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21 जनवरी 2013

एक अत्याधुनिक राम-कथा !

भगवान राम आज कुछ प्रसन्न-मुद्रा में दिखाई दे रहे थे।सीता जी ने उनकी इस प्रसन्नता का कारण पूछा ,'प्रभु ! आज आपकी मुख-मुद्रा अलग सन्देश दे रही है,क्या बात है ?' राम बोले ,'देवि,आज नारद मुनि मिले थे और कह रहे थे कि हम जब से धरती-लोक से आये हैं,काफी बदलाव हो गया है।मुझे अरसे से यह बात याद आ रही थी पर स्वर्ग के काम-काज से फुरसत ही नहीं मिल रही थी।यदि आपकी इच्छा हो तो अपनी कर्मभूमि के दर्शन फिर से कर आयें !'सीता ने बिना देरी किए ही झट-से हाँ कर दी और फ़िर उन दोनों ने मानव-रूप में धरती में प्रवेश किया।


संयोग से वे दोनों जहाँ उतरे ,वह पंचवटी का इलाका था।जिस स्थान पर कभी वे पर्णकुटी में रहे थे,उस जगह अब आलीशान महल था।राम और सीता उस महल से आकृष्ट हुए बिना नहीं रह सके।सहसा उन्हें अत्याधुनिक वेशभूषा में एक स्त्री दिखाई दी।राम और सीता उसको देखते ही रह गए।वे दोनों कुछ बोल पाते कि उस स्त्री ने जोर से आवाज़ दी,'पहचाना मुझे ? मैं सूपनखा हूँ।'राम विस्मित होते हुए बोले,' सूपनखा !तुम यहाँ '? लक्ष्मण ने तो तुम्हारी नाक काट दी थी ,पर तुम तो बिलकुल ठीक-ठाक और सम्पूर्ण हो !'सूपनखा ने उत्तर दिया,'आप किस युग की बात कर रहे हैं ?यह आपका त्रेता नहीं है।इस युग में हमारी नाक कटने का कोई जोखिम नहीं है,अब तो स्लट-वॉक का ज़माना है ।यह नाक-वाक से स्त्री को भयभीत करना दरअसल आप की चाल थी जो अब कामयाब नहीं होगी।'इतना सुनकर तो राम सन्नाटे में आ गए,पर सीता से न रहा गया।उन्होंने कहा,'सूपनखा !तुम मत भूलो कि तुमने केवल कपड़े बदले हैं,आचरण अभी भी तुम्हारा वही है।तुम इस तरह मेरे स्वामी का अपमान नहीं कर सकती हो ।'तब तक राम ने अपने को सँभाल लिया था।उन्होंने कहा,'सीते ! इन्हें कहने दो क्योंकि कभी हमारे द्वारा इनको कष्ट पहुँचा था।’



राम ने शांत होकर सूपनखा से अगला सवाल किया,'अच्छा यह बताओ,तुम यहाँ किसके साथ रह रही हो? मेरे द्वारा विवाह-प्रस्ताव ठुकराने के बाद तुम्हें कोई मिला ?'सूपनखा तमककर बोली,'क्या समझते हो ? यह आपका समय नहीं है।मैं तब से कई युगों तक भटकती रही।अंतत इस कलियुग में आकर मुझे राहत मिली है ।यहाँ विवाह जैसा बंधन ज़रूरी नहीं है।हम दोनों 'लिवइन रिलेशन ' को मान्यता देते हैं।कोई किसी को पूजता नहीं है।हम जीवन भर एक-दूसरे को ढोने को अभिशप्त भी नहीं हैं।अब मैं फेसबुक पर चैटिंग करती हूँ और मेरा पार्टनर किचन में सब्जियाँ पकाता है।हम पूरी तरह आजाद हैं।मैं तो सीता से भी कहूँगी कि वह अपने साथ किये गए दमन को नहीं भूले और हमारे साथ आ जाये'.




सीता ने उसकी किसी बात पर ध्यान नहीं दिया और राम से कहा,'प्रभु ! यहाँ से जल्दी चलो,मेरा दम घुट रहा है।' राम और सीता आगे बढ़ने को तैयार ही थे कि अचानक उन्हें ताड़का नज़र आई।उनके पीछे-पीछे खर-दूषण भी आ गए।उन लोगों ने आते ही सूपनखा से सवालों की बौछार कर दी,'बहन ! ये तपस्वी इतने दिनों बाद यहाँ कैसे ? सूपनखा ने कहा,'ये हमें देखने आये थे कि हमारा सर्वनाश हो गया कि नहीं।मैं तो सीता को लेकर दुखी हूँ कि यह इनके चंगुल से कैसे छूटे ?'अब उत्तर देने की बारी सीता की थी।उन्होंने ज़रा कड़ककर कहा,'सब लोग इस तरह हमें घेरकर क्यों खड़े हो गए हैं ? मैं अपने स्वामी के साथ बहुत खुश हूँ।मुझे त्रेता में भी उनमें कोई बुराई नज़र नहीं आई थी । मैं एक राजा के परिवार में ब्याह कर आई थी,उस समय इनके साथ वनवास जाने का निर्णय मेरा था। मैं कागजी रिश्तों में विश्वास नहीं करती ।ऐसे समय में मेरे पति ने मेरा साथ दिया और मैं जंगल में इनके साथ रही।अगर मुझे इनसे कोई शिकायत होगी भी तो हमारे रिश्तों में इतनी गर्मी बची है कि आपस में बातकर समझा जा सकता है ।और हाँ,ताड़का व खर-दूषण !तुम सब यहाँ कैसे आ गए ?किसने बुलाया तुम्हें ?' उत्तर सूपनखा ने दिया, 'ताड़का को मैंने ईमेल किया था और खर-दूषण को हमारे फेसबुक-स्टेटस से पता चला।’




अब तक चुप रहे राम बोल उठे,'सीते !तुम इनसे बहस न करो.आओ यहाँ से चलते हैं।'खर-दूषण ने तड़ से जवाब दिया,'हाँ ,इसी में भलाई भी है अब आपके पास न तो दैवीय शक्ति है और न ही वानर-सेना।हमने अगर एक भी स्टेटस और लगाया तो हमारे सभी सदस्य सक्रिय हो उठेंगे।'राम ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए वहाँ से चले जाना ही उचित समझा।सूपनखा ,ताड़का और खर-दूषण ने पहली बार राम को हरा दिया था।




राम और सीता अभी कुछ ही दूर पहुँचे थे कि एक कुटिया देखकर रुक गए।वहां एक बुढ़िया चारपाई पर बैठी दाल-चावल में पड़े कंकड़ बीन रही थी।राम को देखते ही पहचान गई और उठकर बोली,'प्रभु ! इतने दिनों बाद आपको पाकर धन्य हो गई। आपने मेरे जूठे बेर खाकर बहुत पहले मुझे कृतार्थ किया था।'राम इस जंगल में अचानक शबरी को पाकर प्रफुल्लित हो गए और गले लगा लिया।सीता भी शबरी से मिलकर बहुत खुश हुईं।शबरी ने कहा,'अभी मैंने खिचड़ी पकाई है,यदि आप बुरा न मानें...' ,राम ने बात बीच में ही काटकर कहा,'हम दोनों खाकर ही जायेंगे।'




खिचड़ी खाकर जैसे ही राम जाने को तैयार हुए,एक बुजुर्ग उनके पैरों पर गिर पड़े।शबरी ने बताया ,'प्रभु ! ये तुलसी हैं।इन्होंने आप पर कथा लिखकर बड़ा कष्ट भोगा है।कई लोग इनकी जान के पीछे पड़े हैं,सो मैंने इन्हें शरण दे रखी है।‘राम ने तुलसी को उठाकर गले से लगाया और कहा,'अब आप नए सिरे से राम-कथा लिखें।पिछली कथा अब इस युग में प्रासंगिक नहीं रह गई है।'तुलसी ने भाव-विह्वल होते हुए उत्तर दिया ,'भगवन ! मैंने जो भी लिखा था,भक्तिभाव से लिखा था।मुझे क्या पता था कि कालांतर में लोग मानस में भी जाति ,धर्म और लिंग का चश्मा लगाकर देखेंगे।अब मैं कोई कथा नहीं लिख सकूँगा।'



इसके बाद राम और सीता ने धरती पर ठहरना उचित नहीं समझा और बिना अतिरिक्त क्षण गँवाए वे दोनों स्वर्गलोक लौट गए !
















