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24 सितंबर 2019

जीडीपी बादरु फारे है !

सोना नींद हराम केहे
रुपिया ख़ूनु निकारे है।
बड़की बातैं सब हवा हुईं,
जीडीपी बादरु फारे है।

गै लूटि तिजोरी बंकन कै
खीसा पूरा अउ झारि दिहेन
बैपारी पैकेज चाँटि रहे,
लरिकउना पेटु उघारे है।

करिया-धनु एकदम गा बिलाय
अब तौ बिकास चुचुहाय रहा।
टिलियन डॉलर बसि आवति हैं
निम्मो दीदी समुझाय कहा।

रोज़ी-रुजगार का पूछो ना
बैलवा काँधु अब डारि दिहिसि।
काटु करै अब कउनि दवा
यहु मंदी जानु निकारे है !

जब ते तीन तलाक़ गवा,
कश्मीरौ ‘धारा’ छाँड़ि दिहिसि
अमरीका की धरतिउ ते अब
ज्वानु हमा ललकारे है।

तब ते संतोषु केहे हरिया
दुखु वहिका माटी होइगा।
देशभक्ति की चढ़ी बाढ़ मा
कउनो मुलु पाथर बोइगा।।

-संतोष त्रिवेदी

30 अगस्त 2017

तनि ईसुर ते तरे रहौ !

मन की बातैं तुम केहे रहौ,
लोटिया,थरिया सब बिने रहौ।
पबलिक झूमि रही तुम पर
वहिका अफ़ीम तुम देहे रहौ।

देस भरे मा आगि लागि है,
लेकिन भागि तुम्हारि जागि है।
गाइ का ग्वाबरु बना मिसाइल
देखतै दुस्मन फ़ौज भागि है।

बाबा,गोरू अउ बैपारी
मौज उड़ावति हैं सरकारी,
गुंडा डंडा लइ दउरावैं
थर थर काँपैं खद्दरधारी।

पबलिक तुम्हारि, तुम पबलिक के
हरदम वहिका तुम छरे रहौ।
मरैं किसान,जवान मरैं
बातै खाली तुम बरे रहौ।

कोरट ऊपर शाह बइठि गे
क़ानूनौ का चरे रहौ।
गाँधी,नेहरू पीछे होइगे
तनि ईसुर ते तरे रहौ।


(लालकुआँ से कानपुर के रास्ते बस में )
२७ अगस्त २०१७

15 अगस्त 2016

हमका माफ़ करौ तुम गाँधी !

भटकैं कुप्पी लेहे तेवारी
नेतन के घर रोजु देवारी

जसन मनावैं पहिने खादी।
अइसी भली मिली आज़ादी।।
हमका माफ़ करौ तुम गाँधी।

चिंदी चिंदी बदन होइ गवा
दूधु सुड़क गा मोटा पिलवा
देस मा बांदर खूब बाढ़ि गे,
टुकुर टुकुर तकि रहे लरिकवा।।

अफसर,नेता काटैं चाँदी।
अइसी भली मिली आजादी।।
हमका माफ़ करौ तुम गाँधी।।

दालि-भातु सब दूभर होइगा
ख्यातन मा कोउ पाथर बोइगा
बूड़ा, सूखा कबौ न छ् वाड़ै,


मरैं भरोसे पीटैं छाती।
अइसी भली मिली आजादी।।
हमका माफ़ करौ तुम गाँधी।।

23 मार्च 2013

होली में हुड़दंग !

कुण्डलियाँ

फागुन गच्चा दे रहा,रंग रहे भरमाय।
आँगन में तुलसी झरे,आम रहे बौराय।।
आम रहे बौराय,नदी-नाले सब उमड़े।
सुखिया रहा सुखाय,रंग चेहरे का बिगड़े।।
 
सजनी खम्भा-ओट , निहारे फिर-फिर पाहुन।
अपना होकर काट रहा ये बैरी फागुन।।(१)



होली में देकर दगा,गई हसीना भाग ,
पिचकारी खाली हुई ,नहीं सुहाती फाग !!

