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25 जुलाई 2012

बादल को किसने देखा है ?

रोज़ सुबह उठकर
बालकनी से निहारता हूँ,
मेरे नीले आसमान में
बादलों के काले-घुंघराले निशान
नहीं दिखते दूर-दूर तलक |
दिल एकदम से बैठ जाता है,
फ़िर से बालकनी को छोड़कर
बादलों को दो बातें सुनाकर
सुखा देता हूँ अपना हलक |

दिन में भी कई बार
देखता हूँ आकाश को
मानसूनी-मौसम में
सीधा-सपाट |
मेह के बिना,
कितना बंजर है वह ?
हम ताकते हैं उससे
उम्मीद की फ़सल
जबकि पत्थरों से फोड़े हैं
खुद अपने ललाट |

अपनी प्रगति की दौड़ में
बिसरा दिया प्रकृति को,
खा गए उसके सब फल |
सोख लिया उसके समुद्र को,
भर लिया असीमित पेट
खाली कर धरती की कोख
लूट लिया नई पीढ़ी के स्वप्न
दे दिया सीमेंट के महल |

अब आसमान को निहारने में
आँख भी साथ नहीं देती,
ज़मीन के साथ-साथ
अब यह भी नम नहीं होती|
बाबा नागार्जुन ने बहुत पहले
बादल को घिरते देखा था,
हम आज की दुनिया में
आगे बढ़ते
प्रगति करते हुए
महज़ कागजी-सवाल करते हैं,
'बादल को किसने देखा है ?'

13 जुलाई 2012

वर्षा गीत !

वर्षा की रिमझिम बूंदों ने 
मन में नई मिठास भरी,
नए-नए पौधों से सजकर 
सारी धरती हुई हरी ||


सूरज की कठिन चुभन से
तन जब अग्नि समान हुआ,
मेघ-देव से जल-प्रसाद पा 
शीतल,शांत महान हुआ ||


झड़ी लगी जब वर्षा की 
लबालब्ब सब खेत हुए,
कृषकों के नाचे मन-मयूर 
मुदित सभी के हृदय हुए ||


वर्षा-देवी के स्वागत में
सूरज ने गरमी रोकी ,
पशु-पक्षी सारे चहक उठे
आई बहार भी फूलों की ||


हे वर्षा-देवी ! स्वागत-स्वागत 
सूखी धरती पर बार-बार,
तुम आईं ,जीवन आया 
संग में आईं खुशियाँ हज़ार ||




विशेष : रचनाकाल --१८/०६/१९९० 
स्थान: दल्ली-राजहरा (छत्तीसगढ़)