व्यंग्य यात्रा के अक्टूबर-दिसम्बर २०१२ के अंक में प्रकशित

5 सितंबर 2012

गुरु,चेला और गुरुघंटाल !

आज शिक्षक-दिवस की गहमा-गहमी है .शिक्षक जी मगन हो रहे हैं.कम से कम तीन सौ पैंसठ दिन में एक दिन ऐसा है जब उन्हें किसी अनहोनी की आशंका नहीं है.घर और बाहर उन्हें 'फूल' नहीं समझा जायेगा बल्कि कुछेक चेले उनको ही ज़बरिया फूल दे देंगे,भले ही वे कागज में बने हों.

आज गुरूजी को सबसे बड़ी तसल्ली है कि उन्हें कक्षा में अपने सर्वशक्तिमान छात्रों से मुठभेड़ नहीं करनी पड़ेगी.आज के दिन बच्चे ही कक्षाओं में पढ़ाते है.वैसे गुरूजी को अंदर की बात पता है कि वे कौन-सा पूरे साल पढ़ाते हैं.बच्चे ही कक्षाओं को अपने नियंत्रण में रखते हैं.वे तो बस बच-बचाकर कक्षा से निकल आते हैं.बच्चों में यह गज़ब का आत्मविश्वास बताता है कि हमारी शिक्षा-प्रणाली अभूतपूर्व रूप से विकसित हो गई है.
गुरूजी को इस बात का दुःख ज़रूर रहेगा कि वे आज बच्चों को खाना-पीना,नकदी,वर्दी,पुस्तकें आदि मुफ़्त बांटने वाले अहम कार्यों से वंचित रहेंगे.रही बात जनगणना और वोटर-लिस्ट बनाने जैसे महत्वपूर्ण कार्य तो सरकार जी बाद में पूरा करा ही लेंगी.

कुछ नमकहलाल शिक्षकों को आज सरकार जी की ओर से सम्मानित भी किया जाता है.इस अवसर पर उन्हें अपनी सेवाओं को लेकर घनी आत्म-संतुष्टि होती है.बाकी शिक्षकों के कुढने से उनका यह सुख और बढ़ जाता है.

इस अहम मौके पर ऐसे बड़े गुरुओं को हम सादर नमन करते हैं जिन्होंने हज़ार ख़तरे सहकर हमें इत्ता खतरनाक बनाया.साथ ही हम पढ़ाई  के इतर गुरुघंटालों को साष्टांग दंडवत करते हैं जिनकी कृपा के बिना हम अपना अस्तित्व नहीं बचाए रख सकते हैं. गुरूजी से ज़्यादा अहमियत गुरुघंटालों की है क्योंकि यदि गुरूजी नाराज़ हो जांय तो पैर छूकर उनका विष  उतारा जा सकता है पर गुरुघंटाल की नाराज़गी हमें जाति-बिरादरी से बाहर कर सकती है.वे चाह लें तो हमारी चाकरी भी छीन लें और हमें टंकी पर चढ़ने को मजबूर कर दें .गुरूजी खुश होंगे तो ज़्यादा से ज़्यादा कोरा आशीर्वाद देंगे मगर गुरुघंटाल यदि प्रसन्न हो जांय तो घर में मेडल रखने की जगह नहीं मिलेगी.इसलिए इनकी महिमा सबसे बड़ी है.

इसलिए गुरु जी आज सबसे ज़्यादा प्रसन्न हैं.उनके चेले भी प्रसन्न हैं कि वे ही असली गुरु हैं.गुरुघंटाल यह सब देखकर प्रसन्न हैं क्योंकि साल के सब दिन उनके हैं !

29 अगस्त 2012

परिकल्पना से उनका कलपना !

वे बड़ी बेसब्री से किसी गंभीर खबर की प्रतीक्षा में थे. हर जगह टटोल और टोह रहे थे,पर कुछ ऐसा जो उन्हें चाहिए था,दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था. इस बहु-प्रतीक्षित मौके को वे अपने हाथ से यूँ ही जाया नहीं होने देना चाहते थे इसलिए वे अपनी ही फैक्ट्री की बनी लंबी टॉर्च लेकर हर अखबार ,उसके हर कॉलम और खबर पर उन्होंने दनादन्न बत्ती देना शुरू किया.कहीं किसी कोने में उन्हें अटका,मटका या खटका हुआ चेहरा नज़र आ जाये तो उनका जनम सुफल हो जाता पर धत तेरे की,अखबार वाले भी नालायक निकले.उन्होंने पहले से ही वैज्ञानिक-प्रतिभासंपन्न  और खिलखिलाते चेहरों को और गेट-अप दे दिया था.उनकी ख्वाहिश दम तोड़ती नज़र आई तो उन्होंने अपनी पुरानी खुरपेंची टॉर्च की लाइट सोशल-साइट पर भी मारी,पर वहाँ भी कई नासपीटे उन्हें अपने-अपने सम्मान का ढोल पीटते, ज़श्न मनाते नज़र आए.बस ,यहीं से उनका हाजमा खराब हो गया और तबीयत बिगड़ने लगी.

वे थोड़ी देर तक बरामदे में टहलते रहे,कभी अंदर,कभी बाहर घूमें भी पर दिल में बड़ा-सा पत्थर गड़ रहा था इसलिए ज़्यादा देर और दूर तक नहीं जा पाए .आखिर इसी दिन के इंतज़ार में उन्होंने सालों-साल कलम घिसने में नहीं लगाये थे.पहले ही जब उस नामुराद परिकल्पना की कल्पना और रूपरेखा का सृजन हो रहा था,तभी उसकी भ्रूण-हत्या करने की उन्होंने अपनी तरफ से जमकर कोशिश की थी,पर कुछ बलिष्ठ,वरिष्ठ और जमे-जमाए महंतों की वज़ह से उनकी इस महत्वकांक्षी योजना को पलीता लग गया था,पर वे ठहरे चिरकालीय विघ्न-संतोषी,अपने अंतिम अस्त्र चिरकुटई को बाहर निकाला,थोड़ा रगड़ा और की-बोर्ड पर गिटिर-पिटिर करने में जुट गए.वे अपना ज़हर बाहर करने पर उतारू हो चुके थे.

उनके कम्प्यूटर के टंकण-स्थल अचानक लहलहा उठे.मानों बरसों पुरानी प्यास पूरी हो रही हो.वे बार-बार बीच में अपने मुस्तैद संवाददाताओं को फोनिया भी रहे थे.उन्हें लग रहा था कि ज़रूर कहीं से भीषण आगजनी और गोलाबारी की खबर देर-सबेर आएगी.एक समर्पित कार्यकर्त्ता ने किसी रिमोट-स्थान से एक खबर का फैक्स उन्हें भेजा जिसमें लम्पटों की बढ़ती तादाद पर चिंता जताई गई थी.वैसे तो यह खबर उनके लिए सुकून देने वाली होती पर वे सुदूर की सोचने लगे.अगर ऐसा ही चलता रहा तो फ़िर उनकी सर्वमान्यता पर भी खतरा पैदा हो जायेगा.वे बीच में कवितायेँ बांचने लगे.इससे उनको अपने सरोकार को थुनाही (छप्पर साधने वाला जुगाड़ )मिल जाती है.