नहीं सुहाती फाग,बुढउनू खांसि रहे हैं,
पोपले मुँह मा गुझिया, पापड़ ठांसि रहे हैं।

अखर रहे पकवान,नीकि ना लगै रंगोली।
चूनर लेती जान, कहे आई अस होली।।(२)



 
फागुन के इस समय में,रोया,हँसा न जाय।
पिचकारी में रंग भरें, वो भी गवा बिलाय।।
वो भी गवा बिलाय,बढी अतनी मँहगाई।
देवर खाली हाथ,तकै मुँहु सब भौजाई।
होरी कइसे मनी, कहैं सजनी ते साजन,
बिपदा भारी लिए,खड़ा मुस्काए फागुन।(३)


दोहे

गुझिया,पापड़ छन रहे,रामदीन के संग।
होरी में सब मिल गए,चटख-स्याह एक-रंग।।(1)


आसमान में उड़ रहा,केसर रंग, गुलाल ।
बरस बाद अंबर मिला,धरती हुई निहाल ।।(2)



रंग काटने दौड़ते,होली में इस बार ।
हरिया के बरतन बिके, घरवाली बीमार।।(3)

फगुवा टोली देखकर,मन में उठे तरंग ।
साजन हैं परदेस में,नाचूँ किसके संग ।।(4)
...
पीली चूनर उड़ रही,आसमान की ओर ।
धरती पटी गुलाल से,जियरा डोले मोर ।।(5)

बादल होली खेलते,बारिश की बौछार।
फागुन गरज-बरस रहा,भीग गया त्यौहार।(6)

और अंत में गौरैया को समर्पित:

गौरैया गायब हुई,रही हमेशा साथ।
सूना सब उसके बिना,दूध-कटोरी-भात ।।


आँगन में दिखते नहीं, गौरैया के पाँव |
गोरी रोज़ मना रही लौटें पाहुन गाँव ||




विशेष :तीसरी कुंडलिया में बीच की दो लाइनें भारतेंदु मिश्र जी की हैं !

 

14 दिसंबर 2012

बहुत दिन हुए !

बहुत दिन हुए
जब आखिरी बार
चिड़िया चहचहाई थी,
पौधों में नई कोंपलें आईं थीं
सोंधी हवा चली थी,
आम बौराए थे और टपका था महुआ |
भोर होते ही बोले थे मुर्गे
और किसान गया था खेत सींचने
पूस की रात में 
ठण्ड में जलाये हुए कौड़ा
गांव में छप्पर के नीचे
आग तापे थे हम !
बहुत दिन हुए
जब आखिरी बार
माँ चौके पर बैठी थीं
घी का मर्तबान लेकर
और उड़ेल दिया था
ढेर सारा घी दाल मे,
ना-ना करते-करते !
याद नहीं आता 
पिछली बार कब खाया था
चने का साग
और जोंधरी की रोटी
या कडुवे तेल से चुपड़ी
धनियहा-नमक के साथ !
बहुत दिन हुए
आम,जामुन या बैर पर
निशाना साधते पत्थर मारे,
चने का झाड़ उखाड़े
और निमोना चबाये,
खेत में घुसकर
तोड़े हुए गन्ने !
याद नहीं रहा
कब जिए थे अपनी मर्ज़ी से
खुली हवा में साँस ली थी
और साइकिल में चलते हुए
दोनों हाथ छोड़कर
कब गुनगुनाये थे !
अब कुछ भी याद नहीं रहा,
बहुत दिन हुए
घर में रहे हुए
ज़िन्दगी से मिले हुए !

14 मई 2012

पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !

घरवाली हमते समझदार,
पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !

वी घर का काम लेहेन  मूँड़े
हम बाहर घूमि-घामि आई,
मोबाइल अउ कम्पूटर ते 
जइसे हमारि भै होय सगाई !

लड़ते-झगड़ते हो गए बाइस बरस 
जब द्याखो बात सुनावैं चार 
पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !

कपड़ा-लत्ता ,बरतन-चउका 
खाना-पीना ,उनके जिम्मे,
ना कहीं घूमना,बाहर खाना
पूजा, बरत निभावैं रस्में !

हमही लरिकन के गुनहगार,
पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !

अब पूरे बाइस बरस बीते 
वी झेलि रहीं हमरी संगति,
'सत्ती होइ गईंन तुम्हैं साथै'
हमरी घरवाली रोजु कहति !

हमहीं यहि घर के बंटाधार ,
पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !




31 मार्च 2012

कइसे दिन फिरिहैं ?

अचानक कुछ याद आने पर फेसबुक में कुछ लाइनें लिखी थीं,पर अच्छा लगने पर उसे तुरत बड़ा कर ब्लॉग में डाल दिया जिसे आप लोगों ने पढ़ा  और  इतना सराहा  कि उसके बाद की पंक्तियाँ अपने आप बन गईं.उम्मीद हैं,अच्छी लगेंगी!


