घोर बादल प्रलय के छँटने लगे हैं,
वो फिर पुराने वायदे रटने लगे हैं।
मंच कोई भी नहीं वो छोड़ते हैं अब,
ख़ुद की कही हर बात से हटने लगे हैं।
पढ़ने-लिखने का कोई मौसम नहीं रहा,
धर्म माथे पर सजा, मैदान में डटने लगे हैं।
नायक नए तैयार होते जा रहे हैं रोज़,
इंसाफ़ और सच भीड़ में पिटने लगे हैं।
रहनुमाओं से हमें उम्मीद अब भी ख़ूब है,
झूठ के परचे हमारे हाथ से बँटने लगे हैं !
लूट जारी है मुसलसल देश भर में आपकी,
हे राम! यह सब देखकर आइने फटने लगे हैं !
— संतोष त्रिवेदी
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