उन्होंने अपनी टॉर्च को आखिरी बार सूरज की ओर लपकाया,चमकाया और अपनी समझ से उसकी रोशनी को चुनौती दे दी थी.अब तक उनके दिल का दर्द और पेट के मरोड़ में आराम आ चुका था.उनकी अपने गिरोह के दो-तीन सक्रिय कार्यकर्ताओं से अग्रिम शाबाशी मिल चुकी थी और अब तक वह अगिया-बैताली लेख भी तैयार हो चुका था,जिससे वे कई खुशफहम चेहरों पर कालिख पोतने वाले थे .उनका की-बोर्ड उन्हें बार-बार गदगद-भरी नज़रों से निहार रहा था.आखिर उन्हें भी कहीं से इतनी प्यारी नज़र मिल ही गई थी .

23 जून 2012

खुरपेंचिया ब्लॉगर अनूप शुक्ल जी !







ब्लॉग-जगत में इन दिनों एक विशेष प्रकार का तत्व सक्रिय है जिसे हम अपनी स्थानीय बोली में खुरपेंच कहते हैं.इसको ऐसे भी कह सकते हैं कि चलते हुए बैल को अरई मारना !अरई एक प्रकार का हथियार है जिससे किसान बैलों में नाहक उत्तेजना भरने का काम लेते हैं.इस तरह का काम अपनी कलम से द्वारा करना 'खुरपेंच' की श्रेणी में आता है.इस काम को पहले आदरणीय स्वर्गीय डॉक्टर अमर कुमार जी किया करते थे,पर उनके जाने के बाद इस विधा को और गति प्रदान करने व विशिष्टता से करने का काम हमारे फुरसतिया वाले अनूप शुक्ल जी ने लगातार किया है.इस प्रकार वे अप्रत्यक्ष रूप से अमर कुमार जी के ब्लॉगरीय-वारिस बनने की दौड़ में भी हैं.


अभी हाल के दिनों में उनकी इस खुरपेंच-प्रतिभा ने और ज़ोर पकड़ा है.जबसे मैंने यह जाना है कि वे टहलते हुए लिख लेते हैं या चर्चिया लेते हैं तब से बहुत हैरान और दुखी हूँ.खुद तो कभी रेलगाड़ी से सफ़र करते हुए ,उठते,बैठते या टहलते हुए कुछ भी लिख सकते हैं पर दूसरे अगर बकायदा नहा-धोकर,मानस-पारायण कर, बैठकर कुछ लिखते हैं तो अनूप जी लाख खामियां निकालने लगते हैं.डॉ. अरविन्द मिश्र जी से उनका गज़ब का याराना है पर मौका मिलते ही उनकी हिज्जों में हुई गलतियाँ भी निकालते हैं.अभी कुछ दिनों पहले आलोक कुमार जी के ऊपर लिखी पोस्ट में मिश्रजी ने 'आदि ब्लॉगर' शब्द पर आपत्ति की थी कि इससे आदि-मानव की गंध महसूस होती है सो इन्होंने उनका मान रखते हुए इसे 'पहला ब्लॉगर' मान लिया था.पर अधिकतर मौकों पर वे मिश्रजी को कोंचते रहते हैं.


मिश्रजी वैज्ञानिक-प्रतिभा संपन्न होते हुए भी यदि हिंदी साहित्य को अपनी ब्लॉगिंग से कुछ दे रहे हैं तो यह उनकी ब्लॉग-जगत पर असीम कृपा ही है.हमारे यहाँ जो निर्वात है,उसको एक तरह से वे भरने की कोशिश कर रहे हैं और इसी सिलसिले में यदि उन्होंने अपने साईं ब्लॉग को पहला विज्ञान-ब्लॉग घोषित कर दिया तो अनूपजी कसमसा गए.इन्होंने पुराना रिकॉर्ड खोजा तो पता चला कि ज्ञान विज्ञान नामका कोई ब्लॉग उनसे पहले से है.मिश्रजी ने अपना रिकार्ड टूटते देखा तो उन्होंने यह नवीनतम जानकारी दी कि वह ब्लॉग मृत हो चुका है,सो इस नाते जो उपलब्ध ब्लॉग हैं ,उनमें उनका ही हक बनता है !इस पर अली साहब ने एक दिलचस्प सुझाव दिया है ,'मृत हो चुके वर्डप्रेस के ब्लॉग के बाद वाला पहला ब्लॉग' |अभी तक इस तरह के दावे पर अनूपजी की कोई प्रतिक्रिया मेरे संज्ञान में नहीं आई है.


कुछ उदाहरण देखिये,जिससे पता चलता है कि अनूपजी को दूसरे का किया कुछ भी अखरता है.कोई अगर लिखकर रिकॉर्ड बनाता है या केवल ब्लॉग बनाकर रिकॉर्ड बनाता है तो भी उन्हें मंज़ूर नहीं है.अगर कोई कविता लिखता है तो उसमें भी उनकी घोर आपत्ति है.सतीश सक्सेना जी की कवितायेँ पढ़कर उनको उसमें रोने वाले बिम्ब नज़र आते हैं,जबकि खुद वो गरमी के बिम्ब पकड़ नहीं पाते और इसके लिए गुहार लगाते हैं !अब अगर कोई सदाबहार-टाइप बिम्ब लेकर कविता लिखता है तो भी उनको आपत्ति है.वे स्वयं मौसमी-बिम्ब का रोना रोते हैं.अगर कविता होगी,तो दर्द तो होगा ही.बिना दर्द के कविता कैसी ? इस तरह की कविताओं को वे रोने वाली कहकर खारिज करते हैं .जब हम दुःख में डूबकर कविता लिखते हैं तो कहते हैं कि या तो वह गीत का हुलिया बिगड़ गया है इसलिए यह कविता नहीं है या भाव झूठे हैं.यानी,किसी प्रकार लिखने में चैन नहीं है |


अनूपजी का जब कानपुर से जबलपुर जाना हुआ,तभी उनने 'घर से बाहर जाता आदमी' कविता लिख कर आर्तनाद किया था,गाहे-बगाहे 'कट्टा-कानपुरी' के नाम से सड़क-छाप शेर भी लिखते रहते हैं पर मजाल है कि कोई उनके रहते किसी भी विधा में कुछ भी लिख सके.हाँ,महिला-ब्लॉगरों के प्रति वे विशेष आदर रखते हैं.कुछ समय पहले तक महिलाओं को अपनी पोस्ट में सम्मान देने के लिए अक्सर सुदर्शन चित्र लगाया करते थे.किसी ने आपत्ति की कि भाई अपनी पोस्टों के ज़रिये वे नस्लवाद और रंगभेद फैला रहे हैं ,सो उन्होंने उन सुदर्शनाओं को काजल कुमार के कार्टूनों से रिप्लेस कर दिया .अब चारों तरफ शांति है.



अगर ब्लॉग-जगत में कोई पुरस्कार देना चाहता है तो इसमें भी उनको आपत्ति है .चाहे परिकल्पना-सम्मान हो या कोई आलसी-परियोजना| इनको सबसे बड़ी खुंदक है कि उनके रहते न कोई गद्य लिख सकता है,न पद्य ,न कोई रिकॉर्ड बना सकता है न पुरस्कार बाँट सकता है.गद्य में जहाँ हिज्जों की गलतियाँ निकाली जाती हैं,वहीँ पद्य में बिम्ब पकड़े जाते हैं.खुद बैठकर,लेटकर और टहलते हुए गद्य,पद्य या व्यंग्य जैसा कुछ लिखते हैं तो कोई बात नहीं,पर एक सामान्य ब्लॉगर अगर अपनी रेटिंग बढ़ाने को लेकर कुछ लिखता है तो उनके पेट में मरोड़ शुरू हो जाती है.लोगों के ब्लॉग-शीर्षकों को लेकर भी वे खूब मजे लेते हैं,इसी सन्दर्भ में उनके अपने ब्लॉग फुरसतिया को खुरपेंचिया जैसे नाम से नवाज़ा गया है !सभी पुरस्कार-समितियों से हमारा निवेदन है कि इन्हें सबसे बड़ा खुरपेंचिया पुरस्कार दिया जाय |


उनमें इतने खुरपेंच भरे पड़े हैं कि पूछिए मत ! पिछले साल जब हम पहली बार जे एन यू के कैम्पस में अमरेन्द्र त्रिपाठी और निशांत मिश्र के साथ उनसे मिले थे,तभी से हमारी ब्लॉगरीय-ज़िन्दगी ने गज़ब की रफ़्तार ले ली.उस समय हमें उन्होंने कुछ ऐसे ख़ुफ़िया सूत्र बताये थे,जिनके सहारे मैं कहाँ से कहाँ पहंच गया ? तब मैं ब्लॉगिंग-जगत का स्ट्रगलर हुआ करता था,उदीयमान-ब्लॉगर की पहुँच से भी बाहर ! उस हंगामी-बैठक के बाद आज इत्ते बड़े ब्लॉगिंग-जगत का सबसे बड़ा आलोचक-ठेकेदार बनने की राह पर हूँ.यह सब अपने फुरसतियाजी उर्फ खुरपेंचिया जी की दी हुई शुरुआती-डोज़ का ही तो कमाल है !


