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23 अगस्त 2011

डॉ.अमर कुमार ,जो अब अमर हो गए !




जिन्होंने हमसे वादा किया था कि आठ-दस दिन में अपनी बीमारी से पार पाकर फिर से ब्लॉग-जगत में हम सबसे मुखातिब होंगे,सक्रिय होंगे पर वह अपना वादा पूरा नहीं कर पाए.अपने को टाइम-खोटीकार कहने वाले,हर दिल अज़ीज़,हिंदी के मशहूर तंजकार और तकनीकी रूप से विशुद्ध ब्लॉगर डॉ.अमर कुमार हमारे बीच में अब भौतिक रूप से नहीं रहे.वे अपने लेखों से तो हमें प्रभावित करते ही थे,उनकी टीपों का हर ब्लॉगर को बेकरारी से इन्तज़ार रहता था!

अभी थोड़ी देर पहले भाई अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने फोन करके इस दुखद घटना की जानकारी दी .मैं बिलकुल सन्न और हतप्रभ रह गया.अभी पिछली बारह अगस्त को पहली बार उनसे भेंट हुई थी.उनसे मिलने के बाद हमने उनसे यह कहा था कि मैं उन पर एक पोस्ट लिखूँगा,वापस आने के बाद कुछ लिखा भी पर न जाने कैसे-कैसे व्यवधान आते गए और आज देखो उस कहानी का उपसंहार लिख रहा हूँ जिसकी प्रस्तावना, कथानक कुछ भी न लिख पाया था!

बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए,जबसे मैं डॉ. साहब से परिचित हुआ ! कोई छः महीने हुए होंगे जब वो अचानक मेरे ब्लॉग पर आये और उनकी टीप पढकर मैं उनके ब्लॉग पर पहुँचा ! उनका लेखन तो अच्छा लगा ही ,रायबरेली के हैं, यह जानकर मेरी जिज्ञासा उनके बारे में और बढ़ी और मैंने उनको अपना नंबर देकर संपर्क करने की गुजारिश की .दो-तीन दिन बाद ही उनका फोन आया,उन्होंने बड़ी आत्मीयता से बात की और हमने भी वादा किया कि जब अगली बार रायबरेली आयेंगे तो उनसे ज़रूर मिलेंगे !

मैं इसी जुलाई को उनसे बात करके भी मुलाकात न कर सका,साथ में प्रवीण त्रिवेदी को भी जाना था पर उसी दिन फतेहपुर में कालका मेल दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से हम लोग नहीं जा सके.डॉ. साहब कह रहे थे कि उन्हें दो पंडितों को भोजन कराने का पुण्य मिलेगा पर शायद यह पुण्यलाभ हम दोनों को नसीब नहीं था.मैं उसी दिन दिल्ली लौट आया !

जब इस रक्षाबंधन में गाँव गया तो रायबरेली जाना सुनिश्चित कर रखा था.साथ में डॉ.अरविन्द मिश्र की भी हिदायत थी कि वहाँ जा रहे हो तो डॉ.अमर कुमार से मिलते आना,काफी दिनों से उनकी खोज-खबर नहीं मिली है!अमरेन्द्र भाई,प्रवीण जी और अनूप शुक्ल (फुरसतिया) की भी यही इच्छा थी.रायबरेली शहर मेरा जनपद है जो मेरे गाँव से पचास किमी दूर है.इसलिए वहाँ ज्यादा जाना नहीं हो पाता!.


बहरहाल,मैं बारह अगस्त की शाम को फोन पर बात करके डॉ.साहब के घर पहुँचा और थोड़ी देर में मैं उनके सामने खड़ा था.मन में जो जोश-खरोश था वह गायब था.डॉ.साहब बिस्तर पर बिलकुल सीधे लेटे हुए थे,मुझे देखते ही उनके मुँह से निकला,हम आप से मिल चुके हैं ,पर मैंने तुरत कहा कि 'नहीं ,यह हमारी पहली मुलाकात है !" काश ! यह आखिरी न होती !

