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13 फ़रवरी 2012

शहरयार को सलाम !


अभी थोड़ी देर पहले अचानक फेसबुक में काजल कुमार जी के हवाले से खबर दिखी जिसमें बताया गया कि हमारे आला दर्जे के शायर शहरयार जी नहीं रहे ! अचानक वातावरण में एक स्तब्धता-सी छा गयी. वे गंगा-जमुनी संस्कृति के आखिरी पीढ़ी के प्रतिनिधि शायर थे.उनका यूँ अचानक चले जाना हिंदी ,उर्दू दोनों के लिए एक बड़ा धक्का है.'सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूं है,इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूं है " आदि न जाने ऐसे कितने नगमें हमें याद आयेंगे !



फिलहाल उनके बारे में संक्षिप्त जानकारी 


विकीपीडिया से साभार :


शहरयार का पूरा नाम कुंवर अख़लाक़ मुहम्मद ख़ान है, लेकिन इन्हें इनके तख़ल्लुस या उपनाम 'शहरयार' से ही पहचाना जाना जाता है. 1961 में उर्दू में स्नातकोत्तर डिग्री लेने के बाद उन्होंने 1966 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उर्दू के लेक्चरर के तौर पर काम शुरू किया.
वह यहीं से उर्दू विभाग के अध्यक्ष के तौर पर सेवानिवृत्त भी हुए. शहरयार ने गमन और आहिस्ता- आहिस्ता आदि कुछ हिंदी फ़िल्मों में गीत लिखे लेकिन उन्हें सबसे ज़्यादा लोकप्रियता 1981 में बनी फ़िल्म 'उमराव जान' से मिली.
वर्ष 2008 के लिए 44 वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजे गये शहरयार का जन्म 1936 में हुआ. बेहद जानकार और विद्वान शायर के तौर पर अपनी रचनाओं के जरिए वह स्व अनुभूतियों और खुद की कोशिश से आधुनिक वक्त की समस्याओं को समझने की कोशिश करते नजर आते हैं.
'इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं, जुस्तजू जिस की थी उसको तो न पाया हमने, दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये, कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता. जैसे गीत लिख कर हिंदी फ़िल्म जगत में शहरयार बेहद लोकप्रिय हुये हैं.
इस वक्त की जदीद उर्दू शायरी को गढ़ने में अहम भूमिका निभाने वाले शहरयार को उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, दिल्ली उर्दू पुरस्कार और फ़िराक सम्मान सहित कई पुरस्कारों से नवाजा गया.

उन्हें ब्लॉगर-परिवार की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि !
आला गज़लकार शहरयार,हमसे बिछुड़ गया,
हिंदी,उर्दू दोनों बहनों का गुलशन उजड़ गया !
नायाब शायर शहरयार को,हमसे जुदा किया,
खुदा को भी किसी फ़रिश्ते की तलाश थी !