ये तो गिने-चुने लोगों के उदाहरण हैं.पता नहीं,कितने लोग इनसे मार खाए और खार खाए बैठे हैं.कुछ कमज़ोर दिल वालों ने तो इनकी खुरपेंच से आजिज आकर अपना काम-धंधा ही बदल लिया है.अनूप जी या तो किसी के यहाँ टीपकर उसकी सारी खुमारी उतार देते हैं या फिर टहलते हुए चर्चा करके ! चिट्ठाचर्चा को इन्होंने अपना अचूक हथियार बनाया हुआ है,उसी से अपने प्रिय शिकार पर हमला बोल देते हैं ! हमें सबसे बड़ी शिकायत यह भी है कि वो हमारे पड़ोस के हैं, न जाने कितनी बार इधर-उधर की लहरों से खेला करते हैं,पर हमें प्रमोट करने के लिए कभी कुछ नहीं किया !

मोरल ऑफ दा स्टोरी "ये आदमी हमें चैन से लिखने भी नहीं देता !"

12 जून 2012

आदमी की औकात !


औरत के दिल को पढ़ना भले मुश्किल हो गया हो, आदमी की औकात को पढ़ना हमेशा से आसान काम रहा  है।यहाँ बात केवल आदमी की औकात की होगी । हम आदमी को देखते-समझते हैं तो उसकी वेशभूषा से पर यही काम औरत के मामले में उसकी सूरत देखकर किया जाता है,जिसमें अक्सर हम मात खा जाते हैं।आदमी की शक्ल या सूरत या तो देखने-समझने लायक होती ही नहीं या हम उसको बिलकुल नज़र-अंदाज़ करते हैं।

थोड़ा पहले तक आदमी की औकात को समझने और जानने का सही माध्यम जूता रहा है |हमारे बुज़ुर्ग भी कहते आये हैं कि कि आदमी की औकात उसके जूते से जानी जाती है।पहले जूता देखकर ही अगले के बारे में यह अनुमान लग जाता था कि वह कितना कुलीन है या उसके जूते में कितना दम है ? भाई लोग अपने जूते की ठसक से समाज को खुले-आम बता देते थे कि अगर उनका जूता चल गया तो भलेमानुसों की सेहत ख़राब हो जाएगी।मगर यह सब बातें काफी-पुरानी हो चली हैं और जूते की कुलीनता की पहचान अब मोबाइल ने ले ली है।

सीधी-सी बात है,अब वही आदमी स्मार्ट  और रुतबेवाला है जिसके पास तगड़ा स्मार्टफोन हो । हम अब जूते पर नज़र नहीं रखते।किसी को देखते ही हमारी निगाह उसके आधुनिक फोन पर जाती है।अगला भी उचक-उचककर अपना फ़ोन दिखाने की फ़िराक में होता है,यदि उसके पास महंगा वाला है ! अगर उसके पास दो-इंची ,बिना टच वाला ,घटिया कैमरा वाला मोबाइल हुआ तो फट से उसकी पहचान एक चिरकुट-टाइप आदमी की हो जाती है। यदि उसके पास चार-इंची फावड़े-सी स्क्रीन वाला,टच और बढ़िया कैमरे का मोबाइल हुआ तो वह तुरत ही एलीट-क्लास का लगने लगता हैं,भले ही उसने दसवीं कक्षा घिसट-घिसटकर पास करी हो !

फोन जितना ज्यादा महंगा दिखता है,आदमी की कीमत और इज्ज़त उतनी ही ज्यादा होती है।आजकल औकात नापने का सबसे आसान तरीका मोबाइल है | इसके लिए कुछ पूछने की नहीं बस दिखने की ज़रूरत है | कुछ अंदाज़ यूँ लगते हैं;यदि किसी के पास ब्लैकबेरी फोन है तो वह किसी कंपनी में एक्जीक्यूटिव हैं और एप्पल का फोन है तो किसी रईसजादे या नेता की औलाद ।किसी और कंपनी के महंगे फोन से सामने वाला यह ज़रूर अंदाज़ लगा लेता है कि यह कोई आम आदमी नहीं ,बहुत पढ़ा-लिखा है।उससे पुलिस वाले तमीज से बात करते हैं और ऑटो-टैक्सी वाले जमकर किराया मांगते हैं । इस बीच कार वालों की रेटिंग लगातार गिर रही थी,जबसे हर ऐरे-गैरे ने ईएमआई पर गाड़ी लेनी शुरू कर दी थी | सो उस स्तर पर क्षति-पूर्ति की जा रही है।पेट्रोल के दाम बढ़ाकर उन कार-धारकों की औकात को भी अपग्रेड किया जा रहा है।अगर पेट्रोल का दाम  पांच सौ रूपये प्रति लिटर हो जाए तो वह दिन दूर नहीं जब गाड़ीवाला भी ठसक से कह सकेगा कि उसके पास पेट्रोल की गाड़ी है !

फ़िलहाल,बाज़ार में आदमी की औकात मोबाइल से हो रही है।इसलिए कम्पनियाँ जानबूझकर चालीस-पचास हज़ार के फोन ला रही हैं,ताकि इनके धारकों की रेटिंग न गिरे! वे चाहती भी नहीं कि इन फोन को चिरकुट-टाइप के लोग खरीदें | इससे कंपनी और कुलीन लोगों की इज्ज़त मिट्टी में मिल जाने की पूरी आशंका है !इसलिए यदि आप अपनी चिरकुटई से निजात पाना चाहते हैं या समाज में अपनी औकात दिखाना चाहते हैं तो आज ही फोन बदल लें,आपकी पूछ बढ़ जाएगी और समाज में रुतबा भी।

11 जून 2012

चिरकुट-चूहों से बचाओ !

आदरणीय प्रधानमंत्रीजी,
बहुत दुखी मन से यह पत्र लिख रहा हूँ।देश में ज़बरदस्त संकट की स्थिति पैदा हो गई है।सुना है,चूहे तीन करोड़ का अनाज खा गए हैं।यह बहुत ही गंभीर मसला है।ये हमारा बजट था ,इसे दूसरा कैसे उड़ा सकता है?हम तो कहते हैं कि तुरत ही संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए और इस पर बहस हो।एक संसदीय समिति से इसकी जांच भी कराई जाय कि हमारे बहादुरों के रहते ये सब हुआ कैसे ?

