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24 नवंबर 2013

बहुत कठिन समय है साहब !

बहुत कठिन समय है साहब,

पता नहीं कब,कौन पत्रकार तरुण
और ईमानदार केजरीवाल हो जाए,

सब कुछ दांव पर है,
पता नहीं कब कोई संत आसाराम
और राजनीति साहब हो जाए !

बहुत कठिन समय है साहब,
पता नहीं
कब कोई सामाजिक योद्धा
कार्पोरेट पत्रिका का संपादक
और कोई न्यायाधीश मुजरिम बन जाए !! 

बहुत कठिन समय है साहब ,
पता नहीं कब पहरेदार लुटेरा
और चोर चौकीदार हो जाए !!

26 अप्रैल 2013

बदलता मौसम !



दिल्ली का मौसम बदला है।
आदम से शैतान भला है।।
 

तुमने अपना तीर चलाया।
अब तक कितनी बार छला है।
 


खुले-आम घूमते शिकारी।
अपनों से हारी अबला है।।
 


ये मौसम भी बदलेगा ।
घटा घिरी है,पवन चला है।।


 
जाने सब कुछ,फ़िर भी नादाँ
कच्ची उमर ,जुर्म पहला है ।।

 
हम कुछ समझ नहीं पाते
नए ज़माने का मसला है ।।

 
तू उसकी बातों पर मत जा
मछरी ताके ,वो बगुला है ।।

 
छोर आसमां का छू लेंगे
उड़ने को अब दिल मचला है ।।

 
धीरे-धीरे तिमिर छटेगा

कल का दिवस सुनहला है ।।

 




25 जनवरी 2013

ईश्वर कमज़ोर हो गया है ?


बड़ा आसान हो गया  है 
ईश्वर को अपराधी ठहराना  
अपनी उंगली उधर उठा देना 
ईश्वर बड़ा निरीह हो गया है आज 
वह प्रतिकार नहीं करता है 
उसके पास न किराये की पुलिस है 
और न आंसू गैस के गोले 
हम बड़ी सहजता से अपना गुस्सा 
अपने प्रवचन 
अपनी शिकायतें 
उसकी ओर उछाल देते हैं
वह जवाब तक नहीं देता 
चुपचाप सुनता और सहता है 
ईश्वर कमजोर हो गया है 
या हमें सहने के लिए 
हमें सुनने को 
कोई और नहीं बचा ?

23 जनवरी 2013

सावधान रहने का समय है !

सेनाएँ तैयार हैं
बदले हुए सेनापतियों के साथ
तलवारों में लगी जंग
बड़ी तेजी से गायब हो रही है
हाथों में उस्तरे हैं धार वाले
और
अस्तबल से पुराने घोड़े निकल पड़े हैं.

नए नारे बड़े पोस्टरों में
चस्पा हो गए हर जगह ,
वादों की लंबी  फेहरिश्त
और कुर्बानियों के स्मारक-आलेख  पढ़े जा रहे हैं
आम अवाम के लिए
मखमली गद्दों के नीचे
फांसी के तख्त तैयारशुद हैं
उनके काफ़िले बस्ती में घुस चुके हैं.

यह सावधान रहने का समय है
मौसम में अचानक
धुंध और कोहरा पसर चुका है
बादलों की गरज तेज है
अपने छाते साथ रखिये
ज़हर की बारिश का इमकान है !

16 जनवरी 2013

तुम और हम !

तुमसे जितनी बार मिला हूँ,
नए रूप से यार, हिला हूँ !(१)

भरे सरोवर मुरझाया-सा ,
छोटे नद औ नार खिला हूँ !(२)
 

बीच समंदर डूबा-उतरा ,
लिए नाव-पतवार मिला हूँ !(३)

गम के घूँट न लगते कड़वे,
चोटों को हर बार सिला हूँ !(४)

तेरे सभी पैंतरे अच्छे,
नहीं हुआ हुशियार,भला हूँ ! (५)
 

14 जनवरी 2013

बदलाव !


लोगों ने कहा

कपडे बदल लो

मैंने रंगरेज बदल लिया

लोगों ने कहा

चेहरे को सजा लो

मैंने आइना बदल लिया

लोगों ने कहा

धारा के साथ बहो

मैं पत्थर बन गया

लोगों ने कहा

तुम चुप रहो

मैं अगुआ बन गया

लोगों ने कहा

तुम गलत हो

मैं और मज़बूत हो गया

लोगों ने कहा

तुम कापुरुष हो

मैंने सबक सिखा दिया

लोगों ने कहा

वे नीति-निर्धारक हैं

खुद का मखौल बना लिया

7 जनवरी 2013

दामिनी का अपनों के नाम सन्देश !