गारा-माटी के घर गायब
कुल्हरी,समसी,लोढ़वा गायब,
लढीहा,लग्घी,बैल कै गोईं
मुसका,चरही,पगही गायब !


ग्वाबरु,गोलई,टोकनी गायब
मूड़े कै वह गोड़री गायब,
अब कइसे दिन फिरिहैं सबके,
घूरे केरि रिहाइश गायब !


चारा-सानी, चोकरा गायब,
पड़वा,पड़िया,लैरा गायब ,
ख्यातन ते,खरिहानन  ते
सीला-गल्ला,पैरा गायब !


दुलहिनि,पाहुन,बालम गायब
जनवासे ठंढाई गायब,
दुलहा,सरहज ,नेगु-कल्यावा
लरिकन कै बरतउनी गायब !

भौजी संग ठिठोली गायब
बुआ चिढ़ाती हरदम, गायब ,
कब तक मनई बचा रहत है
चिट्ठी,पान-सुपारी गायब !




  


*लढीहा=बैलगाड़ी,लग्घी=अरहर की सूखी डाली ,ग्वाबरु=गोबर,गोलई=लग्घी से बनी टोकरी ,मूड़े कै वह गोड़री =सिर पर सामान  उठाते समय रखा जाने वाली कपड़े से बनी चीज़ ,लैरा=भैंस या गाय का छोटा बच्चा 

29 मार्च 2012

कहाँ गए वो गाँव ?


गाँव,गिद्ध,गौरेया गायब
कोठरी,डेहरी,कथरी गायब,
अब तो सूखे साख खड़े हैं
कुआँ ते हैं पनिहारिन गायब !

गाँव किनारे वाला पीपल,
बरगद और लसोंहड़ा गायब,
मूंज,सनई कै खटिया,उबहनि
दरवाजे कै लाठी गायब !

बाबा कै बकुली औ धोती
अजिया केरि उघन्नी गायब,
लरिकन केर करगदा,कंठा
बिटियन कै बिछिया भै गायब !

नानी केरि कहानी गायब,
लोटिया अउर करइहा गायब,
अम्मा कै दुधहंडि औ भठिया,
बप्पा कै रामायन गायब !

आम्बन ते अम्बिया हैं गायब
चूल्हे-भूंजा ह्वारा गायब,
सोहरै,बनरा,गारी गावै-
वाली सुघर मेहेरिया गायब !

पइसन के आगे अब भइया
रिश्ते-नाते,रस्ते गायब,
शहर किहे हलकान बहुत
अब तो चैन हुँवों ते गायब !

8 जनवरी 2012

ई पवित्र होने का मौसम है भाई !


कुहरा और बरसात के मारे हम आज चौपाल मा तनिक देर से पहुँचे। जाते ही बदलू काका ने हमें घेर लिया और लगा दी झड़ी सवालों की। "सुने हो मास्टर जी ! ई भाजपा को का होइ गवा है ? अभी कुछ रोज पहिले तक यहिके नेता लोग अन्ना बाबा के गुन गावत फिरत रहे। अब सब भूलि गए का ?" मैंने लगभग अनजान बनते हुए पूछ ही लिया , "काका ! काहे इत्ता परेशान हौ ? का बात है ?" काका फुल जोश में बोले जा रहे थे, "ई बसपा के नेता हाल-फ़िलहाल तक बहिनजी के साथ मलाई पर हाथ साफ कर रहे थे, खूब लूट-लाट मचाई और इहाँ तक कि कुछ लोगन का टपकाय भी दिहेन पर अब भाजपा में शामिल होइ के अगड़ा-पिछड़ा और अन्याव का रोना रो रहे हैं। सबसे मजेदार बात तौ यह है कि भाजपा वाले कहि रहे हैं कि ऊ कुच्छौ गलत नाहीं किये हैं।"

मैंने उन्हें सांत्वना देने की कोशिश करते हुए समझाया ,"काका ! अब जमाना काफ़ी बदल चुका है और राजनीति भी। जब डाकू रत्नाकर अपना मन बदल कर महर्षि वाल्मीकि बन सकते हैं, हिन्दुओं का बड़ा ग्रन्थ लिख सकते हैं तो ये छोटे-मोटे धंधे करके अपने परिवार का पेट पालने वाले नेता क्यों नहीं बदल सकते ? इनके बदलने से अगर कोई पार्टी शुद्ध हो रही हो , सत्ता के नजदीक आकर लोगों की सेवा के लिए बेताब हो तो इसमें हर्ज़ ही क्या है ?"