तीन करोड़ की रक़म यूँ ही जाया हो जाए,यह हम सब सहन नहीं कर सकते हैं।यह हमारे मौलिक-अधिकारों पर डाका है और इसे हम बिलकुल बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं।कालेधन को लेकर इतना शोर किया जा रहा है,अगर वह आ भी गया तो वह हमारे काम का नहीं है।उसे सफ़ेद करना पड़ेगा और उसमें समय लगेगा।जो धन हमारे पास पहले से ही चकाचक सफ़ेद है उसे हम ऐसे नष्ट नहीं होने देंगे ।उन चूहों की हमारे आगे बिसात ही क्या है? उन्होंने हमारी प्रभुसत्ता को ललकारा है इसलिए हम चुप नहीं बैठने वाले।


हमें किसी अन्ना से खतरा नहीं है पर जब बात हमारे अन्न की हो,पेट की हो तो यह बड़े खतरे का संकेत है।हमारे पुराणों  में अन्न को देवता कहा गया है और इन चूहों ने इस लिहाज़ से देवताओं पर आक्रमण किया है।अगर यह हाल देवताओं का हो रहा है तो फिर असुर कब तक सुरक्षित रहेंगे ?हमें किसी बाबा से भी कोई डर नहीं है क्योंकि वे सब मौका पाते ही कुतरने की जुगाड़ में लगे हैं।हम अपने जीते जी यह नहीं होने देंगे ।संसद के हमले के बाद यह बड़ा वाकया है .हमारी सत्ता को चूहों ने चुनौती दी है  इसलिए यह छोटा-मोटा मसला नहीं है,गंभीर आपदा  का समय है, हमारे अस्तित्व का प्रश्न है।अगर हम अभी एकजुट नहीं हुए तो कब होंगे ?

तीन करोड़ की रकम इतनी मामूली भी नहीं है।इस मद से हमारे यहाँ कम से कम दस टायलेट बन सकते हैं  जिनमें हमारे भाई-बिरादर बैठकर गंभीर-चिंतन करते ! इन चूहों ने अनजाने में ऐसा नहीं किया है।यह एक साजिश है हमें भूखों मारने की।हमने अपना सब-कुछ इस देश के लिए न्योछावर कर दिया है और लगातार इसी प्रयास में लगे हैं।हमने इस देश की सेवा में अपना पूरा परिवार झोंक दिया है ।अगर चूहे इस देश के मद को ऐसे खर्चने लगेंगे तो हमारे बिलों का क्या होगा? ये चूहे तो खा-पीकर अपने बिलों में मस्त घूमेंगे पर हम देश-सेवा को तरसते रह जायेंगे ।इस सबका सबसे बड़ा खतरा यह है कि चिरकुट-टाइप के चूहे इसका स्वाद पाकर और जोर से हमले करेंगे और सारे बिलों पर उन्हीं का कब्ज़ा हो जायेगा ।

इस ज्ञापन के द्वारा आपको हम सचेत करते हैं कि कम से कम अब तो जाग जाओ।अभी तक हमारे ऊपर सीधा हमला नहीं हुआ था,इसीलिए हम चुप बैठे थे।इन चूहों ने आज तीन करोड़ खाए हैं,कल हमें भी कुतरना शुरू कर देंगे।इन चिरकुट-टाइप चूहों से सख्ती से निपटने की ज़रुरत है नहीं तो हमारे खिलाड़ी और अफसरटाइप चूहों की प्रजाति पर ही संकट उत्पन्न हो जायेगा ! इस पर आप जल्द से जल्द एक सर्वदलीय बैठक बुलाकर आगे की रणनीति तय कर लें। इन चूहों को हमें ऐसा सबक सिखाना है कि इनकी सात पुश्तें अनाज को देखकर डरें और अन्न खाना ही भूल जांय !

उम्मीद है कि इस पत्र को आप वरीयता के आधार पर लेंगे और इस प्रकार  लोकतंत्र और हमारे मौलिक अधिकारों की रक्षा करेंगे ।                                                                              


                                                 आपका ही 
                                                         देश का प्रमाण पत्र धारी सेवक    
                                                                                                                   
                                                                                                                  

29 मई 2012

तभी पढ़ें जब आपके पास प्रमाण-पत्र हो !


जी हाँ ,आपने सही समझा ! अब मैं कोई ऐसा वैसा ब्लॉगर या लेखक नहीं रहा. मैं इत्ता पढ़ा जाता हूँ कि मेरा दम घुटने लगा है.मेरी कोई भी रचना अब मेरे निजी पेटेंट के दायरे में है और मैंने यह सोच रखा है कि मेरे लिखे हुए को केवल मेरे चम्पू ही पढ़ें और मेरी वाह-वाह करें.
मेरी लिखने की खासियत शुरू से यही है कि मैं बिना लाग-लपेट के लिखता हूँ ,भले ही किसी को केवल लपेटने के लिए लिखूं.मैं बिलकुल ताक में बैठा रहता हूँ कि कब हमारा शिकार मिले और मैं उसे धर दबोचूं.मेरी इसी प्रवृत्ति से कई लोग घबड़ा कर काउंटर-अटैक करने की कोशिश में लगे रहते हैं.इससे ही बचने के लिए मैंने पुख्ता इंतजाम किया हुआ है.अगर कोई भी ऐसी-वैसी उपदेशक टीप मेरी पोस्ट पर आती है तो मैं बक्से में ही बंद कर उसका गला घोंट देता हूँ.लेकिन इधर कुछ ज़्यादा चालबाज़ लोग सक्रिय हो गए हैं और मेरी पोस्ट पर टीप न करके इधर-उधर उसका लिंक बिखेर देते हैं.इससे ही बचने के लिए मैंने यह नया नुस्खा आजमाया है.
मेरा नया नुस्खा यह है कि मैं जिसको चाहूँगा वहीँ मुझे पढ़ेगा और देखेगा.मुझे पढ़ने और देखने के लिए मुंहदिखाई जैसी रस्म अदा करनी पड़ेगी.कई बाबा-टाइप के ब्लॉगर हैं जो चुपचाप घूंघट उठाकर देख भी लेते हैं मतलब पोस्ट पढ़ लेते हैं पर मुंहदिखाई से मुकर जाते हैं.इन्हीं सब हरकतों से तंग होकर मैंने यह फैसला निजी हित में लिया है कि जिसे मेरी पोस्ट पढनी हो,मेरे पास मेल भेजेगा,इससे दो फायदे होंगे.एक तो अपना रुतबा कायम होगा ,दूसरे यह कि उससे मेलजोल की सम्भावना भी बढ़ जायेगी.इस तरह बिना किसी और के जाने,मैं चुपचाप कई विकल्पों में विचरण कर लूँगा.
मेरी पोस्ट मेरी निजी संपत्ति है.इसे मैं सबके लिए सार्वजनिक नहीं कर सकता हूँ.आजकल बड़े खुर्राट किस्म के ब्लॉगर मैदान में आ गए हैं.वे हमारी त्रुटियों पर और निरर्थक रचना पर सरे-आम बहस छेड़ देते हैं.मेरा ताज़ा उपाय इसकी भी काट करेगा.मैं भले ही दूसरों की पोस्ट में अपनी पूरी पोस्ट टीप के रूप में चिपका दूँ,पर मजाल कि कोई मेरी दीवाल के आस-पास भी आ सके.मैं इसी दिन के लिए ब्लॉगर नहीं बना था.मैं लिखित रूप से एक ब्लॉगर हूँ और यह भी कि उस पर मेरा पेटेंट है.आजकल कुछ पता नहीं कब कोई हमारे टेंट में आकर अपना खूँटा गाड़ दे इसलिए मैंने इसे सब तरह की अलाय-बलाय से दूर रखने का फैसला किया है.यह मेरा प्रजातान्त्रिक अधिकार है,इससे भले ही किसी और के अधिकारों का हनन क्यों न होता हो,पर मैं किसी और के अधिकारों के बारे में क्यों सोचूँ ?

इसलिय इस पोस्ट को पढ़ने के लिए आप ठीक से सुनिश्चित कर लें कि मेरे द्वारा जारी प्रमाण-पत्र आपके पास है या नहीं,अगर नहीं है तो सारे हर्जे-खर्चे के जिम्मेदार आप होंगे !

डिस्क्लेमर: इस पोस्ट में कही गई बातें निहायत वैकल्पिक हैं और इसका सम्बन्ध किसी भी ब्लॉगर से महज़ संयोग हो सकता है !