मेरे प्यारे भाई बहनों

मैं यहाँ आकर भी जीवित हूँ,जैसी मेरी इच्छा थी ।अब आप लोग भी अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त हो गए होंगे।मैं आप सबको अपने प्रति बे-इन्तहा प्यार दिखाने के लिए आभार व्यक्त करती हूँ।गाँव से आई एक अकेली लड़की को पूरी दुनिया और देश का जो प्यार मिला, वह हमारे जीने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है।मेरे मन में अब किसी के प्रति कोई विद्वेष या घृणा-भाव नहीं है।मेरे नश्वर शरीर का मरना यदि किसी मरते हुए समाज को जिंदा करने में सहायक है तो,ऐसी मौत के लिए मुझे फख्र है।जिन्होंने मेरे शरीर को नोचा-खसोटा,उनके लिए भी मेरे मन में सहानुभूति है।वे जब तक जियेंगे,हर पल मरेंगे ।हर क्षण वो मेरी आँखों की चमक महसूस करेंगे।वे मुझे भूल न सकें इसके लिए मैं सूरज की हर किरण,हवा की हर दस्तक के साथ,उनके आस-पास ही रहूँगी,झकझोरती रहूँगी ।

मुझे उन सबके परिवारों की भी बड़ी चिंता है।उन सबकी माँ-बहन-बेटियाँ कैसे दूसरों से नज़रें मिलाती होंगी ? मैं जानती हूँ कि अभी हमारी बहनों के आँखों में इतना पानी तो बचा होगा कि उसे वे उन अपनों पर उलीच सकें,जिनके आँखों की कोरें बिलकुल सूख चुकी हैं।मुझे अपने माँ-बाप के अलावा आप सबसे आंसुओं का इतना सैलाब मिला है कि मुझे नई ज़िंदगी मिल गई है।इसलिए आप सब मेरे न रहने का शोक न मनाएं वरन अब सोते-से जग जाएँ।मेरे अकेले के जीने से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है कि मेरी बाकी बहनें चैन से रहें।शारीरिक रूप से तो मैं एक बार ही मरी हूँ,पर मैं चाहती हूँ कि उन्हें रोज़-रोज़ मानसिक तौर पर न मरना पड़े।

मेरे साथ जो हुआ,इसकी मुझे कोई शिकायत नहीं है।इसी बहाने कई बातें साफ़ हो गईं।जिस व्यवस्था में रहते हुए हम डरते रहे,मरते रहे,वह स्वयं डरी हुई और बड़ी कमज़ोर निकली।आप लोगों ने जिस व्यवस्था को बनाये रखकर उससे अपनी रक्षा का भ्रम पाल लिया था,वह चूर-चूर हो गया।मैंने देखा कि मुझसे हमदर्दी जताने आए लोगों पर यही व्यवस्था कहर बनकर टूट पड़ी।इसके लिए उसके भंडार-गृह से आँसू गैस के गोले और लाठियाँ तुरंत बाहर निकल आईं,जबकि आतताइयों के लिए इसी व्यवस्था को महीनों,सालों सोचना पड़ता है।मेरे साथ जो हुआ ,उसके प्रतिकार को तो यह सरकार तत्पर नहीं दिखी,पर हाँ,मेरी ओर आने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए गए।आप सबने दिखा दिया कि डरी हुई व्यवस्था एक जागे हुए समाज को कभी डरा नहीं सकती।

मैं तो एक प्रतीक मात्र थी।मुझे तो इस भौतिक शरीर को एक न एक दिन त्यागना ही था,पर इस व्यवस्था के द्वारा मेरा कत्ल किया जाना बहुत कुछ उघाड़ गया है।उस दिन किसी दामिनी के साथ नहीं,इस व्यवस्था के साथ बलात्कार हुआ था और लगातार हो रहा है।मैं गौरवान्वित हूँ कि इस बात को सबके सामने लाने का जरिया मैं बनी।कुछ लोग यह कह रहे हैं कि दामिनी मर गई है पर सच्चाई तो यह है कि उस दिन पूरे समाज की मौत हुई थी,जिसे एक कांधा भी नसीब नहीं हुआ।दामिनी न तो पहले डरी और न बाद में।हाँ,मैंने लाठी-गोलियों से लैस इस व्यवस्था को थर-थर काँपते ज़रूर देखा है।मुझे आप सबके निश्छल प्रेम पर पूरा भरोसा है और यह भी कि इस मरे हुए समाज में प्राण फूंकने का काम आप लोग ही कर सकते हैं।अब जब भी किसी बहन-बेटी के साथ कुछ गलत होता दिखे तो मुझे याद कर लेना ।यह दामिनी हमेशा आपके दिलों में यूँ ही धधकती और समाज को झिंझोड़ती रहेगी ।


हमारी ओर से ....

