कभी प्यारे रहे महफूज़ ,
पहले मैं यह बता दूँ कि कम ही लोग ऐसे हैं जिन्हें मैंने फेसबुक के ज़रिये उनकी ब्लॉगिंग को जाना और उनमें तुम भी शामिल रहे हो.हमारी बातें भी गाहे-बगाहे होती रही हैं और तुम्हीं से यह भी जाना कि कई लोग तुमसे बेवजह जलते हैं.बहरहाल कई लोगों के नज़रिए को दरकिनार करते हुए मैंने तुमसे राब्ता कायम रखा और तुम्हें अपनी नज़रों से जानना चाहा.मैं कल अविनाश वाचस्पति जैसे वरिष्ठ ब्लॉगर के बारे में तुम्हारी शाब्दिक हिंसा से अन्दर तक हिल गया हूँ.जिस तरह की ललकारनुमा शैली तुमने ईजाद की है ,क्या वह स्वस्थ-लेखन की किसी श्रेणी या खाँचे में फिट हो सकती है ? किसी भी जायज या नाजायज तर्क के चलते कोई भी किसी की आलोचना का अधिकार रखता है,पर भाई उसके लिए शब्द-कोश की कमी नहीं है.यदि इससे इतर कोई भी किसी के जीते जी उसके मरने-मारने की कसमें खाता है ,खुले-आम धमकाता है,अपने मसल्स की मसल्सल नुमाइश करता है तो कौन-से तर्क से यह सभ्य-समाज की परंपरा का द्योतक कहा जाएगा?
मैं अब इस बात की पृष्ठभूमि में भी थोडा जाऊँगा ,जिसकी बिना पर तुमने यह गुस्ताखी की है.जिस कविता को लेकर इतना बावेला मचा,उसे मैंने भी देखा था और ज़रूरी नहीं कि कुछ लोगों की धारणाओं के अनुसार हर कोई उसकी प्रशंसा ही करे.कवयित्री ने जानबूझकर उसे 'बोल्ड' विषय बताया था सो कुछ बोल्ड कमेन्ट आने की भी आशंका तो थी ही.यदि वह कविता निरा कविताई अंदाज़ और उद्देश्यों को लेकर लिखी गई होती तो उसका शीर्षक ही कुछ और होता.'बोल्ड' कहकर कवयित्री लोगों को आकर्षित करने का साहस तो दिखाती हैं पर फिर आलोचनात्मक टीपों को भी अश्लीलता की आंड़ में हटा देती हैं.
निश्चित ही, अलबेला जी की टीप बहुत आपत्तिजनक रही,जिसका विरोध मुझ सहित कई लोगों ने वहाँ भी दर्ज किया.इसमें अविनाशजी की साधारण आपत्ति को निशाना बनाकर उनपर ही हमले शुरू हो गए.वे इतने बड़े और छपने वाले ब्लॉगर हैं कि इस तरह के ओछे हथकंडों की उन्हें ज़रुरत नहीं है.तुमसे उनकी खुन्नस यही रही कि उन्हीं कवयित्री की तुमसे सम्बंधित एक पोस्ट रही,जिस पर अविनाशजी ने कुछ सवाल उठाये थे.उसमें कहा गया था कि जर्मनी के किसी विश्वविद्यालय में तुम्हारी कविता पढाई जाएगी.अविनाशजी ने यही खता कर दी कि इस तरह की ख़बरों की प्रमाणिकता की माँग कर दी,तिस पर वो कवयित्री सारा साज-सामान सहित लापता हो गईं .क्या ऐसा सवाल उठाना भी गैर-ज़रूरी था?यदि बात में तथ्य होता तो क्यों सारे भाग खड़े हुए ? अब तुम्हारी इस गोलीबारी और हिंसक शैली को देखकर पता नहीं जर्मनी वाले अपने समाज और देश को किस तरह की प्रेरणा देना चाहेंगे?