14 मार्च 2012

सदाबहार बौराए हुए !

फागुन बीत गया है,बसंत भी बीत गया पर मन अभी भी बहक रहा है.मेरा मन कभी भी मौसम के साथ नहीं चल पाता.अगर ऐसा होता तो प्रेम-दिवस ,फगुनहट आदि मौकों पर इसमें ज्यादा उबाल आ जाता और बाकी दिनों में हमारे दिल की धड़कन सामान्य रहती.अब तो ऐसा हो गया है कि चालीस के पार पहुँचकर भी लगता है कि चौबीस के ही आस-पास हूँ.हमें लगता है कि इस दुनिया में हर चीज़ बदल गई है सिवाय हमारी उमर के !जब तक आइना नहीं देखते ,यही सोचे रहते हैं कि हम  बिलकुल  कॉलेज जाने वाले टीनएजर हैं !

हमारा मन किसी सुन्दर नारी चित्र को देखकर एकदम से बौरा जाता है.घर में अंग्रेजी-अख़बार इसीलिए नहीं मँगाते. घर से बाहर सजीव- सौन्दर्य देख कर तो हम आँख ही बंद कर लेते हैं.सोचता हूँ,क्या इस उमर में यह सब देखना या सोचना हमें शोभा देता है ? ख़ास बात यह है कि हम इस मामले में इत्ते पेटू हैं कि एक-दो 'दर्शनों' से जी नहीं भरता.अगली बार ऐसा न करने का वचन खुद ही लेता हूँ और अगले पल उतनी ही ज़ोरदार तैयारी  से इसके खिलाफ़  हमला बोल देता हूँ.इसके अलावा हम अकेले ,केवल  आँखों के अस्त्र के साथ,निरुपाय,असहाय भला क्या कर सकते हैं ? यह कोई बीमारी है या महज़ जीवन-रस ?

आखिर हमारा मन उमर के साथ-साथ  अपनी इच्छाओं को क्यों नहीं दबाता ? फिर सोचता हूँ कि यदि वास्तव में ऐसा हो जाये ,मन से यह रस निकल जाये तो कितना नीरस हो जायेगा यह जीवन !कहने को तो सब कहेंगे,'अजी ! ऐसे ख़याल आपको ही आते होंगे,आप तो बड़े ही कमीने-टाइप के निकले.अपनी पत्नी के होते इधर-उधर ताकने की कोशिश में लगे रहते हैं !"    और हाँ ,  यही  लोग  ऑफ-द-रिकॉर्ड हमारी बात को पूरी तरह तसदीक करेंगे ! इस विषय पर मेरी कई दोस्तों से गुफ्तगू हुई है जो ऐसी बातें खूब रस लेकर सुनते हैं. कुछेक का तो बकुर तभी फूटता है जब हम कोई काल्पनिक-वृत्तान्त सुनाने लगते हैं. पर ऐसे लोग सामूहिक रूप से चुप्पी ओढ़े रहते हैं . मैं तो कहता हूँ  कि ये   चुप्पा-टाइप लोग व्यावहारिक रूप से ज़्यादा  खतरनाक होते हैं.इनसे अच्छे तो हम हैं जो अपनी हवा निकाल लेते हैं !

कभी किसी को घूरते हुए लगता है कि क्या वाकई में हम इत्ते कमीने हैं ? बाल-बच्चेदार हैं, यदि वास्तव में हम संत बन जाएँ तो जीवन से आनंद और आशा का विलोप हो जायेगा.घर से तो सूखे निकलते ही हैं बाहर भी सुदर्शना न दिखे ,कोई बोहनी न हो तो पूरा दिन ही चौपट और वृथा हो जाये !इस तरह हमारा दिन तो ख़राब हो ही,अगले का साज-श्रृंगार में लगा धन व समय भी अकारथ हो जाये.कई बार बस-स्टॉप में  हमने महसूस किया कि यदि किसी लड़की को कुछ निगाहें घूरती हुई नहीं दिखतीं तो वह खुद बार-बार अपने को देखना शुरू कर देती है.ऐसा करके वह अपनी सुन्दरता पर शक करने लग जाती है और यह सब देखकर हम और दुखी हो जाते हैं.


हम ईश्वर का धन्यवाद करते हैं कि अस्सी-साला होते हुए भी वह लोगों को ऐसी ललक के सहारे ज़िन्दा रखता है.ऐसे ख़याल आते ही घर बैठकर  वे बीमारी में भी टॉनिक लेते रहते हैं.हमारे एक मित्र जो हमसे दस साल बड़े हैं,इस रस को अपना रोग बनाये बैठे हैं.बात होने पर दिल की भड़ास निकालते हैं और इच्छा करते हैं कि पुराने दिन फिर से लौट आयें.इस पर मैं कहता हूँ कि ऐसा होने पर फ़ायदा तो एक मिलेगा पर नुकसान बहुत सारे झेलने पड़ेंगे.इस तरह उनकी उम्मीद हवा हो जाती है पर टूटती नहीं.नए सिरे से,नए तरीके से वे अपने दिल को बहलाने का इंतजाम करने में जुट जाते हैं ! ऐसे में उन्हें मुक्ति मिलेगी क्या ?


अगर किसी को हम  भौतिक रूप से नुकसान नहीं पहुँचाते,खुद मन ही मन खुश और रस-युक्त हुए रहते हैं तो भला दुनियावालों को क्या आपत्ति ?

7 मार्च 2012

बुरा न मानो होरी है !

उधर  चुनाव के नतीजे आने शुरू हुए और इधर मुझे  चिंता हुई कि हमारे नेताजी का न जाने क्या हाल होगा ?मैंने उन्हें फोन लगाया तो बार-बार यही सन्देश आ रहा था कि वे आपकी पहुँच से बाहर हैं.अब इस पर मैं क्या कहूँ,नेताजी तो मेरी पहुँच से बाहर पहले भी थे वो तो मुआ चुनाव न आता तो वे क्या उनका फोन भी मेरी पकड़ में न आता !

मुझे याद आने लगा,नेताजी का अबकी बार बड़े जोश में होना.वे हमारे क्षेत्र के साथ-साथ पूरे प्रदेश को सुधारने का संकल्प ले चुके थे.इसके लिए कुछ समय पहले से ही वे जी-जान से जुटे हुए थे.एक तरफ वे जगह-जगह  अपनी बाजुओं को चढ़ाकर भ्रष्टाचार और अपराध को लतिया रहे थे तो दूसरी ओर उनके सिपाही जनता को ललचा और धमका रहे थे.इस अभियान में अकिल वाले वकील साब ,रणविजय जी ,बलवान जी और खैनी प्रसाद ने अहम् रोल अदा किया.किसी ने बाबा को,किसी ने महात्मा को तो किसी ने आम मतदाता को ठिकाने लगा दिया था.मुझे पूरी उम्मीद थी कि जनता आखिरी समय में  हमारे नेताजी का ही साथ देगी.

मगर चुनाव के नतीजे सब उलट-पुलट किये जा रहे थे.मेरा मन बेचैन हो गया.मुझे लगा कि इस वक़्त नेताजी को मेरी सबसे ज्यादा ज़रुरत है.फोन से बात हो नहीं पा रही थी सो मैं उनसे मिलने स्वयं उनके घर पहुँच गया.घर के बाहर लगे पोस्टर अभी भी मतदाताओं को जगाने का आह्वान कर रहे थे.एक्का-दुक्का  आदमी कुर्सियों पर पड़े ऊंघ रहे थे.तभी देखा एक कोने पर नेताजी भी बैठे दिखे.पहली बार उनसे मिलने के लिए पहले से इजाज़त लेनी की ज़रुरत नहीं पड़ी.मैं उनके पास पहुँच गया ,उन्होंने इशारे से मुझे बैठने को कहा.मैंने उनका यह इशारा जल्द समझ लिया,हालाँकि मेरे कई इशारे चुनाव के पहले वे नकार चुके थे.

