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2 मार्च 2012

छज्जे पर बैठी गौरैया !


हर सुबह घर के  आंगन में
खड़े होकर निहारता
चमकीली-पीली पिचकारी के साथ
सूरज दादा दाखिल होते हमारी दुनिया में !

छत की मुंडेर पर बैठकर
पहले ताकता फिर बोलता कौवा,
'तुम्हारे मामा आयेंगे आज'
यह बतातीं हमारी अम्मा ,
और चूल्हे पर चढ़ी हुई दाल
और पतली हो जाती !

छज्जे पर बैठी गौरैया,
थोड़ी देर इंतज़ार के बाद
चुप्पे-से नीचे उतरती
वहीँ हमारे आस-पास मंडराने लगती !
बचे हुए या बिखरे  दाने उठाती
और हमारी पकड़ में आने से पहले ही
फुर्र हो जाती !
दालान और दहलीज को
बुहारती हुई अम्मा
हमें नसीहत देतीं और टोंकती
डेहरी पर टेक लगाकर बैठे हुए हम
किसी चीज़ की फरमाइश में
कुहराम मचा देते !
आखिर में अम्मा हारतीं
हम जीतते
इस तरह मजे से जीते !
अब न कौवा है न गौरैया
दालान,दहलीज और न डेहरी
न अम्मा की नसीहतें और न उनकी टोंक,
जीतता तो रोज हूँ पर अब ,
उस जीत  जैसा स्वाद नहीं मिल पाता,
क्योंकि उस छोटी-सी जगह के बदले
हमने अपनी जेबें चौड़ी कर दीं
और हमारा अपनों से ,
अपनी ज़मीन से टूट गया नाता !