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5 सितंबर 2013

अंकल सैम का अमन !

हमले की सारी तैयारियाँ हो चुकी हैं,
रुक्के हाथ में आ गए हैं,
सबकी सहमति दर्ज़ कर ली गई है,
मित्र देशों ने गरदनें हिला दी हैं
बस ,
अब अंकल सैम का हाथ
मिसाइल की बटन दबाने को बेताब है,
फिर सीरिया में धमाके के साथ शांति
और सारे संसार में चुप्पी छा जाएगी,
इस तरह दुनिया खुशहाल हो जाएगी
  

9 अगस्त 2011

उनकी गिरती साख़ और हम !

इधर एक  नई मुसीबत आन पड़ी है ! सारी दुनिया के पालनहार और रखवाले सैम अंकल की साख़ को कुछ लोग गिरा हुआ बता रहे हैं,जबकि ऐसा नहीं है  और उधर से बक़ायदा इराक-युद्ध की तरह ऐलान भी ज़ारी कर दिया गया है कि कहीं कोई दिक्कत नहीं है.अब वे तो ठहरे हमारे प्रभु-देश,मगर भक्तों का क्या करें,बेचारे थोड़े में ही ढीले हो जाते हैं. भाई ,साख उनकी गिर रही है और दुबले हम हुए जा रहे हैं.

साख गिरने का असर कुछ ऐसा हुआ कि तीन दिन में ही दुनिया के बाज़ारों में कोहराम मच गया.जब  भगवान  की साख गिरेगी तो आंच उनके चेलों तक तो आएगी ही ! जब नफ़ा ऊपर से नीचे तक आता है तो नुकसान उलटी चाल क्यों चलेगा ? कई विशेषज्ञों ने हिसाब लगाकर बताया है कि इत्ते करोड़ का हो चुका है और बढ़ सकता है.

जिस एजेंसी ने साख़ गिराई है उसका नाम 'स्टैंडर्ड एंड पुअर'  है ,तो भाई वह कितनी बड़ी तोप है ? जिसकी साख़ को ईराक,अफगानिस्तान और पाकिस्तान मिलकर नहीं गिरा पाए तो मुई यह कागजी जोड़-घटा क्या ख़ाक गिरा पाएगी ?सामाजिक साख़ से आर्थिक साख़ बड़ी होती है क्या? जब वे उसे झेल गए तो ये तो दोयम दर्जे की है ! सुनते हैं कि 'मूडी' भी इसी राह पर चलने वाली है तो भाई,वह तो है ही 'मूडी' उसका क्या,जैसा मूड होगा वैसा कह देगी ! इन बातों से महाशक्ति का कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है.

यही लिए हमारी सरकार ने  कहा है कि हमें चिंता करने की ज़रुरत नय है.हम बिलकुल ज़मीनी तौर पर मज़बूत हैं,हम ज़मीन में ही पड़े हैं,इसलिए हम न कभी ऊपर थे और न गिरेंगे ! गिरने का ख़तरा तो उन्हीं को होता है जो आगे-आगे भागते हैं और ऊपर को उछलते हैं ! फिर वह कोई बरगद की शाख थोड़े है कि उसके गिरने से हम सब दब जायेंगे ! हम तो इसीलिए वह चीज़ रखते ही नहीं जिसके न होने का भय बना रहे !

फिलहाल ,हमें तो मुँह ढक के सो जाना चाहिए !



गिरती उनकी साख ,पर होते हम बेचैन,
हम बौराए-से फिरें,चौतरफ़ा दिन-रैन!

चौतरफ़ा दिन-रैन ,मुसीबत में अमरीका,
छींक अगर आ जाए तो हिस्सा हिले जमीं का!

साख बचाने उसकी ,अब हम सब दौड़ेंगे,
इस कोशिश में भी ,पाक से हम  पिछ्ड़ेंगे!

कह चंचल कविराय ,क्यों  करें  इतनी विनती,
साख हमारी नहीं इसलिए नहीं है गिरती !




23 जुलाई 2011

सैम अंकल ,इतना दबाव ठीक नहीं !