काका मेरी बात से मुतमईन न लगे। मैंने उन्हें और पौराणिक उदाहरण  दिए। काका सुनो, "जब भगवान राम को लंका में बुराई पर अच्छाई की जीत चाहिए थी तो उन्होंने विभीषण को अपनी ओर मिलाया ताकि बुराई को ख़त्म करने में मदद मिल सके। अब वही काम राम के भक्तों वाली पार्टी कर रही है तो यह एक आदर्श स्थापित हो रहा है। आप नाहक परेशान हैं। इस पार्टी के लोगों ने यह भी कहा है कि उनके यहाँ जो भी आता है,पवित्र हो जाता है,बिलकुल पतितपावनी गंगा की तरह !"

काका ने फिर प्रतिवाद किया, "अभी दो दिन पहले ये सब संसद में हंगामा मचाय रहे कि मज़बूत लोकपाल लाना बहुतै ज़रूरी है और अन्ना बाबा का हमरा फुल सपोट है,तो उसका क्या ?" हमने कहा, "काका ! ई लोकपाल तो तभी जाँच करेगा न , जब कोई घपला-घोटाला होगा। सो, उसकी उपयोगिता को प्रमाणित करने के लिए पहले कुशल भ्रष्टाचारियों की भर्ती भी तो ज़रूरी है। बाद में जाँच शुरू होते ही वे उन्हें हटाकर डंके की चोट पर पाक-साफ भी बन जायेंगे। आखिर पार्टी विद डिफरेंट भी तो दिखना ज़रूरी है। जो भी सेवा कार्य या देश हित करना है, वह सत्ता में आये बिना कैसे हो सकता है ? सो, कुर्सी के लिए थोड़ा एडजस्टमेंट करने मा का बुराई है ?" 




अब तक बदलू काका हमारी बातों से सहमत हो गए लग रहे थे, हम फिर से मिलने का वादा करके घर चले आए क्योंकि शाम के समाचारों में क्या पता ...... कोई फिर पवित्र हो गया हो ?

24 दिसंबर 2011

संसद से सड़क तक !

इन खामोश निगाहों से 
मंजिल को जाती राहों से 
होरी,धनिया की आहों से 
अनगिन किये गुनाहों से 

कब तक तुम बच पाओगे,
सभी आदरणीयों से माफ़ी सहित 
कभी सड़क पर तो आओगे !! १!


अपने को ही मार रहे
बनत बड़े हुशियार रहे 
गरम हवा के साथ बहे
कुछौ न करिहौ बिना कहे ?

कब तक घूँघट डाल रखोगे,
कभी तो पनघट पर आओगे !! २!


आग भरी है हमरे दिल मा
रोज कर रहे हम पैकरमा 
चुहल कर रहे तुम संसद मा
कितने छेद कर दिए बिल मा 

तुम किस बिल में घुस पाओगे,
बीच सड़क जब आ जाओगे ? ३!

हमने तो ये सोच रखा है
धीरज को तुमने परखा है 
ताक में गाँधी का चरखा है 
चारा,रबड़ी खूब चखा है 

अब तुम हड्डियां चबाओगे ?
शायद सुकून तब पाओगे !! ४ !






19 दिसंबर 2011

ये है अपना बैसवाड़ा !

बैसवारा ( बैसवाड़ा )  में रहने के बावजूद इसके बारे में कई धारणाओं और प्रवृत्तियों से अनभिज्ञ रहा हूँ.वहाँ जन्म लेने से स्वभावगत विशेषताएं भले आ गईं हों पर हमेशा यह जिज्ञासा बनी रही कि आखिर इसका इतिहास ,इसकी संस्कृति क्या है? इस बैसवारे ने हर क्षेत्र में अपना अद्भुत योगदान दिया है.जहाँ आज़ादी के आन्दोलन में चंद्र शेखर आज़ाद,राणा बेनी माधव,राजा राव राम बक्स सिंह  आदि अगुआ रहे,वहीँ मुंशीगंज का किसान-आन्दोलन भी खूब सुर्ख़ियों में रहा.साहित्य का तो प्रचुर भंडार रहा बैसवारा. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदीजी,महाकवि निराला,भाषाविद व आलोचक डॉ.राम विलास शर्मा,भाषा-विज्ञानी पंडित रघुनन्दन प्रसाद शर्मा ,हसरत मोहानी का नाम तो हिंदी साहित्याकाश में दर्ज है ही ,शिवमंगल सिंह 'सुमन' और मुनव्वर राणा जैसे कवि भी अपना परचम  लहरा चुके हैं. इसी बैसवारे के बारे में कुछ तथ्य डॉ. राम विलास शर्मा जी ने निरालाजी की जीवनी "निराला की शक्ति-साधना' में उद्घाटित किया है,वह उल्लेखनीय है:

