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10 फ़रवरी 2012

यादें :नई पुरानी !


जब भी देखता हूँ ,कोई सांवली-सी सूरत,
तुम्हारा ही अक्स ,उसमें नज़र आता है !


छुप-छुप के तुम्हें देखना ,यदि  वाक़ई ज़ुर्म है,
तो ये गुनाह हमने ,कई बार किया है !


देखा जब भी आपको ,नज़रें झुकी मिलीं,
जाने खफ़ा हैं मुझसे ,या फिर अदा है आपकी !

 

वो आये तो इक खुशनुमा झोंके की तरह,
गए तो आँधियों की तरह ,उजाड़कर मुझको !


तुमको न भुला पाया, क्यों नहीं अब तक,
मेरे पास न सही ,मेरे अहसास में तो हो !






विशेष : पहले के तीन शेर  तकरीबन पचीस-बरस पुराने हैं और  आखिरी के दो ताज़ा !

25 जुलाई 2007

मुज़रिम

छुप छुप के तुम्हें देखना यदि ,वाकई  ज़ुर्म  है ,
तो ये गुनाह  हमने कई बार किया है !