वह ज्योति थी
अँधेरे से इसलिए लड़ती रही
आखिर तक ज्वाल बन जलती रही,
वह है सभी ज़िन्दा शरीरों में
और हैवानों को जला देगी,
राख उसकी हड्डियों की
नरपिशाचों को गला देगी !


23 दिसंबर 2012

चलो दिल्ली !


 
 
चलो दिल्ली ,चलो जनपथ, जहाँ हुक्काम बहरे हैं
हवाओं में,फिजाओं में ,जहाँ संगीन पहरे हैं.
चलाओ गोलियाँ ! छलनी हमारी छातियाँ हो जांय ,
ये आतिश बुझ नहीं सकती, हमारे ज़ख्म गहरे हैं.

तुम्हारे चैन की अब, आखिरी शब आ गई  ,
हमारा आज बिगड़ा है ,मगर सपने सुनहरे हैं.

बढ़े क़दमों ! नहीं रुकना ,बदल जायेगा मौसम ये,
नया सूरज उघाड़ेगा ,अँधेरे में जो चेहरे हैं.

 

21 दिसंबर 2012

हम मनुष्य हैं अभी !


शुक्र है अभी
कच्चा नहीं निगलते हम मानव-शरीर
मसलते हैं मांसल देह
खरोंचते हैं नाखूनों से
चबाते नहीं हड्डियाँ
पीते नहीं रक्त
भागकर छुप जाते हैं,
इस पहचान से
हम
मनुष्य हैं अभी  !
प्रलय का दिन
निश्चित नहीं है
हम उसे लाते हैं मन-मुताबिक
परमात्मा से नहीं डरते
हमसे  काँपती है मानवता
अपने पंजे फैला लिए हैं हमने ,
शुक्र है अभी
खुला आसमान बचा है
धरती भी नहीं फटी
सूरज चुआ नहीं अपने केन्द्र से
और भूमि-अभिलेखों में
हम मनुष्य हैं अभी !


देवेन्द्र पाण्डेय जी की कविता से प्रेरित होकर

19 दिसंबर 2012

अराजकता का जिम्मेदार कौन ?


 
जब से दिल्ली में चलती बस में बलात्कार की वारदात हुई है,संसद से लेकर सड़क पर खूब उबाल दिख रहा है। सड़क पर तो आम आदमी इस तरह के वाकयों के बार-बार होने से परेशान होकर निकल पड़ा और संसद में हमारे प्रतिनिधि तार्किक चिंताएं दिखाने में पीछे नहीं रहे। सड़क पर महिलाओं का गुस्सा क्षोभ,अपमान और व्यवस्था की निष्क्रियता से सातवें आसमान पर था। आम महिला की इस चिंता को समझना बिलकुल कठिन नहीं है। संसद के अंदर बैठे हुए हमारे कई प्रतिनिधि इसकी जघन्य भर्त्सना कर चुके हैं। कोई अपराधियों को फाँसी की सजा से कम पर मानने को तैयार नहीं तो कोई पुलिस-आयुक्त को हटाने पर आमादा है तो कोई इस बेबसी पर आँसू बहा रहा है । आखिर,ये जन-प्रतिनिधि किससे यह सब माँग कर रहे हैं जबकि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस व्यवस्था के यही लोग जिम्मेदार और गुनाहगार हैं !

बलात्कार जैसी घटनाएँ सीधे-सीधे कानून-व्यवस्था का मामला हैं। हमारे समाज में जब तक यह धारणा नहीं मज़बूत होगी कि किसी भी दुष्कृत्य के लिए अभियुक्त को जल्द और निश्चित रूप से उसके परिणाम भुगतने होंगे,तब तक ऐसी घटनाओं पर पचास बार फाँसी देने या गोली मार देने की सज़ा का प्रावधान महज़ कागजी ही रहेगा। आज यह धारणा पुख्ता हो चुकी है कि कोई  ,कहीं भी किसी महिला को छेड़ दे,उसे ज़बरिया उठा ले और यहाँ तक कि हवस पूरी करके मार भी दे तो कोर्ट-कचहरी में कुछ नहीं होना है। अव्वल तो कई मामले थाने या न्यायालय तक आते ही नहीं और यदि आए भी तो उनमें से अधिकांश सबूतों के अभाव में न्याय की दहलीज पर ही दम तोड़ देते हैं। इसलिए कई बार इन मामलों की शिकायत भी नहीं की जाती।