अवध का पछाहीं भाग  बैसवाड़ा कहलाता है.उन्नाव और रायबरेली  जिलों के लगभग डेढ़ हज़ार वर्गमील के इस इलाके में बसी हुई जनता अपनी बोली ,अपनी लोक-संस्कृति ,अपनी ऐतिहासिक परम्पराओं पर बड़ा अभिमान करती है.यहाँ के लोग अपने जीवट और हेकड़ी के  लिए विख्यात हैं.भारतेंदु ने  बैसवाड़े  की यात्रा के बाद लिखा था  कि यहाँ का हर आदमी अपने को भीम और अर्जुन समझता है.इनकी भाषा ही कुछ ऐसी है कि लोग सीधे स्वभाव बात कर रहे हों तो अजनबी को लगेगा कि लड़ रहे हैं.ब्रजभाषा का  गुण मिठास है,बैसवाड़ी का पौरुष.  बैसवाड़े  का शायद  ही कोई घर हो,खासकर बाम्हन-ठाकुर का,जिसमें कोई फौज में सिपाही,हवलदार या सूबेदार न रहा हो !


बैसवाड़ा के अतीत की चर्चा करते हुए आगे ज़िक्र है....चौपाल में  आल्हा जमने पर आधा गाँव इकठ्ठा हो जाता ;नौटंकी देखने दूर-दूर के गाँवों से मनचले जवान टूट पड़ते.ताजियों में हिन्दू भी शरीक होते थे.अवधी में जब मुसलमान  मर्सिये गाते थे,तब सुनने वाले धर्म की बात भूलकर काव्य-रस में डूब जाते थे.


दिवाली की रात खेतों में दिए जलाकर किसान 'धरती माता जागो' की पुकार लगाते. कतकी के पर्व पर सैंकडों  बैलगाडियां घुंघुरू  बजाती गंगा की ओर दौड़ चलतीं.किसान होली में नए अन्न की बालें भूनते ,अलैया-बलैया गाँव की सीमा के  बाहर भगाते,ढोल-मंजीरे के साथ फाग गाते हुए निकलते.


गंगा,लोन,सई नदियों से सींची हुई  बैसवाड़े  की धरती उपजाऊ है. यहाँ की घनी अमराइयों में कोसों तक बौर महक उठते हैं,चाँदनी रात में सफ़ेद धरती पर चुपचाप रसभरे महुए टपकते हैं,कोल्हू में ईख पेरी जाती है,कड़ाह में रस  खौलता है,चीपी,पतोई,राब की अलग-अलग मिठास की चर्चा होती है,तालों में कहीं लाल-सफ़ेद कमाल,रात में खिली हुई कोकाबेली,भीगी हुई सनई  की  गंध,ज्वार के पेड़ों में लिपटी हुई कचेलियों का सोंधापन,जाऊ और गेहूँ के खेतों में शांत ,बहता हुआ ,पुर से निकला हुआ,कुएं का पानी-कोई आश्चर्य नहीं कि यहाँ के लोगों को अपनी धरती से बड़ा प्यार है जिसे वे अकसर  तब समझते हैं  जब उन्हें बैसवाड़े  से दूर कहीं रहना होता है !


सच मानिए ,यह सब पढ़कर ,जानकर आज बैसवाड़े से दूर रहकर भी उतना ही सच्चा और अपना लगता है.यहाँ की स्वभावगत विशेषताओं को उजागर करने  के लिए रामविलास जी का विशेष आभार.निराला के ऊपर इस  बैसवाड़े का क्या असर पड़ा,इस बारे में फिर कभी !

18 अक्टूबर 2011

अच्छा लगता था !