हम वहाँ करीब पैंतालीस मिनट रहे.डॉ, साहब की शारीरिक दशा ऐसी नहीं थी कि उनसे ज्यादा बात की जाए,पर उन्होंने इतने कम समय में भी हमें अपने सम्मोहन में ले लिया था.वह बहुत कम बोल पा रहे थे,हमारी ज्यादा सुन रहे थे.मैंने ब्लॉगिंग के बारे में,ब्लॉगर मित्रों के विषय में उनसे बात की और उन्होंने पूरी तन्मयता से सुना.अरविन्द मिश्रजी,अनूप शुक्ल जी,प्रवीण त्रिवेदी,ज्ञानदत्तजी के बारे में उन्होंने बड़ी रूचि और आदर प्रकट किया.समीर लाल जी (उड़नतश्तरी) के भी एक बार वहाँ आने का जिक्र किया था!

जिस बिस्तर पर वे लेटे थे ,सामने कंप्यूटर रखा और हिंदी के पुराने गाने बज रहे थे. उन्होंने बताया कि वायस ऑफ अमेरिका से लगातार गाने आते रहते हैं,वही स्टेशन लगा लेते हैं!इसी बीच अपने मोबाइल पर आया हुआ एक चुटकुला भी उन्होंने हमें पढवाया !

उनको सबसे ज़्यादा तकलीफ़ बोलने को लेकर थी .उठ कर बैठना बहुत कठिन था.जब बातों-बातों में मैंने यह कहा कि मैं उन पर एक पोस्ट लिखना चाहता हूँ और इसके लिए एक तस्वीर चाहिए.अस्वस्थता के बावजूद उन्होंने मेरा मन रखने के लिए अपना चित्र लेने दिया!उन्होंने दो-तीन बार अपनी उस हालत पर विवशता प्रकट की और कहा कि वह इस दशा में उनसे मिल रहे हैं.मैंने अपनी ओर से भरपूर ढाढस दिया कि वे बिलकुल चिंतित न हों ,जल्दी ही हमारे बीच होंगे!वे बीमार ज़रूर थे पर जीवन के प्रति निराश नहीं !


चलने का समय आया तो मैं कह नहीं पा रहा था,वे भरी और गहरी निगाह से मुझे देख रहे थे.मैंने हाथ बढ़ाया तो उन्होंने मेरे हाथ को अपने माथे से लगा लिया! सच में,यह मेरी जिंदगी का सबसे भावुक क्षण था !मैंने भी उनके हाथ को अपने माथे पर लगाकर कहा कि बस,आप हमें आशीर्वाद दें,हमारा मार्गदर्शन करें,हम आपको जल्द सक्रिय रूप में देखना चाहते हैं.उन्होंने चलते-चलते मुझसे आठ-दस दिन का समय माँगा था,जो अब कभी नहीं आएगा.उनके कमरे से निकलकर मुझमें पीछे मुड़ने की शक्ति नहीं थी,पर उनकी आवाज़ सुनाई दी,रूबी,(डॉ.साहब की धर्मपत्नी) देखो,इन्हें छोड़ दो

मैं उनसे मिलकर बाहर आने के बाद समझ नहीं पा रहा था कि इस मुलाकात पर खुश होऊँ या डॉ. साहब की हालत पर दुखी!मेरे मन में जहाँ उनसे मिलने का संतोष था,वहीँ उनकी ऐसी दशा पर शोक !

दिल्ली आने पर एक दिन कुछ लिखने की कोशिश की,आगे नहीं बढ़ पाया.कहाँ से शुरू करूँ,कहाँ खत्म,पर डॉ.साहब ने हमारी दुविधा को शायद भाँप लिया था और उन्होंने इस पोस्ट को पोस्ट(बाद) की सार्थकता दे दी .हमें उनसे बहुत कुछ सीखना,जानना था,पर वह हम सबके साथ खोट कर गए.वास्तव में वे पक्के दगाबाज़ निकले.अपने दोस्तों को इस अंतरजाल’,कंप्यूटर और की-बोर्ड की दुनिया में खटर-पटर करने को अकेला छोड़ गए !