महफूज़,अविनाशजी में हो सकता है कुछ कमियाँ हों,पर ऐसी मारधाड़ और स्टंट वाली भाषा का प्रयोग उन्होंने नहीं किया है.एक व्यंग्यकार होने के नाते कई बार वह वक्र बोलते या लिखते हैं तो उसी शैली में जवाब दिया जा सकता है,पर तुमने अपना पूरा गोला-बारूद निकाल लिया और लड़ाई का मोर्चा खोल दिया.इसे किस तरह की ब्लॉगिंग कहेंगे ? जिस विषय पर उन कवयित्री ने अपनी कलम चलाई है,मजाल है कोई पुरुष ऐसा लिख लेता.कई अनामिकाएँ वहीँ पर स्यापा पढने लगतीं.ऐसे लोग खुद तो अपने कमेन्ट-बॉक्स पर ताला लगा लेते हैं और दूसरों को गरिया आते हैं.इस मामले में यहाँ तक कि अलबेला जी ने भी सभी टीपों को सम्मान दिया.खुद कवयित्री को अविनाशजी की आपत्ति असहनीय लगती है पर तुम्हारी हर गाली उनके लिए प्रेमगीत !
यह पत्र लिखना ज़रूरी था और उतना ही यह बताना भी कि ऐसी हिंसक भाषा और गैर-तमीज़ का मुजाहिरा करके तुमने सिद्ध कर दिया है कि अब हीलियम का पाँच सौ वाट का तुम्हारा बल्ब फ्यूज़ हो चुका है.तुम अब एक गैर ज़रूरी दोस्त,इन्सान और ब्लॉगर हो गए हो !
गालियों और गोलियों की बौछार के लिए तैयार,
तुम्हारा रहा कभी !
बहुत दुखी होकर तुमसे मुखातिब हूँ.जब से अविनाश वाचस्पति जी के बारे में तुम्हारी पोस्ट पढ़ी है,तुम्हारे प्रति मेरा नज़रिया बिलकुल बदल गया है.ऐसा नहीं है कि इससे भी तुम्हें या तुम्हारी सेहत पर रत्ती भर भी फर्क पड़ने वाला है,पर यह मेरी एक ब्लॉगर के नाते जिम्मेदारी है कि इस लिखने-लिखाने के मैदान को पहलवानों का अखाडा न बनने दिया जाये.कुछ शालीन और शांति-प्रिय लोगों की तरह या फिर तुमसे दोस्ती के चलते मैं भी मौन धारण कर सकता था,पर फिर केवल एक कागजी-ब्लॉगर भर बना रह जाता.
पहले मैं यह बता दूँ कि कम ही लोग ऐसे हैं जिन्हें मैंने फेसबुक के ज़रिये उनकी ब्लॉगिंग को जाना और उनमें तुम भी शामिल रहे हो.हमारी बातें भी गाहे-बगाहे होती रही हैं और तुम्हीं से यह भी जाना कि कई लोग तुमसे बेवजह जलते हैं.बहरहाल कई लोगों के नज़रिए को दरकिनार करते हुए मैंने तुमसे राब्ता कायम रखा और तुम्हें अपनी नज़रों से जानना चाहा.मैं कल अविनाश वाचस्पति जैसे वरिष्ठ ब्लॉगर के बारे में तुम्हारी शाब्दिक हिंसा से अन्दर तक हिल गया हूँ.जिस तरह की ललकारनुमा शैली तुमने ईजाद की है ,क्या वह स्वस्थ-लेखन की किसी श्रेणी या खाँचे में फिट हो सकती है ? किसी भी जायज या नाजायज तर्क के चलते कोई भी किसी की आलोचना का अधिकार रखता है,पर भाई उसके लिए शब्द-कोश की कमी नहीं है.यदि इससे इतर कोई भी किसी के जीते जी उसके मरने-मारने की कसमें खाता है ,खुले-आम धमकाता है,अपने मसल्स की मसल्सल नुमाइश करता है तो कौन-से तर्क से यह सभ्य-समाज की परंपरा का द्योतक कहा जाएगा?
