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14 मई 2012

पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !

घरवाली हमते समझदार,
पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !

वी घर का काम लेहेन  मूँड़े
हम बाहर घूमि-घामि आई,
मोबाइल अउ कम्पूटर ते 
जइसे हमारि भै होय सगाई !

लड़ते-झगड़ते हो गए बाइस बरस 
जब द्याखो बात सुनावैं चार 
पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !

कपड़ा-लत्ता ,बरतन-चउका 
खाना-पीना ,उनके जिम्मे,
ना कहीं घूमना,बाहर खाना
पूजा, बरत निभावैं रस्में !

हमही लरिकन के गुनहगार,
पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !

अब पूरे बाइस बरस बीते 
वी झेलि रहीं हमरी संगति,
'सत्ती होइ गईंन तुम्हैं साथै'
हमरी घरवाली रोजु कहति !

हमहीं यहि घर के बंटाधार ,
पढ़ि-लिखि के भकुआ बने यार !