गए.सभी को केवल मुनव्वर राना से मिलने की बेताबी थी.मेरे लिए अतिरिक्त खुशी थी कि वे मेरे गृह जनपद के ही हैं ! दुर्भाग्यवश अस्वस्थता के चलते अविनाशजी तो नहीं आ पाए पर हम तीनों लोग वहाँ डट गए.


रवीश कुमार जी कार्यक्रम की शुरुआत करें ,इससे पहले ही मुनव्वर जी ने अपने अंदाज़ में चुटकियाँ लेनी शुरू कर दी थीं.पैर में दिक्कत की वज़ह से चार महीने से वे अस्पताल में थे,पर अपनी इस तकलीफ को उन्होंने बड़ी सहजता से लिया.कार्यक्रम शुरू होने पर पहले आध घंटे उन्होंने तरह-तरह के किस्से सुनाये और माँ ,सियासत.मोहब्बत आदि पर शेरो-शायरी सुनाई ! इस कार्यक्रम को विस्तार से यहाँ सुन सकते हैं !




कार्यक्रम के दौरान हमें भी एक सवाल पूछने का मौका मिला,जिसमें मैंने पूछा कि आपको सियासत व सरोकार में सबसे अधिक दिल किस पर शायरी करने का होता है तो उन्होंने बेलौस होकर कहा कि हम शायरी तभी करते हैं जब दिल कहता है | इस तरह कार्यक्रम की समाप्ति के बाद उनसे मिलने के लिए लोग टूट पड़े.हमने उनसे चरण छूकर आशीर्वाद लिया .सबने फोटो भी खिंचवाई. इसके बाद हम सब अविनाशजी के यहाँ उनके हाल लेने गए और शाम को पहली बार अपने को टीवी पर चमकते हुए देखा !



अब देखिये कई दृश्य :

रवीश कुमार कार्यक्रम संचालित करते हुए




मुनव्वर जी माँ को याद करते हुए





दर्शकों के बीच हम


शाहनवाज़ और सानन्दजी के साथ



ज़बरिया हम उनके साथ बैठ ही गए !




28 मार्च 2012

गुजरी हुई फिज़ा !

कभी सोचता हूँ,क्या हूँ,
इस भीड़ में नया हूँ .

अपने ग़मों से दूर
किसी और की दवा हूँ.

ज़ुल्फ़ के दुपट्टे में
फँसती हुई हवा हूँ .

अलग-थलग  लगा
जब उसके पास गया हूँ.

दुनियावी  बातों में,
हरदम ठगा गया हूँ.

आशियाँ बना,न बना,
उड़ती हुई बया हूँ.

अपने ही चमन में,
गुजरी हुई फिज़ा हूँ !

अब आइने से पूछो,
सूरत से भी ज़ुदा हूँ !



17 फ़रवरी 2012

प्यार हुआ जाता हूँ !

तबीयत कुछ ठीक सी ,रहती नहीं अब ,
बगैर किसी मर्ज़ के,बीमार हुआ जाता हूँ !१!
साभार:गूगल बाबा 

खामोश हूँ,पर होश में हूँ मैं अभी,
ढहते हुए शहर में,मीनार हुआ जाता हूँ !२!

बुरे दिन भी ये ,कितने हसीन होते हैं,
जंगल से निकलके ,घर-बार हुआ जाता हूँ !३!

कोई समझ न पाए,दास्तां मेरी ,
धीरे-धीरे मैं भी ,ख़बरदार हुआ जाता हूँ !४!

अब दर्द को भुलाने की बात भूलकर,
ग़म के साथ रहके ,प्यार हुआ जाता हूँ !५!

5 दिसंबर 2011

कुछ कह नहीं पाता !

कुछ लिख नहीं पाता ,कुछ कह नहीं पाता,
इस माहौल  में भी  तो,  मैं रह नहीं पाता ! १!


