पिछले कुछ दिनों से मेरा बेटा गाँव जाने को लेकर इतना उत्सुक है कि रोज़ सुबह उठकर बताता है कि इतने दिन बचे हैं ! अबकी दिवाली में उसे लेकर मैं गाँव जा रहा हूँ,ताकि वह त्यौहार का कुछ मतलब समझ सके.पिछली बार भी जाने का कार्यक्रम बनाया था पर आख़िरी मौक़े पर जाना न हो पाया.
बेटा आठ साल का है और दिवाली को उसने शहरी तौर पर ही जाना है.मुझे उसको वहां ले जाना ज़रूरी इसलिए लगा कि बचपन में जैसा मैं महसूस करता था,अब वैसा तो नहीं पर उस जैसा कुछ तो उसे दिखे और वह जान सके कि त्यौहार असल में होते क्या हैं ?
मुझे अपनी दिवाली बेतरह याद आती है.कुछ दिनों पहले से ही घर-बाहर की सफ़ाई का अभियान चलता था और इसे ठेके पर नहीं कराया जाता था बल्कि स्वयं परिवार के सभी सदस्य जुटते थे.घर-दुवार को पूरी तरह से चमकाया जाता था.आंगन,खमसार, दहलीज़ और चौपारि को गोबर से लीपा जाता और उस पर रंगोली बनती.दीवारों पर चूने से पोताई होती.कच्चे घरों में माटी का पोतना फेराया जाता.इस तरह दिवाली के आते-आते सबके घर बिलकुल दमकने लगते.
मैं ज्यादा पटाखे छुड़ाने का शौक़ीन तो नहीं रहा पर छोटा तमंचा और बिंदीवाली डिबिया के साथ दो-चार दिन पहले से ही शुरू हो जाता .तमंचे का प्रयोग तो काफी बाद में आया ,पहले तो ईंट के टुकड़े से ही दगने वाली 'टिकिया' पर वार करके मज़ा लिया जाता था.'दईमार' और 'मिर्ची' भी खूब प्रसिद्ध पटाखे थे.
दिवाली से एक दिन पहले नरक-चतुर्दशी को अम्मा सुबह-सुबह हम लोगों को जगातीं और नहाने के बाद लाइ,चंदिया,चिरइया(खिलौने) का भोग लगवातीं !कुम्हार दो दिन पहले ही दिए दे जाता था.उन्हें दिवाली की शाम को धुलकर तैयार किया जाता.सूर्यास्त होने के बाद अम्मा आंगन में पूजा-पाठ का इंतजाम करतीं,सारे दिए वहीँ रखे जाते,घी-तेल और बाती भी तैयार होती .जैसे ही,अँधेरा शुरू होता, दियों को अलग-अलग जगह ,घर के हर आले में .हर कोने में .छत की मुंडेर पर ,दरवाज़े पर करीने से धर दिया जाता.
इसके बाद असली धमाल शुरू होता.हम छोटे भाई के साथ हाथों में छुरछुरिया लेकर दुवारे(घर के बाहर खुला बड़ा स्थान) के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक दौड़ते और साथ में ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ लगाते,"आज दियाली,काल दियाली ,धरती माता ,जागो जागो "! उस समय हम परब के पूरे उफान पर होते और घर के बड़े-बूढ़े हमारी यह गुहार सुनकर आनंदित होते.इसके बाद तो पटाखे आधी रात तक छूटते रहते.अगले दिन सुबह हम भाई-बहनों में होड़ लगती कौन कितनी 'दियाली' पाता है ? हाँ, अम्मा एक विशेष तरीके से दिया जलातीं,जिसके बने हुए काजल को हम साल भर अपनी आँखों में रांजते !
सोचता हूँ ,जब बेटा गाँव की दिवाली को महसूसेगा तो उसे आँगन,आला,छत,मुंडेर आदि कैसे लगेंगे.शहरों में बंद कमरों में मनाई जाने वाली दिवाली उसके लिए गाँव में कितने धरती और आसमान के सपने दिखाएगी ?