उनसे मिलकर आने के तुरत बाद उनकी दशा पर दिमाग में ये लाइनें अचानक आईं थीं :

जिंदगी मुझसे मिली कुछ इस तरह,
वह बोलती,कहती रही,सुनता रहा मैं

उस महान पुण्यात्मा को शत-शत नमन !


3 अप्रैल 2011

माँ की दुआ !

हमारी अम्मा करीब सत्तर की हो रही हैं.अभी कुछ दिनों पहले उनकी तबियत खराब हुई तो उन्हें भइया (पिताजी को हम सब यही कहते हैं) गाँव से लखनऊ ले आए .वहाँ हमारी बहन के यहाँ अम्मा रुकीं .तीन-चार दिन के इलाज़ के बाद मुझसे जब बात हुई तो उन्होंने बताया कि तबियत ज़्यादा ठीक नहीं है.मैंने तुरत-फुरत लखनऊ जाने का कार्यक्रम बना लिया .

अम्मा-भइया
मुझे  देखकर अम्मा बड़ी खुश हुईं .हमने उन्हें यही बताया कि जो भी परेशानी है,बुढ़ापे  की वज़ह से है और पैरों में जो दर्द रहता है तो थोड़ा टहला करो (हालाँकि इस फार्मूले पर मैं स्वयं अमल नहीं करता ).हमारे पास समय ज़्यादा था नहीं सो थोड़ी देर के बाद वहाँ से निकलने लगे .अम्मा के पैर छूकर जब विदा लेने लगे तो उन्होंने अपनी धोती में बंधे एक रुमाल को निकाला .रूमाल में तीन जगह गाँठें लगी हुई थीं .मैंने देखा, उसमें एक में  तम्बाकू की पुड़िया थी,दूसरी में दवाई का पत्ता.अम्मा अभी भी कुछ ढूंढें जा रही थीं .आखिर तीसरी गाँठ में से एक मुड़ा-तुडा  नोट निकालकर उन्होंने  मेरी ओर बढ़ा दिया .

मैंने अचकचाकर सवालिया नज़रों से उन्हें देखा तो उन्होंने कहा,"हम जानिथ तू कमात है मुदा यह हम अपने पोता-पोतिन के बरे दई रहिन!" सच मानिए ,उस वक़्त मुझे ऐसा लगा कि हमारी ढेर सारी कमाई उस एक नोट के आगे पानी माँग रही थी ,लज्जित थी.उनका आशीर्वाद समझकर मैंने सर-माथे लिया और दुखी मन से अम्मा से विदा ली .मैं उनके लिए तो कोई कारगर दवा नहीं दे पाया ,पर मेरे पास माँ की दुआ थी जो दुनिया में सबसे बड़ी दवा होती है !

मुझे पहले भी शहर में रहते हुए कई बार लगा कि हमने अपने जीवन में माँ-बाप की सेवा का मौका हमेशा के लिए गवाँ दिया है क्योंकि दोनों लोग शहरी-जीवन को बिलकुल बर्दाश्त नहीं कर सकते. कई बार मैं जब बातों-बातों में गाँव में न रहने की बात करता तो सबसे ज़्यादा बेचैनी अम्मा को ही  होती.इसीलिये लखनऊ में घर की व्यवस्था हो जाने के बावजूद अम्मा ने अपनी जिद से गाँव में हमारे लिए अलग घर भी बनवा दिया है,इस उम्मीद में कि यदि घर रहेगा तो एक दिन मैं ज़रूर उसमें रहने आऊँगा !