हम  तुमको न समझे थे ,तो कोई बात नहीं,
तुम्हीं हमको बता देते ,मैं कह नहीं पाता !२ !


एक-एक करके सारी , रुचियाँ बदल गईं ,

कभी चल नहीं पाता,मैं  रुक नहीं पाता !३ !


तुम्हारे खून की हर बूँद हमको चाहिए,
खिलाफ़  उठती  आवाजें,मैं सह नहीं पाता !४ !


रोशनी की हर किरन ,मेरे इशारों पर,
आँधी की आहट को,मैं सुन नहीं पाता !५  !


इस वक़्त को बाँधा हुआ है हाथ से,
सोते हुए  ये सोचता हूँ,मैं जग नहीं पाता !६ !





ये देखिये,अपने अली साहब का अलग रंग....पैरोडी के रूप में !




ali ने कहा…





शायरे उल्फत हूं मैं ,जब इश्क फरमाता हूं मैं !
लिख नहीं पाता कभी खामोश रह जाता हूं मैं :)

मैं तुम्हें समझी नहीं ये कह निकल लेती हो तुम !
क्या बताऊँ किस कदर खुद ही पे झुंझलाता हूं मैं :)

देख कर बदली हुई रूचियां तुम्हारी खीज कर !
शोक में रहता कभी पत्नी को हड़काता हूं मैं :)

तुमको हमारे खून की हर बूँद क्योंकर चाहिए !
तेरे कूंचे में पिटा ,तुझपे मिटा जाता हूं मैं :)

तुमसे पहले रौशनी और उससे पहले थी किरन !
अब तुम्हारा हुस्न है , अंधा हुआ जाता हूं मैं :)

25 नवंबर 2011

थप्पड़ रोज़ खाए हम !

उनके पास है मरने का हुनर-ओ-इल्म ,
ठीक से जीना भी नहीं, सीख पाए हम !१!


उस्ताद हैं वे, सबको भरमाने की कला  में,
सफ़र में न किसी एक को,रोक पाए हम !२!


कई साल से मसल्सल ,वे पीटते  रहे,
गाँधी के नाम थप्पड़ ,रोज़ खाए हम !३!


महफ़िल में आज छाये ,मेरे ही करम से,
गीतों में सुर चढाते ,जो छेड़ आए हम !४!


चलते ही जा रहे,बड़ी तेज़ चाल से,
कहना न फिर कोई,न संभाल पाए हम !५!


शतरंज की बिसात पर,तुम जीत तो गए,
पर किसी  मोहरे से नहीं ,मात खाए हम !६!






23 जनवरी 2011

जीवनसाथी

      आँखों में समाई हो,सोचों में समाई हो,
      घनघोर घटा बनकर,मेरे मन में छाई हो !

         जब से तुम ज़ुदा हुईं ,ये जीवन सूख गया,
        अब तुम ही याद मेरी,तुम ही तनहाई हो !

        जिस तरफ़,  जहाँ तक भी , ये नज़रें जाती हैं,
          ज़र्रे में, दरिया में ,हरसूं दिखलाई हो !

          तेरे साँसों की खुशबू,अब तक है ताज़ादम,
          हर पल यह लगता है,जैसे  तुम  आई हो !

          नज़रों के पास नहीं , पर साथ मेरे हरदम ,
          ग़ज़ल भी  हो मेरी, तुम मेरी रुबाई हो !


विशेष: पत्नी-वियोग  में,रचनाकाल--२६/०६/१९९२ (संशोधन के साथ)
दूलापुर (रायबरेली )

4 अक्टूबर 2010

ग़ज़ल

हर   जगह  क्यूँ  आप  नज़र  आते  हैं ?
ख्वाबों में भी  साफ़ नजर आते हैं!

दिल की गहराइयों से,तुम्हें चाहा हमने,
फिर भी अजनबी से आप गुजर जाते हैं.