संसद में कई महिला-प्रतिनिधियों की चिंताएं सच्ची जान पड़ती हैं पर आखिर में कानून-व्यवस्था को लागू करना-करवाना आम जनता की जिम्मेदारी तो नहीं है। कानून अभी भी इतने कमज़ोर नहीं हैं पर मुख्य बात इन्हें लागू करने की है। जब हमारी राजनीतिक-व्यवस्था भ्रष्टाचार और अपने-अपने सत्तारोहण पर जुटी हुई हो,ऐसे में नौकरशाही या पुलिस-प्रशासन क्यों पीछे रहे ?हमारे प्रतिनिधि इस तरह की घटनाओं की सीधी जिम्मेदारी पुलिस-प्रशासन पर डालकर निश्चिन्त हो जाते हैं पर क्या सबसे बड़े जिम्मेदार वे स्वयं नहीं हैं?सरकार गरीबों को कैश-सब्सिडी का झुनझुना पकड़ाकर आत्म-मुग्ध हो रही है और उसकी लुटती हुई आबरू की कोई कीमत नहीं है.यह आम जनता के साथ मजाक नहीं तो क्या है ?हास्यास्पद तो यह है कि कानून-व्यवस्था तहस-नहस होने पर सरकार और हमारे प्रतिनिधि ही चिंताएं भी ज़ाहिर कर देते हैं. आखिर जनता ने सत्ता की लगाम जिनको सौंपी है तो किसी भी प्रकार की अराजकता  होने पर वे पल्ला कैसे झाड़ सकते हैं ?

आज पूरे देश में कानून का कोई खौफ नहीं है। जिसको जो मन में आ रहा है,कर रहा है। संसद में हमला करके,हत्याएं-बलात्कार करके,सरे-आम उगाही करके भी अगर कोई सुरक्षित रह सकता है तो ऐसे जंगलराज में कोई क्यों डरे ?हम पूरी तरह से अराजक-राज में रह रहे हैं। अब ज़रूरत केवल कानून के राज को स्थापित करने की है,संसद में भाषणबाज़ी करने की नहीं। ऐसा न हो पाने पर वहाँ फफक-फफककर रोना महज़ घडियाली आँसू बहाने से ज़्यादा कुछ नहीं है।

13 अगस्त 2012

आलोचनाएं अपने गले में डाल लो !

तुम्हारी
रोज़-रोज़ की चिक-चिक से
मैं तंग आ चुका हूँ,
मेरे कान
पक गए हैं
तुम्हारी उल-जलूल बातें सुन-सुनकर .
हमने तुम्हें
आज़ादी क्या दे दी बोलने की
तुमने
आसमान ही सिर पर उठा लिया.
मुझे अपनी चाल से
आगे बढ़ना ही अच्छा लगता है.
मैं बढ़ता हूँ समगति से,
पैरों से कुचलते हुए तिनकों को,
मंजिल की तरफ |

तुम्हारी आलोचनाएं
अब ऊब पैदा करती हैं
मुझे कचोटती नहीं |
सबके साथ
एक-सा व्यवहार करूँ,
मैं समदर्शी भी नहीं |
मुझे दिखता है केवल
मेरा सपना
और सुनाई देती है
अपनों की आवाज़ ,
हर दिन,हर रात
सुनती हैं विरुदावालियाँ |

क्या करूँ,
मेरे दर्पण में
मेरा ही चेहरा दिखता है
मैंने उसे अपनी जेब में ले रखा है
ताकि और कोई उसमें
कभी अपनी सूरत न पहचान ले
खुद से ज़्यादा ,
हमें जान ले !

तुम्हारे सपनों से
मुझे कोई नहीं वास्ता,
उन्हें मुल्तवी रखो
आखिरी साँस तक |
आलोचनाओं को
पिरोकर डाल लो अपने गले में
मैंने हार की मालाएं
पहननी छोड़ दी हैं !

9 अगस्त 2012

कुछ छुट्टा अहसास !

१)
हर हाथ को काम,
हर हाथ है वोट ,
मोबाइल थमा के
लेंगे बटोर नोट,
लाइसेंसी लूट-खसोट !

२)
हमें हर खेल में
मात मिली है,
राजनीति और ओलम्पिक में
सत्ता ने चाल चली है,
आगे अंधी गली है !


३)
एक चाँद था
जो था फ़िदा
फिज़ा के अंदाज़ पर,
मावस की रात आई
चाँद छुप गया कहीं
फिज़ा बदहवास थी
चाँदनी-सी बिछ गई
पुरुष की बिसात पर !!

18 जुलाई 2012

भूले अपना देश !

सावन झाँके  दूर से,बेबस है इंसान  ।
कब तक सोखेगी धरा, धूप हुई हलकान ।।


पढ़-लिख काया  बदल ली,बदले नहीं विचार ।
कौआ  कोयल-भेष में,करता शिष्टाचार ।।


शब्द अर्थ को खो रहे,भटक रहे हैं छंद।
लिखते कुछ,होते अलग,ब्लॉगर-लेखक-वृन्द ।।


तुलसी इस संसार में ,वही बड़ा विद्वान।
खड़ी फ़सल  में आग दे,बोए  निज अभिमान ।।


लिपा-पुता चेहरा दिखे,भोला-सा इन्सान ।
जेबों में मक्कारियाँ ,कर देती हैरान ।।


सूरत धोखा दे रही,संबंधों में खोट ।
रिश्तों में चालाकियाँ ,देती गहरी चोट ।।


पाहुन सावन की तरह,भूले अपना देश ।
मेघ-डाकिया बाँटता ,नित झूठे सन्देश ।।

12 जून 2012

आदमी की औकात !