अम्मा ने बचपन में हमारे लिए जान लगा दी,अब भी हमारे बिना हूकती हैं,पर का करें,बिना नौकरी किये भी गुजारा  नहीं है.हम वहाँ नहीं जा सकते ,वे यहाँ नहीं आ सकतीं !क्या हर माँ-बाप अपने बच्चों के पैदा होने पर उनसे यही उम्मीद करते हैं? जीवन के जिस मोड़ पर उन्हें अपनी संतानों की  ज़रूरत होती है,तभी वह उनसे दूर होते हैं! यह हमारी,आपकी, सबकी विडम्बना है !

15 मार्च 2010

पढ़ने की ललक लेकर गए वे !

पिछले दो दिनों से वे कोमा में थे। हमें किसी बुरी खबर की आशंका थी,और अंततः कल शाम वो ख़बर मिली ,जिसने हमारे 'पंडितजी '(बचऊ पंडितजी) को भौतिक रूप से हमसे अलग कर दिया !जिनके लिए हम प्रार्थनाएं करते रहे वे स्वयं प्रार्थना-स्वरुप हो गए !
क़रीब छः महीने पहले वे अपने प्यारे गाँव को छोड़कर चिकित्सकीय इलाज़ के लिए शहर(कानपुर)की बेरंग ज़िन्दगी को जीने आ गए थे । मेरी नियमित रूप से उनसे बातें होती रहती थीं और वे बड़े स्नेह के साथ मुझे याद करते!मैं उनसे लगातार इसलिए भी बातें करता रहा कि उनको अपनी उपस्थिति ,बीमारी के बावज़ूद , एक बोझ की तरह न लगे। पचानवे की उमर के होने के बाद भी ग़जब का जीवट उनमें था। आख़िरी समय में भी वे पढ़ने की ललक लिए हुए गए !
जब तीन रोज़ पहले मैंने उन्हें फ़ोन किया तो उनकी पोती ने बताया कि एक रोज़ पहले वे अख़बार और चश्मा लेकर घर की छत पर जा रहे थे। बीमार होने की वज़ह से उनसे यह अपेक्षा थी कि वे बिना बताये कहीं न जाएँ। पर,ऊपर वाले को भी किसी बहाने की तलाश थी। वे तीन-चार सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद ऐसे लुढ़के कि फिर उठ न सके !
मैं जब मिडिल स्कूल में था तो 'पंडिज्जी' उस में प्रधानाध्यापक थे। वे हमें अंग्रेज़ी पढ़ाते थे और बिरले ही छात्र थे जो उनकी 'स्पीड' को पकड़ पाते थे। मेरे बारे में उन्होंने एक बार कहा था "इस उम्र में इतनी तेज़ी से अंग्रेज़ी शायद ही कोई पढ़ता हो।". पंडित जी मेरे पिताजी के भी गुरु रह चुके थे। पढाई के दौरान ही उन्होंने एक छात्र का ज़िक्र किया था कि उसे 'सुंदर कांड' पूरा याद है,बस तभी से मैं भी जुट गया था और नतीज़तन, दो साल के अन्दर मैंने सुंदर कांड,किष्किन्धा कांड और अरण्य कांड रट डाले थे. यह वाक़या बताने का उद्देश्य यह था कि शिक्षक की प्रेरणा क्या काम कर सकती है ?
मैं तीन महीने पहले उनसे मिला था तो उन्हें अमेरिकी इतिहासकार की जिन्ना की लिखी पुस्तक दे आया था ,जिसे थोड़ा ही वो पढ़ पाए होंगे कि काफ़ी बीमार हो गए थे। अभी दस -बारह दिन पहले बात हुई थी तो मैंने उनसे कहा था कि अब तबियत ठीक लगती है। पर,होना तो और था और हुआ भी !
हमारी उनकी जब बातें होती थीं ,वे अपने जीवन से पूर्ण संतुष्ट दिखते थे। लगातार और धारा -प्रवाह हिंदी या अंग्रेज़ी में बोलना उनकी ख़ास विशेषता थी। रहन-सहन में पूरे गाँधीवादी थे। हमेशा खादी का धोती-कुरता ही पहनते थे।
अब जब भौतिक रूप से वे हमारे बीच में नहीं हैं तब भी हमारी प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं और रहेंगे। जीवन को पूरी तरह और निचोड़कर जिया और पिया उनने,यही बात उन्हें औरों से अलग करती है। मैं जानता हूँ कि मेरे 'पंडिज्जी' की शुभकामनायें और उनका आशीर्वाद हमेशा मुझे प्रेरित करता रहेगा। अब मेरी आँखें गीली हो रही हैं,ईश्वर उन्हें अपने में मिला ले!