मैंने नेताजी से सहानुभूति दिखाते हए कहा कि आपने इस बार बड़ी मेहनत की.इस कोशिश में आपके कुरते को भी काफी-कुछ झेलना पड़ा पर कोई बात नहीं,अगली बार आप ज़रूर सफल होंगे.नेताजी ने सांस भरते हुए कहा कि इस प्रदेश का कुछ नहीं हो सकता.लोग मुद्दों को नहीं समझते.मेरी भावनाओं को दर-किनार करके यह प्रदेश किस तरह उन्नति करेगा,मैं समझ नहीं पा रहा हूँ.मैंने जनता की भलाई के लिए कितना सोच रखा था,काफी बजट भी तैयार कर रखा था,अब सब बेकार हो गया.नेताजी आगे कहने लगे कि मुझे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा है.सारी गलती चुनाव-आयोग की लगती है.फागुन के महीने में चुनाव कराने की क्या ज़रुरत थी ? मुझे तो लगता है कि इस फगुनई असर से मतदाता भी बौरा गए और उन्होंने हमारे त्याग-बलिदान का भी कोई लिहाज़ नहीं रखा !


मैंने मौके की नजाकत ताड़ते हुए कहा कि मतदाताओं को इस चुनावी-मौसम में पहली बार फागुनी बदला लेने का मौका मिला है.आप हलकान न हों.आप की बेमौसम कारगुजारी को मतदाता कई बार अनदेखा और माफ़ कर चुके हैं.इस बार यह गुस्ताखी अगर उन्होंने की है तो आप भी उन्हें माफ़ कर दो,आखिर होली है.मैंने उनके माथे पर गुलाल लगाते हुए चिकोटी काटी,बुरा न मानो होरी है !

27 नवंबर 2011

ब्लॉगिंग के साइड-इफेक्ट !

इधर लिखते हुए इतना समय तो हो ही चुका है कि ब्लॉगिंग के बारे में अपने उच्च विचारों से  भाइयों  का ज्ञानवर्धन कर सकूँ ! सबसे ज्यादा बात जो मुझे महसूस हुई वह यह कि यहाँ पर लिखने से ज़्यादा टीपने को लेकर  बड़ी संवेदनशीलता है.इसके लिए इतनी मारामारी  है कि बक़ायदा कई मठ स्थापित हो चुके हैं. आप यदि नए-नए ब्लॉगर हैं तो आपको इन्हीं में से किसी एक में घुसना होगा.अब यह आपकी योग्यता और क़िस्मत पर निर्भर है कि वह मठ आपकी प्रतिभा को जल्द परख ले. आपका लिखते रहना से ज़्यादा ज़रूरी है ,टिपियाते रहना.आप बड़ी संख्या में टीपें पा रहें हैं तो ज़रा कुछ दिन 'आउट -स्टेशन' होकर देखिये या विश्राम करने की ज़ुर्रत करिए,सारा दंभ हवा हो जायेगा ! दो-चार रहमदिल दोस्त ही नज़र आयेंगे,आपकी पोस्ट टीपों के नाम पर पानी माँगेगी ! हाँ,पोस्ट लिखने के बाद यदि गणेश-परिक्रमा-स्टाइल में सौ पोस्टों पर भ्रमण कर आयेंगे तो निश्चित ही आपको साठ-सत्तर 'सुन्दर-भाव',चिंतनपरक आलेख' और 'प्रभावी-प्रस्तुति' के रूप में ज़वाबी-प्रसाद मिल जायेगा.आपको भी ख़ुशी होगी कि कोई नया  ब्लॉगर (सयाना नहीं) यही समझेगा कि वाकई इस बन्दे में दम है !


टीपें पाने के उद्यम भी अजब-गज़ब हैं.सबसे सीधे लोग तो पोस्ट लिखकर कई जगह एक-एक लाइन लिखकर आ जाते हैं,ज़्यादा हुआ तो पोस्ट-लेखक कुछ लाइनें (जो उसे खुद समझ नहीं आतीं) कोट करके 'क्या खूब ' या 'सुन्दर प्रस्तुति' चेंपकर पोस्ट-लेखक को कृतार्थ  कर देंगे !इस कोटि से थोड़ा सयाने वे होते हैं जो  सम्बंधित पोस्ट पर सुन्दरता की  डिफॉल्ट-टीप  लगाकर अपनी नई पोस्ट की करबद्ध सूचना देंगे !अब वह यही समझे बैठे  हैं  कि वह यदि खुले-आम  ऐसी अभ्यर्थना नहीं करेंगे  तो ये महोदय आयेंगे ही नहीं.तीसरी कोटि के लोग वे हैं ,जो सयाने होने के साथ कुछ काइयाँपन भी लिंक के रूप में बिखेर देते हैं.वे यह समझते हैं कि जहाँ टीप रहे हैं,वहाँ का पोस्ट-लेखक गूगल-सर्च के द्वारा भी उस तक नहीं पहुँच पायेगा !


इस तरह टीपें हासिल करने की ये सीधी-सादी युक्तियाँ रहीं.कई बार तो लोगों को मेल कर,फोन कर(हाल-चाल के बहाने ,इसमें हाल कम चाल ज्यादा? ) भी दोस्ती के हवाले भी टीपें हथियाई जाती हैं! पर कई टीपबाज इतने शातिर हैं कि इतना सब होने के बाद भी उनकी आमद उस बेचारे की पोस्ट पर नहीं होती.इधर जितनी कम टीपें पोस्ट में दिखती हैं उतनी ज़्यादा उसकी 'हार्ट-बीट' बढ़ती है !अगर कुछ टीपबाज़  इतने शातिर हैं तो टीप हथियाने वाले भी खूब शातिर और जागरूक हो गए हैं. ऐसे लोग दाढ़ी बनाने वाली पोस्टों से लेकर टंकी पर चढ़ने व ब्लॉग-जगत को 'अंतिम-प्रणाम ' कहने की नौटंकी में माहिर हो गए हैं !

कुछ ब्लॉगर ,जो अपने को लेखक कम सेलेब्रिटी अधिक समझ बैठे हैं,इतने गैरतमंद हो उठते हैं कि अपने से  कमतर किसी ब्लॉग पर जाने को वे अपना अपमान समझते हैं.कोई बार-बार भी उनके ब्लॉग पर जाकर गंभीर-टीप देता है तो भी वह उसको 'अगंभीर' ही समझते हैं,ज़्यादा हुआ तो एक-आध स्माइली ठोंक कर चले जायेंगे  ( शायद यह बताना कि इस 'कूड़े' पर ठीक से हँसा भी नहीं जाता) !वे इस बहाने जताते हैं कि वे केवल लिखने और पढ़वाने भर के लिए अवतरित हुए हैं,प्रेरणा देना या उपदेसना उनके लेखकीय-कर्म में शामिल नहीं है.भले ही वह कई 'कुपोस्टों' पर जाकर ,जल-जलाकर लौटे हों.कुछ ऐसे भी सयाने टीपबाज  हैं जो किसी पोस्ट को पढते हैं,घोखते हैं,मजे लेते हैं पर मुँह से बकुर नहीं फूटेगा  और कन्नी काटकर चुप से ,बिना टीपे ऐसे निकल जाते हैं कि कहीं उन्हें करंट न लग जाए या इससे उनकी टीआरपी न गिर जाए !


कुछ लोग तो इतने फ़ुरसत में होते हैं कि खुराफ़ात के लिए अपनी कलम और स्याही बचा के रखते हैं .जो उनके अपने मठ के चेले होते हैं उन्हें भी वे नहीं बख्शते  ! कभी किसी को अपना अलग मठ बनाते देखते हैं तो सन्निपात की अवस्था में हो जाते हैं,अपने सारे हथियार खूँटी में टाँग कर उस निरीह-ब्लॉगर  को अपने पैरों पर खड़ा होने की गज़ब-शक्ति देते हैं ! कुछ ब्लॉगर तो मौके की तलाश में रहते हैं,किसी ने भी कुछ उन्नीस-बीस लिखा तो बिना लाग-लपेट के, उसके आगे-पीछे का ,अपनी यथाबुद्धि द्वारा ,संदर्भ देकर ,विलोप हो जाते हैं.ऐसे और भी कई तरह के ब्लॉगर सक्रिय हैं जो तथाकथित रूप से निष्क्रिय है पर उनके अपने मठ की जब पोस्ट आती है तो अपनी कलम घसीट ही देते हैं.