औरत के दिल को पढ़ना भले मुश्किल हो गया हो, आदमी की औकात को पढ़ना हमेशा से आसान काम रहा  है।यहाँ बात केवल आदमी की औकात की होगी । हम आदमी को देखते-समझते हैं तो उसकी वेशभूषा से पर यही काम औरत के मामले में उसकी सूरत देखकर किया जाता है,जिसमें अक्सर हम मात खा जाते हैं।आदमी की शक्ल या सूरत या तो देखने-समझने लायक होती ही नहीं या हम उसको बिलकुल नज़र-अंदाज़ करते हैं।

थोड़ा पहले तक आदमी की औकात को समझने और जानने का सही माध्यम जूता रहा है |हमारे बुज़ुर्ग भी कहते आये हैं कि कि आदमी की औकात उसके जूते से जानी जाती है।पहले जूता देखकर ही अगले के बारे में यह अनुमान लग जाता था कि वह कितना कुलीन है या उसके जूते में कितना दम है ? भाई लोग अपने जूते की ठसक से समाज को खुले-आम बता देते थे कि अगर उनका जूता चल गया तो भलेमानुसों की सेहत ख़राब हो जाएगी।मगर यह सब बातें काफी-पुरानी हो चली हैं और जूते की कुलीनता की पहचान अब मोबाइल ने ले ली है।

सीधी-सी बात है,अब वही आदमी स्मार्ट  और रुतबेवाला है जिसके पास तगड़ा स्मार्टफोन हो । हम अब जूते पर नज़र नहीं रखते।किसी को देखते ही हमारी निगाह उसके आधुनिक फोन पर जाती है।अगला भी उचक-उचककर अपना फ़ोन दिखाने की फ़िराक में होता है,यदि उसके पास महंगा वाला है ! अगर उसके पास दो-इंची ,बिना टच वाला ,घटिया कैमरा वाला मोबाइल हुआ तो फट से उसकी पहचान एक चिरकुट-टाइप आदमी की हो जाती है। यदि उसके पास चार-इंची फावड़े-सी स्क्रीन वाला,टच और बढ़िया कैमरे का मोबाइल हुआ तो वह तुरत ही एलीट-क्लास का लगने लगता हैं,भले ही उसने दसवीं कक्षा घिसट-घिसटकर पास करी हो !

फोन जितना ज्यादा महंगा दिखता है,आदमी की कीमत और इज्ज़त उतनी ही ज्यादा होती है।आजकल औकात नापने का सबसे आसान तरीका मोबाइल है | इसके लिए कुछ पूछने की नहीं बस दिखने की ज़रूरत है | कुछ अंदाज़ यूँ लगते हैं;यदि किसी के पास ब्लैकबेरी फोन है तो वह किसी कंपनी में एक्जीक्यूटिव हैं और एप्पल का फोन है तो किसी रईसजादे या नेता की औलाद ।किसी और कंपनी के महंगे फोन से सामने वाला यह ज़रूर अंदाज़ लगा लेता है कि यह कोई आम आदमी नहीं ,बहुत पढ़ा-लिखा है।उससे पुलिस वाले तमीज से बात करते हैं और ऑटो-टैक्सी वाले जमकर किराया मांगते हैं । इस बीच कार वालों की रेटिंग लगातार गिर रही थी,जबसे हर ऐरे-गैरे ने ईएमआई पर गाड़ी लेनी शुरू कर दी थी | सो उस स्तर पर क्षति-पूर्ति की जा रही है।पेट्रोल के दाम बढ़ाकर उन कार-धारकों की औकात को भी अपग्रेड किया जा रहा है।अगर पेट्रोल का दाम  पांच सौ रूपये प्रति लिटर हो जाए तो वह दिन दूर नहीं जब गाड़ीवाला भी ठसक से कह सकेगा कि उसके पास पेट्रोल की गाड़ी है !

फ़िलहाल,बाज़ार में आदमी की औकात मोबाइल से हो रही है।इसलिए कम्पनियाँ जानबूझकर चालीस-पचास हज़ार के फोन ला रही हैं,ताकि इनके धारकों की रेटिंग न गिरे! वे चाहती भी नहीं कि इन फोन को चिरकुट-टाइप के लोग खरीदें | इससे कंपनी और कुलीन लोगों की इज्ज़त मिट्टी में मिल जाने की पूरी आशंका है !इसलिए यदि आप अपनी चिरकुटई से निजात पाना चाहते हैं या समाज में अपनी औकात दिखाना चाहते हैं तो आज ही फोन बदल लें,आपकी पूछ बढ़ जाएगी और समाज में रुतबा भी।

26 मई 2012

ईमानदारी अब डराती है !

