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5 अगस्त 2013

सामयिक दोहे !

बादल झाँकें दूर से,टिलीलिली करि जाँय।
बरसें प्रीतम के नगर,हम प्यासे रह जाँय।।


माटी की सोंधी महक,हमें रही बौराय।
बदरा प्रियतम सा लगे,जाते तपन बुझाय।।

बारिश आखिर आ गई,भीगा सारा अंग।
चोली चिपकी बदन ते,रति के संग अनंग।।


सत्ता की कुर्सी मिले,रामलला की ओट।
राघव कारागार में,कैसे माँगें वोट।।


दाम टमाटर के बढ़े,आसमान की ओर।
भिंडी का मुँह ताकती, धनिया के मन चोर।।


फेंकू अपने घर गये,पप्पू देहरादून।
राजनीति की आपदा,चूसे सबका खून।।


छाती फटी पहाड़ की,धरती हुई अचेत।
बहती नदी ठहर गई,मुनिया फाँके रेत।।