घर की डेहरी  पर 
घंटों बैठे 
बिना काम के 
अम्मा से चिज्जी की फ़रमाइश करते 
झूठ-मूठ का रोना रोते 
मांगें अपनी पूरी करवाना 
अच्छा लगता था!

छोटी-सी गप्पी में 
कंचों को लुढकाना
ऐंठ मारकर 
बड़ी दूर से टिप्पा साधे 
हर बाज़ी चाहते जीतना
अपने कंचों की थैली को 
रोज़ बढ़ाते ही रहना 
अच्छा लगता था !

डंडे पर गुल्ली को रखकर 
दूर भगाते और लपकते 
रात को चाँद  की निगरानी में 
अपने कई दोस्तों के संग 
पाटा लगे हुए खेतों पर 
भुरभुर माटी की छाती पर 
दौड़ लगा झाबर* खेलना
अच्छा लगता था !

आमों की बगिया में 
ढेला लेकर आम टीपना 
झुकी हुई डाली को कसकर 
और झुकाना उसे हिलाना 
जामुन को भी आँख दिखाना 
चोरी से अमरुद तोड़ना
गोल बनाकर बेर गिराना   
अच्छा लगता था !

कतकी के मेले में जाना,
पूड़ी,रबड़ी खूब उड़ाना,
भइया* की उंगली  पकड़े
डमरू और पिपिहरी लेना,
पट्टी और जलेबी खाना 
बैलों की गाड़ी में चढ़कर 
चलत बैल को अरई मारना  
अच्छा लगता था !!

खेतों की मेड़ों पर सरपट 
नंगे पाँव भागते जाना ,
गन्ने के खेतों में घुसकर 
गन्ने का हर पोर चूसना ,
बित्ते भर का झाड़ चने का 
जड़ से उखाड़ कर ख़ूब छीलना
अच्छा लगता था !



झाबर*=पकड़ा-पकड़ी का खेल, भइया*=अपने पिताजी को हम यही कहते हैं 



10 अक्टूबर 2011

राम विलास शर्मा को पढ़ते हुए !



क़रीब दस-बारह साल बाद  दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी गया था.हालाँकि घर में पढने लायक अथाह भंडार मौज़ूद  है,पर कई दिनों से अज्ञेय की आत्मकथा 'शेखर :एक जीवनी' को पढने की प्रबल  इच्छा थी मन में ! पुस्तकालय में जाकर पुनः सदस्य बनने का तात्कालिक कारण यह भी रहा.बहरहाल,आसानी से सदस्यता ग्रहण करके मैंने अपनी वांछित पुस्तक की खोज शुरू की ,पर वह उस समय वहां उपलब्ध नहीं थी. मैंने उसका विकल्प खोजना शुरू किया तो सहसा मेरी नज़र 'अपनी धरती,अपने लोग' पर पड़ी और उसे खोलते ही जिस तरह की भाषा मुझे दिखी,उससे मैं सहज ही आकर्षित हो गया.यह राम विलास शर्मा की आत्मकथा के तीन खण्डों का पहला भाग था.मैं लेखक के नाम से पहले से ही परिचित था,चूंकि वे हमारे बैसवारा के ही रहनेवाले थे,इसलिए उनकी आत्मकथा पढने में अतिरिक्त रूचि लगी और मैंने उस पुस्तक को ले लिया.हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा व जिन्ना के जीवन के बारे में अमेरिकी लेखक की लिखी पुस्तक ही इससे पहले मैंने जीवनी के नाम पर पढ़ीं थीं !


'मुंडेर पर सूरज' इस आत्मकथा का पहला भाग है,जिसमें लेखक के बचपन से लेकर अध्यापन-कार्य से मुक्त होने तक की अवधि को तफ़सील से बताया गया है.उनका शुरुआती जीवन अपने बाबा के साथ गाँव में बीता और इस दौरान होने वाले अनुभव मेरे लिहाज़ से सबसे ज़्यादा रोमांचकारी रहे क्योंकि उन प्रसंगों को राम विलास शर्माजी ने जस-का -तस धर दिया है .इसमें देशज शब्दों की भरमार  है.जिन शब्दों को मैं भूल-सा रहा था,उन्हें किताब में पाकर निहाल हो उठा.जिस जीवन को मैंने अपने बचपन में जिया था,इतने बरसों बाद लग रहा है कि यह मेरी अपनी ही कहानी है. इस तरह के कुछ अंश यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ.