28 दिसंबर 2009

शर्माजी हमें छोड़ गए !


उनकी उम्र लगभग ६८ साल थी और वे मुझसे तकरीबन २५ साल बड़े थे फिर भी हम दुःख ,सुख के साथी थे। प्रेम नाथ शर्माजी का इंतकाल कल २७ दिसंबर को हुआ,पर आज अचानक मुझे तब पता चला जब मैंने उनसे बात करने की कोशिश की,पर फ़ोन स्विच ऑफ था,तो मैं उनके घर की तरफ मुड़ लिया और यह दुखद समाचार मिला।
मेरा उनका साथ ,क़रीब चार साल तक एक साथ काम करने के दौरान हुआ था,जो लगातार अब तक ज़ारी रहा। वे मिश्रित स्वभाव के व्यक्ति थे। कभी बिलकुल बिंदास और मजाकिया मूड में होते तो कभी मेरी बातों से तंग आ जाते। पुराना संगीत,मेहंदी हसन ,मुकेश,रफ़ी,पाकीज़ा,रज़िया सुल्तान और दिलीप कुमार उनके 'फेवरेट' थे। उर्दू और अंग्रेजी के अच्छे जानकार और साहित्य में गहरी रूचि वाले व्यक्ति थे।
हमारे साथ उनका अत्यंत निकट का प्रेम था। जब कभी वे घर या बाहर की परेशानियों में होते तो मुझसे बात करते या मेरे घर चले आते। उनसे मैं खुलकर बातें करता था और साथ में बैठकर 'कटिंग' की चाय भी पीता था।
उनके जाने पर उनके न होने का अहसास ज़्यादा हो रहा है। अब कौन मेरी फालतू की बकवास सुनेगा ,मुझे डाटेगा,दुलारेगा और साहित्यिक ज्ञान देगा ?
शर्माजी !तुमने यह ठीक नहीं किया। अपने साथी के बिना क्या करोगे ?

21 दिसंबर 2009

बात अपनों से !

हम २१ वीं सदी में लगातार अपने कदम बढ़ाते जा रहे हैं,पर हमारे नैतिक और शैक्षिक मूल्य निरन्तर पतन की ओर अग्रसर हो रहे हैं। आज समाज में कई कुरीतियों ने जन्म ले लिया है,जिसमें एक प्रमुख रूप से यह है कि हम अपना भौतिक विकास किसी भी कीमत पर करना चाहते हैं। शिक्षा के मंदिर भी इससे अछूते नहीं रहे! न वे गुरू रहे ना ही वे शिष्य। ऐसे अध्यापक थोड़ी संख्या में ही हैं जो अपने काम से न्याय नहीं कर पा रहे पर बदनाम पूरा कुनबा हो गया है। इसका फौरी नुकसान ये हुआ है कि अधिकतर बच्चे बिगड़ रहे हैं और गुरुओं के लिए उनमें मन में सम्मान कम हुआ है। बहुत सारे अन्य कारण हैं जिन्होंने वर्तमान शिक्षा -व्यवस्था को चौपट कर दिया है। समाज ,सरकार और शिक्षकों का मिलकर यह दायित्व है कि शिक्षा -व्यवस्था के गिरते स्तर को रोकें!

12 जनवरी 2009

मेरे पिताजी !

