जब भी देखता हूँ ,कोई सांवली-सी सूरत,
तुम्हारा ही अक्स ,उसमें नज़र आता है !
छुप-छुप के तुम्हें देखना ,यदि वाक़ई ज़ुर्म है,
तो ये गुनाह हमने ,कई बार किया है !
देखा जब भी आपको ,नज़रें झुकी मिलीं,
जाने खफ़ा हैं मुझसे ,या फिर अदा है आपकी !
गए तो आँधियों की तरह ,उजाड़कर मुझको !
तुमको न भुला पाया, क्यों नहीं अब तक,
मेरे पास न सही ,मेरे अहसास में तो हो !
विशेष : पहले के तीन शेर तकरीबन पचीस-बरस पुराने हैं और आखिरी के दो ताज़ा !