रसोई के बगल में  छोटी खमसार थी.एक तरफ सौरिहाई जहाँ मेरा जन्म हुआ था,दूसरी तरफ आटा,दाल,चावल,गुड़ रखने की कोठरी;खमसार में एक तरफ बड़ी चकिया ,दूसरी तरफ धान कूटने की  ओखली,उसी के ऊपर दीवाल में घी,तेल की हांडियां रखने का पेटहरा  !

                                                             ***************
कुछ  दिन में बाबा ठीक हो गए और मैं उनके साथ सोने लगा.सोने के पहले घुन्घूमनैयाँ करते थे .चित लेटकर पैर मोड़ लेते थे,उन पर मुझे लिटाकर घुटने छाती की तरफ़ लाते,फिर पीछे ले जाते. इस तरह झूला झुलाते हुए गाते जाते थे,घुन्घूमनैयाँ ,खंत खनैया ,कौड़ी पइयां,गंग बहइयां...और अंत में पैरों पर मुझे उठाते हुए  कहते थे,बच्चा का बिहाव होय,कंडाल  बाजे भोंपड़ प पों,पों !


इस तरह और भी कई जगह रोचक और जीवंत-प्रसंग हैं. कथरी,नहा ,पगही,चीपर,अंबिया,कुसुली गड़  आदि न जाने कितने शब्द हैं जो बैसवारे में ही बोले और सुने जाते हैं! इस तरह उन्होंने हचक के अवधी व बैसवारी शब्दों का प्रयोग किया है.


राम विलास शर्मा जी की ख्याति एक आलोचक के रूप में ही ज़्यादा रही,इसलिए भी आम पाठक उन्हें अधिक नहीं पढ़ या जान पाया.कहते हैं कि निराला के बारे में  जितनी प्रामाणिक जानकारी  शर्माजी के पास थी,शायद ही किसी के पास रही हो.वे अपने लखनऊ -प्रवास के दौरान निरालाजी के संपर्क में आये और उनकी गाढ़ी दोस्ती हो गयी.वे निराला के गाँव गढ़ाकोला(उन्नाव) भी गए थे.निरालाजी ने कई बार उनको मानसिक सहयोग दिया,जिसका उन्होंने पुस्तक में जिक्र भी किया है.'तुलसी' के बारे में भी राम विलास जी ने ख्याति पायी है.इन्होंने निराला और तुलसी पर अलग से काफी-कुछ लिखा है !आलोचना के क्षेत्र में राम चन्द्र शुक्ल के बाद उस समय के आलोचकों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है.


महावीर प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्माजी के गाँव आस-पास ही थे,यह मेरा सौभाग्य है कि  मेरा गाँव भी इन दोनों विभूतियों से बहुत दूर नहीं है ! दिल्ली में रहते हुए भी शर्माजी से मिल नहीं पाया ,इसकी टीस ज़रूर हमेशा रहेगी !

पुस्तक पढने के दौरान ही यह जाना कि शर्माजी का जन्मदिन दस अक्टूबर को पड़ता है,संयोग से आज वही दिन है और  ख़ास बात यह है कि  यह उनके जन्मशती-वर्ष की शुरुआत का दिन भी है !इस नाते भी हमें उनको,उनके किये गए कामों को याद करना ज़रूरी है.उस महान आलोचक और लेखक की याद को शत-शत नमन ! 


 



1 मार्च 2010

होरी औ कम्पूटर बाबा !

होरी कै सबका मुबारकबाद !होरी तो हर साल की तरा आई है,मुदा अबकी हम स्वाचा कि होरी अपने कम्पूटर बाबा के साथै मनाइ । एकु दिन पहिलेहेते हम फेसबुक,ट्विटर और ब्लागवा मा धंसि गैन। जहाँ-तहां हम भकुअन कि तरा घूमित रहेन मुदा हमका कउनो रसिया न मिली जहिते हम फागुन की आंड़ मा आपन काम बना लेई ! सही बताइ,यहि कम्पूटरी दुनिया मा हम एकदम बौझक हन ।


अपने बचपन मा ,जब हम गाँव मा रहित रहेन तब सही मा, बड़ी मजा आवति रहै। धुलेंडी के दिन आपनि बानर -सेना तय्यार कइके खूब हंगामा मचाइत रहेन। बादि मा जब घर-घर फागु जाति रहै तो वहिमा बड़ा आनंद आवत रहै। कतो गुर-भंगा मिलै तो कतो कुसुली (गुझिया) ,कतो-कतो ऊंख का रसु औ पानौ मिलत रहैं.फाग गावै मा बड़ी मजा आवति रहै। जब फागु ना आवै तो सबके सुर मा सुर मिला के यह बताइत रहेन कि हमहुक आवथि ।