ईमानदारी
अब कीमत चुकाती है ,
बीच सड़क पर
क़त्ल होती है वह
व्यवस्था आँख मूँद कर चली जाती है !

ईमानदारी
अब सबको डराती है,
दिन के उजाले में भी
स्याह*अँधेरा लाती
सूरज की रोशनी  शर्माकर चली जाती है !

ईमानदारी
अब कहर ढाती है,
भरे-पूरे परिवार को
जड़ से तबाह कर
सांत्वना दिलाकर चली जाती है !

ईमानदारी
सपने नहीं दिखाती है ,
किताबों में रहकर
पन्ने-पन्ने नुचकर
नारों (नालों) में बहकर चली जाती है !


....इतना होते हुए भी वह
ईमानदारी को बचाये हुए है,
भौतिकता को छोड़कर
केवल अपनी आत्मा के साथ
गठबंधन निभाए हुए है !!




विशेष: बंगलौर में शहीद हुए ईमानदार अधिकारी महंतेश को समर्पित !

17 मई 2012

लेखक या ब्लॉगर होने के नाते !

 

अकसर ऐसा क्यों होता है कि हम समाज या मौज-मजे के लिए लिखते-लिखते व्यक्तिगत आक्षेपों या तुच्छ बहसों में आकर उलझ जाते हैं ? यह ऐसी संक्रामक बीमारी है कि हम इससे अछूते नहीं रह सकते।चाहे बड़े लेखक हुए हों,कवि या आज के ब्लॉगर ,सभी कभी न कभी इस अवस्था से दो-चार होते हैं।कुछ लोग ज़रूर थोड़े सयाने दिखते हैं जो इन बातों को नज़र-अंदाज़ करके निकल जाते हैं पर इससे पूर्णकालिक समाधान नहीं मिलता।

हम अगर इस भागमभाग ज़िन्दगी में थोड़ी देर आराम से सोचें कि हम क्यों और क्या लिखते हैं तो शायद कहीं ज़्यादा सार्थक बातें बाहर आएँगी और इस का उत्तर भी । ऐसा नहीं है कि हमारे लिखने भर से समाज या देश में क्रांति आ जायेगी पर  अगर इस लिखने से कहीं कुछ हलचल होती है,बहस शुरू होती है या खालिस मनोरंजन ही होता है तो भी संतोष की बात है।दिक्कत तब होती है ,जब आपके लेखन को नकारात्मक दिशा में मोड़ने का प्रयास होता है और आप इस जाल में फंसकर वही करने लग जाते हैं जो दूसरों का उद्देश्य होता है।

सबसे ज़रूरी बात लिखने के लिए यही है कि खुले मन से ,बिना किसी दुराग्रह के ,यदि हम कुछ लिख रहे हैं तो समाज और देश के लिए तो अच्छा होगा ही,हमें भी सुकून देगा । हम अपने अजेंडे पर ही कायम रहें और सार्थक व स्वस्थ लेखन करते रहें तो ही हमारा लिखना सही मायने में लिखना होगा।लिखने का मतलब केवल पन्ने और जगह भरने से व अपने बने रहने के लिए बिलकुल नहीं होना चाहिए। अगर लिखने वाले होकर भी इतनी-सी बात समझ में न आ पाए तो काहे के लेखक ?

यहाँ मैं इस बात पर ज़रूर ज़ोर देना चाहूँगा कि गंभीर-लेखन में बनावट या दोहरेपन से बचे रहना ज़रूरी है।हम लिखें तो खूब आदर्श, मानवता और संवेदना की बातें मगर असल ज़िन्दगी में हम इनसे कोसों दूर हों,तो फिर हम किसके लिए लिखते हैं ?यदि हम अपनी कही बातों को खुद अमल में नहीं ला पाते तो उसका असर भी नगण्य होगा और हम हँसी के पात्र होंगे ।हमारी लिखने और पढ़ने की योग्यता हमारे मुँह और कलम से निकले शब्दों से ध्वनित हो जाती है।एकबारगी मुँह से भले ही हम भूलवश कुछ अन्यथा निकाल दें पर लिखे हुए का अभिलेख होता है और इसमें हल्कापन बिलकुल उचित नहीं ।