आप तो इस दुनिया के प्रभु-देश हो और अपने भक्तों के लिए आप यह क्या करने जा रहे हैं? आपकी विदेश मंत्री ने अपनी भारत-यात्रा पर हमारे देश का ज़बरदस्त समर्थन किया है! उन्होने हमारे हुक्मरानों को भरपूर आश्वस्त किया है कि वे कतई परेशान न हों,ख़ुद अमेरिका उनकी परेशानी को समझता है और इसलिए वह पाकिस्तान पर आतंकवाद के मुद्दे पर अपना दबाव और बढ़ाएगा!पर इसके उलट  मैं इतना ज़रूर आपसे कहूँगा कि  पाकिस्तान पर अपना दबाव न बढ़ाए नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि आपके  अधूरे काम में ही  बाधा पड़ जाए!

सैम अंकल! आपको अपने आर्थिक हितों के ही बारे में सोचना चाहिए .अगर ज़्यादा दबाव पड़ा तो फिर हथियारों की होड़ ख़त्म हो जाएगी, आपका पाला-पोसा बालक जवान होने से पहले ही निपट जाएगा. वैसे भी 'ओसामाजी' के जाने के बाद वहाँ के रहनुमा भारी सदमे में हैं.इस मौक़े पर यदि भारत के नाम पर उस पर दबाव पड़ा तो आपका 'क्रीड़ा-स्थल' तो पूरी तरह से चौपट हो जाएगा! यह अपील तो हम आपसे आम लोगों की तरफ़ से कर रहे हैं और रही बात हमारी सरकार की तो उसने कभी-भी आपको निराश नहीं किया है.पूर्व में जब भी कुछ हुआ है तो आपको फ़ोन कर या चिट्ठी लिखकर सूचित किया गया है. चाहे संसद पर हमला हो या मुम्बई पर ,हमारी हर सरकार ने आपके हितों की रक्षा की है.इसी परम्परा के निर्वहन हेतु हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप उन्हीं पर ड्रोन  का हमला करें ,जो सीधे आपकी संप्रभुता पर चोट करते हैं!

आशा है,हमारी इस अपील और आग्रह पर आप अमल करेंगे और ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जिससे बेचारे पाकिस्तान को अपना 'मूल-धर्म' त्यागना पड़े!


8 नवंबर 2010

ओबामा जी आए हैं !

ओबामा जी आए हैं,ओबामा जी आए हैं ,
हम सब उनको  ताक रहे हैं
हमरी  ख़ातिर  का लाए हैं ?

पर ऊ तो निकले बड़े शिकारी
आए करने हमको ख़ाली,
हमको तो झुनझुना दे दिया
सरका दी पड़ोस में थाली !

ओबामा जी आए हैं,ओबामा जी आए हैं !

उनके स्वागत में तो हमने
सारी 'लाल-दरी' बिछवा  दी,
बदले में कोरे वादे पाए,
ख़ुद कर ली अपनी बर्बादी !

कब तक मुँह ताकेंगे उनका
स्वाभिमान कब सीखेंगे ?
घिसट-घिसट कर चलना छोड़ें
तभी विश्व के साथ बढ़ेंगे !

ओबामा जी आए हैं,ओबामा जी आए हैं !

17 दिसंबर 2008

अमेरिका और पाकिस्तान का खेल !