मेरे पिताजी जिन्हें मैं बचपन से ही भइया कहता आ रहा हूँ ,मेरे सामाजिक और नैतिक गुरू हैं। सब कहते हैं कि उनके चेहरे के मैं सबसे ज़्यादा नज़दीक हूँ। शायद यही वज़ह रही कि मैंने कई चीज़ें उन्हीं से आत्मसात की। उनका पूरा जीवन ग्रामीण परिवेश में ही बीता । वह अपने अध्यापकीय जीवन में आदर्श की तरह थे क्योंकि आस-पास के इलाके में उनकी मिसाल अभी भी दी जाती है। उनके पढ़ाए हुए लड़के उनको कभी भूल नहीं सकते हैं खासकर उन्होंने विशायकपुर{नीबी,रायबरेली } में जो काम किया उसे लोग अभी भी याद करते हैं ।
मेरे भइया पहले तो मेरे दादाजी पूज्य कन्हैयालाल त्रिवेदी के पास बम्बई में ही काम करना चाहते थे पर उनकी इच्छा थी कि भइया गाँव में ही रहकर खेती-पाती की देखभाल करें पर वे गाँव में तो रुक गए मगर टीचर्स -ट्रेनिंग उन्होंने ज़रूर कर ली।उनका पूरा नाम श्री कृष्ण कुमार त्रिवेदी है।
मुझे अपने बचपन की भरपूर याद है और यह कि भइया अनुशासन में बड़े सख्त थे. हम भाई-बहन जब भी कहीं बाहर जाते तो यह ताकीद दी जाती कि अगर किसी से झगड़ा किया तो उसी के आगे हमारी पिटाई की जायेगी। इस नुस्खे ने ऐसा काम किया कि हम लोग झगड़े-झंझट से दूर ही रहते। पढ़ाई के बारे में भी वे मेरा हमेशा ध्यान रखते और घर पर कोई काम करने को होता तो वह छोटे भाई से ही करने को करते क्योंकि उसका पढ़ने में मन नहीं लगता था। पूजा-पाठ और स्नान आदि में वे नियम के पूरे पक्के थे। उनके गुणों से ही मुझमें ईमानदारी और मानवीय गुण आ पाये जिनकी आज के समय में बड़ी ज़रूरत है। यह उनका ही असर रहा कि मैं हर प्रकार के दुर्गुणों से दूर हूँ।
मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ कि वह ऐसे माता-पिता सबको दे। भगवान् मेरे भइया और अम्मा को लंबा और निरोगी जीवन दे!


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3 जनवरी 2009

बचऊ पंडितजी !


आदरणीय पंडितजी मेरे प्रारंभिक गुरु रहे हैं। ९० वर्ष की अवस्था पार करके ये अभी भी तरोताज़ा दिखायी पड़ते हैं। शारीरिक चुस्ती का कारण रोज़ाना की ज़िन्दगी में हमेशा सक्रिय रहना है। अपने दिनों में पंडितजी अंग्रेज़ी भाषा के उच्च-स्तर के शिक्षक रहे जिसके लिए इन्हें 'राष्ट्रपति' पुरस्कार भी मिला था।इनका कार्यक्षेत्र जूनियर हाई स्कूल ,नीबी,रायबरेली था, ,जहाँ ये कई वर्षों तक प्रधानाचार्य रहे। रहन-सहन में सीधे-सादे और सच्चे गांधीवादी हैं। जीवन में इन्होंने हमेशा खादी का लकदक सफ़ेद कुरता और धोती पहनी तथा हिन्दी-साहित्य का भी गहन अध्ययन किया । आस-पास के इलाके में उनका बड़ा सम्मान है । हालाँकि इनका ताल्लुक एक बड़े खानदान से रहा है पर ये बिल्कुल सादगी की मूर्ति हैं। मैं इनको बचपन से ही अपना आदर्श मानता रहा हूँ क्योंकि ये हमारे पूज्य पिताजी श्री कृष्ण कुमार जी के भी गुरु रहे हैं।इनका वास्तविक नाम श्री शीतला शरण अग्निहोत्री है पर पूरे इलाके में इन्हें बचऊ पंडितजी के नाम से जाना जाता है।
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