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24 मई 2012

लोमड़ी के दिवस पूरे !

भले सूरत बदल  जाए ,
सूरज पश्चिम से उग आए,
मन की कुटिलता न  बदले
लोमड़ी भी सिहर जाए !

कोयले की आग  दहके,
शीतल-छाँव मत ढूँढो यहाँ,
जल जायेंगे चेहरे सभी
जो भूल से पहुँचे वहाँ !

जन्म उनका है निरर्थक
अभिशाप है यह भी हमारा,
जला कर ख़ाक कर देगा उन्हें,
 दहकता डाह का अंगारा !

तरस आता है हमें
हालत ये उनकी देखकर ,
टंकी चढ़ें,लोमड़ बनें 
उसूल अपने बेचकर !

लोमड़ी के दिवस पूरे 
अपने भी बेगाने हुए,
रात उनके साथ है 
दिवस खिसियाने हुए !