लेखक या ब्लॉगर इसी समाज का हिस्सा हैं।हमारे बीच में विचारों को लेकर तो टकराहट होनी चाहिए पर यह टकराहट किसी के व्यक्तित्व को चोट पहुंचाए बिना ही हो।बड़े लेखक और कवियों के भी आपस में मनमुटाव होते रहे हैं पर वे इसे सद्भाव और आपसी संबंधों के खराब होने की हद तक  नहीं ले गए । अगर हम समाज को दिशा देने वाले बनते हैं तो समाज को वास्तव में अपने बड़प्पन से कुछ दें,न कि झूठे अहंकार में डूबे रहें।यह जिम्मेदारी लेखक या ब्लॉगर होने के नाते हम पर ज़्यादा है क्योंकि यही वर्ग उपदेशक भी अधिक है । कभी लिखने से मौका मिले तो इस विषय पर भी सोचें ।

 

11 मई 2012

बदलती रूचियाँ और दोस्त !


बचपन से लेकर अब तक कितनी रूचियाँ बनीं,कितनी बदल गईं,पता ही नहीं लग पाया ! खेलने से लेकर पढ़ने और चाहने तक,लिखने और देखने तक में  निरंतर बदलाव आते रहे.जो खास बात और बदलाव हुआ वह दोस्तों के संग बातचीत का रहा.ऐसा नहीं कि इस बीच हम पुराने दोस्तों को भूल गए पर हाँ ,जब जो रूचि हावी हुई उसी के मुतल्लिक,समान रूचि के लोगों से खूब बतकही हुई.

जब हम गाँव में पढ़ने जाते थे,स्कूल के साथी और घर के आस-पास के कुछ दोस्त रहे, जिनसे मेरी बातें,मुलाकातें होती रहीं.यह सिलसिला कक्षाओं के बढ़ने के साथ-साथ बढ़ता और बदलता गया.इस बदलाव और  समय की कसौटी पर कुछेक लोग ही बचे और याद रहे,जिनसे ज़्यादा घनिष्ठता रही,खुलापन रहा !इनमें से कइयों से बरसों से न बात हुई न मुलाकात हुई,फिर भी गाहे-बगाहे उनकी याद आती रहती है.निश्चित ही मैं भी उन्हें बहुत याद आता होऊंगा,अपने स्वभाव के कारण ! फोन की इतनी सुविधा पहले नहीं थी,फिर फेसबुक या अन्य जरिया तो दूर की बात है.उन दोस्तों में कुछ ही से मुलाक़ात बाद में हुई जिनके फोन नंबर मुझे मिल पाए.अब इतना सारा समय बीत चुका है इसलिए पुराने दोस्तों से बात करें भी तो क्या और कितनी बार ? 

लगभग बीस साल से अपने खूंटे से अलग होकर दिल्ली में जमा हूँ.बीच-बीच में गाँव हो आता हूँ,पर दोस्त शायद ही मिल पाते हैं.यहाँ आये हुए भी काफ़ी अरसा हो चुका है,बहुत लोगों से मेल-मुलाक़ात हुई.काफ़ी सारे विभागीय मित्र बने पर वही बात कि उन सबमें हमारी रुचियों के समकक्ष कितने रहे या मैं उनमें से कितनों के  खांचे में फिट हो पाया ? इन बीस बरसों में भी दोस्तों की प्रासंगिकता बदलती रही,चाहते न चाहते हुए भी.कई बार स्थान परिवर्तन होते ही जो दोस्ती अटूट और एकनिष्ठ दिखती थी,औपचारिकता में बदल गई,मिलना-मिलाना कम हो गया !दो-तीन दोस्त ज़रूर ऐसे हैं जो शुरू से लेकर आजतक संपर्क में हैं,पर उनसे भी कभी-कभार ही बात हो पाती है.

गाँव से यहाँ आने और महानगरीय जीवन शैली में फंसने के कारण अपने खास रिश्तेदारों से भी नियमित बात नहीं हो पाती है.पिछले दो साल से जब से ब्लॉगिंग में रमा हुआ हूँ,तब से वास्तविक दुनिया के मित्रों से संपर्क कट-सा गया है.इस आभासी दुनिया में कई लोग बहुत नजदीक महसूस होते हैं ,उनसे लगभग रोज़ ही बात हो जाती है,कुछ लोगों से कभी-कभी.दर-असल यहाँ भी शुरू में हमने कई लोगों से संपर्क करने और फिर बात करने की मुहिम चलाई पर जिन्हें ज़्यादा पसंद नहीं रहा होगा,उनसे बातचीत कम होती गई या धीरे-धीरे छूट गई.यह मामला एकतरफा होता भी तो नहीं.हम यह कतई चाहते भी नहीं कि अगला हमारी बातों से बोर हो.हम जिससे बात करने में असहज महसूस करें,उससे आखिर कब तक बतियायेंगे ?हमारे विभाग में एक साहित्यिक मित्र रहे,जिनसे शेरो-शायरी पर खूब चर्चा होती,दुर्भाग्य से वे नहीं रहे,ऐसे में कई बार उनकी कमी खलती है !