छब्बीस नवम्बर दो हज़ार आठ का दिन भारत के लिए एक निर्णायक मोड़ की तरह रहा है। मुंबई में हमले हुए पर छलनी हर भारतीय का सीना हुआ। आतंकवादी हमले पहले भी बहुत हुए हैं पर यह तो दुश्मन का दुस्साहस था कि उसने शेर को उसकी मांद में आकर ललकारा है!हमला होने के बाद देश-विदेश से कड़ी प्रतिक्रियाएं आयीं खासकर भारत के नाभिकीय सहयोगी अमेरिका से कुछ ज़्यादा ही। कहा गया कि भारत को अपनी सुरक्षा करने का पूरा अधिकार है और इस काम में वो उसके साथ खड़ा है। अमेरिका ने इस बावत लगे हाथों चेतावनी भी जारी कर दी । यह तो था परदे के आगे का खेल जिसमें पाकिस्तान ने कुछ ना-नुकुर दिखाने के बाद नाकाफ़ी कार्रवाई की पर असली खेल तो परदे के पीछे चलने लगा जिसमें हिंदुस्तान को बरगलाने का काम किया जा रहा है। पहले मैडम राइस आती हैं हमारे ज़ख्मों को सहलाती हैं,पाकिस्तान की लानत-मलामत करती हैं और पाकिस्तान जाकर उनको भी अंदरूनी दिलासा देती हैं और आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई में उसका बखान करती हैं,इस तरह से अमेरिका हमारे मामले में हमारी मदद करता है और हम भी गदगद हो जाते हैं कि विश्व -बिरादरी हमारे साथ है। अरे भाई अपनी लड़ाई ख़ुद ही लड़नी पड़ेगी,अमेरिका या अन्य कोई देश क्योंकर अपनी टांग फँसाएगा?
याद आते हैं वे दिन जब अमेरिका की एक घुड़की के आगे पाकिस्तान ने अफगानिस्तान -मामले में उसकी जी-तोड़ मदद की थी, बाद में पत्रकार डानिएल क्रेग के हत्यारे को फांसी भी चढ़ा दी लेकिन यहाँ मसला भारत जैसे नरम-देश से है जो कोई पटाका भी फोड़ेगा तो अंकल सैम को चिट्ठी के ज़रिये सूचित करेगा। कहने का लब्बो-लुबाब यही है कि हमें युद्ध का डर दिखाकर कार्रवाई करने से रोका जाता है जबकि अपने लिए दूसरी दलीलें दी जाती हैं। कहते हैं ना कि 'समरथ को नहि दोष गुसाईं ' तो भाई यह अमेरिका और पाकिस्तान का खेल ऐसे ही चलता रहेगा और हम केवल हाथ मलते रह जायेंगे क्योंकि आतंकवादी तो दोनों ही हैं बस उनका तरीका अलग है!
chanchalbaiswari.blogspot.com


6 नवंबर 2008

ओबामा का अमेरिका

विश्व की महाशक्ति अमेरिका में नए सूरज का उदय हुआ है .बराक ओबामा के नए राष्ट्रपति चुने जाने को लेकर हालांकि सारी दुनिया उत्साहित है ,पर अविकसित और विकासशील देशों में अमेरिका से ज़्यादा उत्साह देखा जा रहा है .ओबामा का हर तबके की तरफ़ से स्वागत किया जा रहा है पर उनके बारे में बार -बार अश्वेत या काले कहना उनकी असली योग्यता को नकारना और काले लोगों में हीनभावना पैदा करना है.जहांतक दूसरे देशों से सम्बंधित नीति को लेकर बहुत आशावादी होने की बातें की जा रहीं हैं ,मैं समझता हूँ कि अमेरिका की बुनियादी नीतियों में अधिक परिवर्तन नहीं होने जा रहा है.तीसरी दुनिया और विकासशील देशों की अमेरिका से हर समय उनके लिए कल्याणकारी योजनाओं की दरकार होती है पर अतीत में यह कभी नहीं हुआ की अमेरिका अपने हितों की कीमत पर दूसरों की मदद को आगे आए .चूंकि सोवियत संघ के विखंडन के बाद दुनिया एकध्रुवीय हो गयी है इसलिए चाहे अनचाहे सभी देशों की निगाहें अमेरिका के ऊपर ही लगी रहती हैं .इसीलिये शायद ओबामा को काले या अश्वेत कहकर मीडिया उन देशों का ओबामा से गहरा जुडाव दर्शाने की कोशिश कर रहा है लेकिन उनके लिए यह पहचान न्यायसंगत नही है .अब जब वह इतनी ज़द्दोज़हद के बाद अगले अमेरिकी हुक्काम चुन लिए गए तो उनके लिए शुभकामनायें और यह उम्मीद कि जो जोश उन्होंने अभीतक दिखाया है उसे आगे भी बरक़रार रखेंगे.