घरवाली हमते समझदार,
पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !
वी घर का काम लेहेन मूँड़े
हम बाहर घूमि-घामि आई,
मोबाइल अउ कम्पूटर ते
जइसे हमारि भै होय सगाई !
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| लड़ते-झगड़ते हो गए बाइस बरस |
जब द्याखो बात सुनावैं चार
पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !
कपड़ा-लत्ता ,बरतन-चउका
खाना-पीना ,उनके जिम्मे,
ना कहीं घूमना,बाहर खाना
पूजा, बरत निभावैं रस्में !
हमही लरिकन के गुनहगार,
पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !
अब पूरे बाइस बरस बीते
वी झेलि रहीं हमरी संगति,
'सत्ती होइ गईंन तुम्हैं साथै'
हमरी घरवाली रोजु कहति !
हमहीं यहि घर के बंटाधार ,