फिलहाल,हमारी रूचि ब्लॉगिंग और कुछ-कुछ फेसबुक या ट्विटर में रमी हुई है.इसी दुनिया के दोस्तों से खूब बातें होती हैं,विमर्श होता है.मेरी सुप्त पड़ी रचना-शक्ति जागृत हुई है,कविताई परवान चढ़ रही है.पर ऐसा ही बना रहेगा,ज़रूरी नहीं है.कई बार ताने-उलाहने मिल चुके हैं इस नशीली दोस्ती के लिए पर दिल वही तो करना चाहेगा जिसमें  उसका खून बढ़ता हो ! आखिर रूचियाँ बदलने में हमारा कोई ज़ोर है क्या ? पढ़ना-लिखना और खूब बातें करना हमें सुकून देता है,अवसाद और अकेलापन भी नहीं आने देता !



23 अप्रैल 2012

बने रहना कठिन है !

दिन-ब-दिन बदलते जा रहे हैं हम ,
आदमी पैदा हुए थे ,पर बने रहना कठिन है !(१)

सीख लीं मक्कारियाँ,खादी पहन हम ने,
रहनुमा तो बन गए ,पर बने रहना कठिन है !(२)

अब समंदर में लहर से चौंक जाता हूँ,
पतवार तो है हाथ में ,पर बने रहना कठिन है !(३)

तेज़  भागी जा रही रफ़्तार से ये ज़िन्दगी,
चली थी संग  सफ़र में, पर बने रहना कठिन है !(४)

दरख़्त जंगल के पुराने हो चले हैं,
नए-से कुछ उगे हैं,पर बने रहना कठिन है !(५)

गीत,दोहे,छंद सब तो बन चुके,
लेखनी तलवार है , पर बने रहना कठिन है !(६)

10 अप्रैल 2012

विचार जो रिश्तेदारी निभाते हैं !

अभी तक हम अनजान थे इस बात से
कि विचार के कई रंग होते हैं,
वह आँखों में चश्मा पहनता है, 
उसे किसी पर दया आती है
प्यार और संकोच होता है.
विचार अब रिश्तेदारी निभाता है,
उसे लिंग और स्वत्व की पहचान होती है !
विचार गोल-मोल होता है,
छलयुक्त भी होता है विचार,
महाभारत काल से लेकर आज तक 
विचार इधर-उधर देखता है,
गोटियाँ चलाता है,
विचार अब होता नहीं,
उसको संस्कारित और परिष्कृत किया जाता है.
अमूमन मौलिक नहीं,
अनूदित होता है विचार .
वह संकल्प नहीं 
विकल्प बन जाता है,
सामने वाले को देखकर 
मौन होता है,डर जाता है !
विचार अब खेमों में बंटते हैं,
मौका मिलते ही 
आपस में निपटते है !
पर क्या इस विचार को
हम विकलांग नहीं कहेंगे ?
शब्दों की आँड़ लेकर 
उन्हें उधार के अर्थ देंगे ?
अगर तुम्हें शब्दों से खेलना है,
विचार को डंडी मारकर तौलना है,
लोक-लाज के डर से आत्मा को मारना है,
तो हे शब्द-चोर !
तुम इधर मत आना 
क्योंकि यहाँ विचार बनते-बिगड़ते नहीं,
विचार बिकते,पलटते नहीं !
विचार होते हैं
सूरज की रोशनी की तरह,
मंदिर की प्रार्थना की तरह,
धरती की क्षमा की तरह,
जल और आग के गुणों की तरह ! 


2 अप्रैल 2012

तोता और कौवा !

नीले आसमान में 
उड़ते हुए तोते को 
कौवे ने टोंका,
तुम इस तरह आसमान में
अतिक्रमण नहीं कर सकते,
उड़ नहीं सकते !
तुम तभी तक महफूज़ हो
जब तलक उस पिंजरे में,
अपने दायरे में महदूद हो !
खुले आसमान और 
धरती के आँचल में 
अगर तुमने हरकत की ज़रा-सी,
तो वो छोटी कटोरी,
आम की फाँके
और कच्ची शफ़ड़ी भी
भूल जाओगे,
यहीं हमारे सामने 
केवल छटपटाओगे ! 
इसलिए अपना हिस्सा लो
मौके को समझो 
और उड़ो मत !
बाहर का मौसम 
सिर्फ़ मेरे मुफ़ीद है,
तुम्हारे लिए हमारा 
ख़ास इंतजाम  है,
हम चुने हुए हैं 
इसलिए बेख़ौफ़ चुनते हैं,
तू घोंसले में रह 
वही तेरा मक़ाम है !