जब ते हम लिखि -पढ़ि के तय्यार भैन तो लागत कि सबते बड़े भकुआ हम ही हन ।अब ना तो वी मनई रहे,ना भौजाई और ना वी तेउहार । बस बचे हैं तो हमारि जइसि कुछु भकुआ जिनके लगे कउनो काम नहिन सिवाय कम्पूटर बाबा मा भड़ास निकारै के !

बुरा न मानो होरी हैं.....





18 फ़रवरी 2009

अमर सिंग ते बच्यो!

भइया ,सुना है की अमर सिंग बहुत गुस्सा मा हैं । वी पतरकार भाइन के सामने अउतै एकदम ते फैलि गे। ज़ोर -ज़ोर से वी चिल्ला रहें हैं की एकु आदमी की वजा ते काम बेगडि जाइ । कांगरेस मा दिग्गी भइया ते वे एत्ता नराज़ हैं की पूछो ना। बस वी एकदम खौरिहानि घूमि रहे हैं , काहे ते दिग्गी भइया कहि देहेन हैं की सपा ते समझउता होय पर कांगरेस साफ़ होइ जाइ। अब यह नूरा कुश्ती आम आदमी कहाँ समझथ ?
तो हे भइया जब तक चुनाव नहीं होइ जात तब तक दिग्गी भइया का अमर सिंग ते बचिकै रहै क परी!

26 नवंबर 2008

हमरे घर ते आई चिट्ठी !

अम्मा का प्यार दुलार लिखा,
बप्पा का आसिरवाद छुपा ,
भइया ,भउजी का सनेहु,
बहिनी कै चाहत लिखी सदा ,
हम फूले नहीं समाय रहेन,

हमका मिली गाँव कै मट्टी ।
हमरे घर ते आई चिट्ठी ।

'बच्चा ,अपने खान-पियन का
ध्यान हमेशा राख्यो ,
ग़लत राह ना कबहूँ पकड्यो
बातै
हमरी गांठी बाँध्यो

अम्मा आगे लिखवाती हैं
'बच्चा ,तुम बिन होरी बीती ,

तुम रह्यो नहिन मनु लाग नहिन ,
हम दुःख के आंस रहिन
पीती,

तुम हमारि आसा बत्ती ,
हमरे घर ते आई चिट्ठी ।

बप्पा हमका समझाय कहेन ,
'आपन काम लगन ते कीन्ह्यो ,

एकु बात अउ समुझि लेव ,
चिट्ठी जल्दी -जल्दी दीन्ह्यो ,


आंबे मा लागि गई अम्बिया खट्टी,
हमरे घर ते आई चिट्ठी ।

भउजी कै बिथा बड़ी भारी
'बच्चा , का भूलि गयो हमका ?

तुम्हरे भइया ते रोजु कहिथ,
जल्दी ते लई आवैं तुमका ।

तुम चले आव पउतै चिट्ठी
हमरे घर ते आई चिट्ठी । ।
 

दल्ली -राजहरा ,छत्तीसगढ़ --31-03-1991

25 नवंबर 2008

बैसवारा कै कथा

यार, हम बैसवारा के अहिन औ बहुत दिनन ते सोचित अहिन कि अपनी बोली मा कुछु लिखी मुदा आजु मौका मिला है । सबते पहिले यहि बोली क पहिचान देवावै के बरे रमई काका यानी चंद्रभूषण त्रिवेदी क यादि करिथ.हमार बैसवारा राजा राव रामबख्श सिंह,महावीर प्रसाद द्विवेदी ,निराला,राणा बेनी माधव ,पंडित रघुनन्दन प्रसाद शर्मा ,काका बैसवारी ,चंद्रशेखर आजाद ,लल्लू बाजपेई, शिव बहादुर सिंह भदौरिया अउर न जाने केतनी विभूतिन ते भरा परा है ,अगर कभी मौका मिला तो सारी लिस्ट गिना द्याबै.अब जब शुरुआत होइ चुकी है तो हम सब बैसवारा प्रेमिन ते विनती करिथ कि उनके पास जौनि जानकारी होय वहिका स्वागत है .