मैं अब इस बात की पृष्ठभूमि में भी थोडा जाऊँगा ,जिसकी बिना पर तुमने यह गुस्ताखी की है.जिस कविता को लेकर इतना बावेला मचा,उसे मैंने भी देखा था और ज़रूरी नहीं कि कुछ लोगों की धारणाओं के अनुसार हर कोई उसकी प्रशंसा ही करे.कवयित्री ने जानबूझकर उसे 'बोल्ड' विषय बताया था सो कुछ बोल्ड कमेन्ट आने की भी आशंका तो थी ही.यदि वह कविता निरा कविताई अंदाज़ और उद्देश्यों को लेकर लिखी गई होती तो उसका शीर्षक ही कुछ और होता.'बोल्ड' कहकर कवयित्री लोगों को आकर्षित करने का साहस तो दिखाती हैं पर फिर आलोचनात्मक टीपों को भी अश्लीलता की आंड़ में हटा देती हैं.
निश्चित ही, अलबेला जी की टीप बहुत आपत्तिजनक रही,जिसका विरोध मुझ सहित कई लोगों ने वहाँ भी दर्ज किया.इसमें अविनाशजी की साधारण आपत्ति को निशाना बनाकर उनपर ही हमले शुरू हो गए.वे इतने बड़े और छपने वाले ब्लॉगर हैं कि इस तरह के ओछे हथकंडों की उन्हें ज़रुरत नहीं है.तुमसे उनकी खुन्नस यही रही कि उन्हीं कवयित्री की तुमसे सम्बंधित एक पोस्ट रही,जिस पर अविनाशजी ने कुछ सवाल उठाये थे.उसमें कहा गया था कि जर्मनी के किसी विश्वविद्यालय में तुम्हारी कविता पढाई जाएगी.अविनाशजी ने यही खता कर दी कि इस तरह की ख़बरों की प्रमाणिकता की माँग कर दी,तिस पर वो कवयित्री सारा साज-सामान सहित लापता हो गईं .क्या ऐसा सवाल उठाना भी गैर-ज़रूरी था?यदि बात में तथ्य होता तो क्यों सारे भाग खड़े हुए ? अब तुम्हारी इस गोलीबारी और हिंसक शैली को देखकर पता नहीं जर्मनी वाले अपने समाज और देश को किस तरह की प्रेरणा देना चाहेंगे?
महफूज़,अविनाशजी में हो सकता है कुछ कमियाँ हों,पर ऐसी मारधाड़ और स्टंट वाली भाषा का प्रयोग उन्होंने नहीं किया है.एक व्यंग्यकार होने के नाते कई बार वह वक्र बोलते या लिखते हैं तो उसी शैली में जवाब दिया जा सकता है,पर तुमने अपना पूरा गोला-बारूद निकाल लिया और लड़ाई का मोर्चा खोल दिया.इसे किस तरह की ब्लॉगिंग कहेंगे ? जिस विषय पर उन कवयित्री ने अपनी कलम चलाई है,मजाल है कोई पुरुष ऐसा लिख लेता.कई अनामिकाएँ वहीँ पर स्यापा पढने लगतीं.ऐसे लोग खुद तो अपने कमेन्ट-बॉक्स पर ताला लगा लेते हैं और दूसरों को गरिया आते हैं.इस मामले में यहाँ तक कि अलबेला जी ने भी सभी टीपों को सम्मान दिया.खुद कवयित्री को अविनाशजी की आपत्ति असहनीय लगती है पर तुम्हारी हर गाली उनके लिए प्रेमगीत !
यह पत्र लिखना ज़रूरी था और उतना ही यह बताना भी कि ऐसी हिंसक भाषा और गैर-तमीज़ का मुजाहिरा करके तुमने सिद्ध कर दिया है कि अब हीलियम का पाँच सौ वाट का तुम्हारा बल्ब फ्यूज़ हो चुका है.तुम अब एक गैर ज़रूरी दोस्त,इन्सान और ब्लॉगर हो गए हो !
गालियों और गोलियों की बौछार के लिए तैयार,
तुम्हारा रहा कभी !