मेरे जीवन की प्रथम-किरण,
मेरे अंतर की कविता हो,
हृदय अंध में डूब रहा ,
प्रज्ज्वलित करो तुम सविता हो !
मम भाग्य-विधाता तुम्हीं हो,
तुम बिन जीवन है पूर्ण नहीं,
मेरे अंतर-उद्गारों को ,
साथी ! करना तुम चूर्ण नहीं !
प्रेरणा तुम्हीं हो कविता की,
मेरे मानस की अमर-ज्योति,
सत्यता तुम्हारे सम्मुख है,
नहीं तनिक भी अतिशयोक्ति !
मेरे जीवन की डोर तुम्हीं,
अपने से अलग नहीं करना,
प्यार तुम्हीं से केवल है,
अंतर्मन में मुझको रखना !!
पहली बार प्रकाशित :२२/१०/२०१०
विशेष :पहला गीत,रचना-काल-१०/०६/१९८७
स्थान-फतेहपुर(उ.प्र.)
रीपोस्रिपोस्ट