नज़र-ए-इनायत तो कभी हम पे' करो,
सुना है,मुजलिमों पे आप रहम खाते हैं.

ये प्यार का पैग़ाम,शायद पहुँच सके,
इस गली से यूँ,चुपचाप निकल जाते हैं.

हाल-ए-दिल मेरा ,कोई सुना दे "चंचल",
मैं हूँ तनहा,अकेले भी आप जिए जाते हैं!

रचना काल: २१/०६/१९९०
दल्ली-राजहरा (छत्तीसगढ़)

19 अप्रैल 2010

तुम हो न सके मेरे !


जिनकी हमें तलाश थी,वो इस तरह मिले,
उनसे हुआ जो सामना ,हसरत से ना मिले।

ख़्वाब-ओ-ख़याल क्या थे ,मिलने से उनके पहले,
फूलों को थे तलाशते ,काँटे मुझे मिले।


कल तक रहे जो हमदम, मेरे जनम-जनम के,
जनम-जनम की बात क्या,दो पल भी ना मिले।

इस ज़िन्दगी में क्या बचा,तनहाइयों के सिवा,
फिज़ा है उनके बाग़ में, मुझे उजड़ा चमन मिले।


मुझको सियाह रात देने वाले ''चंचल",
हर मोड़ पर तुझे,आफ़ताब ही मिले !

फतेहपुर,१५/०१/१९९०

22 नवंबर 2009

सिर्फ़ तुम्हारे लिए !

१
जब भी देखता हूँ , कोई साँवली सी सूरत,
तुम्हारा ही अक्स  उसमें नज़र आता है।

२
जब भी सामना होता है तुमसे मेरा ,
नज़रें झुकाके मुझको, दिल में छुपा लेती हो ?

३
जब भी लेता है कोई तुम्हारा नाम,
दिल मेरा चुपचाप तस्दीक करता है !

४
मुझे डूबने दो इन झील-सी आँखों में,
बाहरी दुनिया से मैं ऊब चुका हूँ !

दूलापुर, राय बरेली , ०५-०४-१९८८

23 दिसंबर 2008

ताला*

सारे शहर में अब तो लग चुका है ताला ।
निकलने का जब वक्त है तो बंद है ताला। ।

ये गाँव -शहर सब वीरान हो गए,
दहशत तो और भी है,देख के ताला।

गली,चौबारे जो फूलों से महकते थे,
लुट गए हैं सब बता रहा है ताला।

इंसान के बदले मंडरा रहे हैं गिद्ध ,
घर हुए निर्जन जता रहा ये ताला।

बस्ती उजाड़कर 'वे'जंगल बना रहे,
रोकनेवालों के मुंह में बंद है ताला।

ख़ामोश क्यों बैठा ख़ुदा ,ये खेल देखकर,
अरसा बीत गया ,कब खुलेगा ताला?


*शीर्षक दल्यान सिंह (मित्र) की प्रेरणा से

दूलापुर (06-09-1989)


2 दिसंबर 2008

हमारा पड़ोसी

बेवज़ह ही आजकल ,हमसे पड़ोसी जल रहे,
वे हमें जला रहे या ख़ुद जल रहे।

एक हम हैं कि दोस्ती का भर रहे हैं दम ,
वो हैं कि मसल्सल हमको मसल रहे।

दोस्ती का हमने ,हरदम बढ़ाया हाथ,
हमसे गले मिलके फिर कुचल रहे।

बदनीयती की भी एक, हद होती है यार,
मजबूर होके हम भी हद से निकल रहे ।

वक्त है अभी-भी ,रुख बदल लो 'चंचल' ,
हम भी वरना अपना रुख बदल रहे।


फतेहपुर --15-04-१९९०



26 नवंबर 2008

25 जुलाई 2007

मुज़रिम

छुप छुप के तुम्हें देखना यदि ,वाकई  ज़ुर्म  है ,
तो ये गुनाह  हमने कई बार किया है !