इसके उलट कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके यहाँ यदि गलती से भी आप कभी चले गए तो ज़बरिया आपको अपना लेंगे,न-न कहते-कहते अपने मठ की दीक्षा भी दे देंगे और बिला नांगा आपको पढ़ते रहेंगे,टीपते रहेंगे और आप इनसे कुछ सीखते भी रहेंगे.इनके पास पता नहीं कौन-सा गरम-मसाला  होता है कि एक ठंडी-सी पोस्ट में भी कमाल का उबाल ला देते हैं.टीपने वाले  बार-बार इनके और पोस्ट के संपर्क में रहते हैं.कुछ लोग तो इतने भोले हैं कि किसी घटना -दुर्घटना से इनका लेना-देना नहीं होता.ये शांतिप्रिय ढंग से यहाँ,वहाँ टीप देते हैं,टीप पाते है,बस...इत्ते से संतुष्ट हो जाते हैं !


ब्लॉगिंग-जगत में कई तरह की प्रवृत्तियां सक्रिय हैं.अब यह आप पर निर्भर है कि इन प्रवृत्तियों में आप अपने को किसके नज़दीक पाते हैं.टीपों को लेकर इतना घमासान और ऐसी दुरभिसंधियां चलती हैं कि निरर्थक  पोस्टें जहाँ शतक बना लेती हैं,(भले ही वह डिफॉल्ट-टीपें हों ) वहीँ कई अच्छे लेखक ,बिना टीप किये ,अपनी पोस्ट में एक अदद टीप को तरसते हैं.हम पोस्ट को लेकर सेंटीमेंटल हों या टीप को ,यह आपको,हमको,सबको सोचना है.सोचो और जल्दी टीपो,नहीं तो हम सेंटिया जायेंगे !



जेहे-नसीब श्रीमान अनूप शुक्ल जी (फुरसतिया जी) पधार चुके हैं.इस विषय पर उनकी लेखनी का कमाल देखिये,हमने तो झलकी दी  है,उन्होंने तो पूरा महाकाव्य रच डाला है ! आभार सहित 

15 अक्टूबर 2011

करवा-चौथ और बेचारा पति !

वैसे तो पति नाम के निरीह प्राणी को पूरे साल दम मारने की फ़ुरसत नहीं मिलती है पर एक दिन ऐसा आता है जब उसे सूली पर लटकाने का विधिवत कार्यक्रम होता है.श्रीमतीजी पूरे साल और कामों में इतना व्यस्त रहती हैं कि पतिदेव की ख़ातिरदारी में कोई न कोई कोताही ज़रूर रह जाती है.इसीलिए किसी शुभचिंतक ने करवा-चौथ का मुहूरत सोच-विचारकर निकाला है.


पति को तीन सौ पैसठ दिन भकोसने वाली बीवी जब अचानक किसी दिन मेहरबान हो जाय तो समझो कि शामत या क़यामत ज्यादा दूर नहीं है.शायद इसी तरह के प्रसंगों से प्रेरित होकर तुलसी बाबा ने लिखा है,'नवनि नीच कै अति दुखदाई,जिमि अंकुस,धनु,उरग,बिलाई'! यहाँ भी जब पत्नी से अनायास ज़्यादा प्यार टपकने लगता है तो पति की  हालत पतली होने लगती है.उसे लगता है कि वह बलि का बकरा है और उसको आज के ही दिन हलाल करने के लिए तैयार किया गया है.


क़रीब पंद्रह दिन पहले से इस दिन की आहट सुनाई  देने लगती है.जेब की तलाशी तो पूरे साल ली जाती है लेकिन इन दिनों तो बक़ायदा डकैती पड़ती है.मजाल है कि इस पवित्र पर्व के अनुष्ठान के लिए पति उफ़ भी कर दे.साल भर पानी पी-पी कर कोसने वाली सबला जब धर्मपत्नी बनने को आतुर हो उठती है तो फिर से तुलसी बाबा डराते हैं,''का न करै अबला प्रबल,केहि जगु काल न खाय" !पति की पूजा  के नाम पर पत्नी कितनी मेवा खा लेती है यह विशेषज्ञ पति ही बता सकता है. प्यारा और दुलारा पति अडोस-पड़ोस से गुजरता हुआ नकली मुस्कान चेहरे पे लादे रहता है और सोचता है कि कितनी जल्दी चाँद दिखे और उसका जो भी होना है हो जाये !चाँद को छन्नी से देखने का फंडा भी अजीब है.विवाह से पहले जिस चाँद से उसकी तुलना की जाती है ,पत्नी देखती है कि उसमें क्या ख़ास है जो अब उसमें नहीं रहा !


पत्नी के मेहंदी भरे हाथ पति को कैक्टस की चुभन से कम नहीं लगते.वह इस ख़ास  दिन को लेकर इतना आशंकित रहता है कि उसे भी कुछ दिन पहले से अपनी व्यूह-रचना करनी पड़ती है.इस समय अगर पति की  जेब टटोली जाये तो पैसों की जगह बादाम,किशमिश और काजू के कुछ दाने ज़रूर मिल जायेंगे.जहाँ उसकी पत्नी अपने त्यौहार की तैयारी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करती है वहीँ पति ज़्यादातर चुपचाप ही रहता है.किसी भावी आशंका को वह अपने दोस्तों तक से ज़ाहिर तक नहीं कर सकता !क्या पता,संयोग से मिला एक सुकून भरा दिन भी उससे रूठ जाए !


सभी पतियों की तरह हम भी उम्मीद करते हैं कि यह करवा-चौथ भी पिछले की तरह बिना किसी ज्वालामुखी के फटे ,निर्विघ्न संपन्न हो जाये .पत्नी की मेहँदी का रंग नकली न निकले और यह अनुष्ठान बिना ए.टी.एम.
को नुकसान पहुँचाये,अगले साल तक के लिए विराम ले ले !जैसे हमसे पहले वालों के दिन बहुरे,वैसे हमारे भी बहुरें,इसी कामना के साथ करवा-चौथ की बधाई !!


12 अक्टूबर 2011

रजिया गुण्डों में फँस गयी !

थकावट थी इसलिए रात को जल्दी ही सो गया ! अचानक श्रीमतीजी की आवाज से चौंक गया,'अजी सुनते हो ! कई दिनों से पानी ठीक से नहीं आ रहा है,ज़रा टंकी तो देख कर आओ !कहीं कुछ लीक-वीक तो नहीं हो रहा है ! मैं अलसाया-सा उठ बैठा,सीढ़ी ढूँढने लगा तो उसके दो डेढ़के (पैर रखने वाले डंडे) नदारद मिले.मैं पड़ोसी के यहाँ जाकर उसकी सीढ़ी से अपनी छत पे पहुँचा ! 


छत के ऊपर बुरा हाल था.आस-पास कीचड़-सा जमा था .टंकी का ढक्कन खोलकर देखा तो तली में थोड़ा पानी दिखा,जिसमें दो-तीन मेंढक उछल-कूद कर रहे थे.मैं नीचे से मोटर चला कर आया था,पर यहाँ पानी की एक बूँद भी न टपक रही थी.अब मेरा दिमाग हलकान हो रहा था.टंकी लगभग सूखी थी और मेंढकों ने उस पर अपना कब्ज़ा जमा लिया था.लेकिन मुख्य सवाल यह था कि पानी क्यों नहीं आ रहा है? अभी थोड़े दिन पहले ही एक जाने-माने प्लंबर से ठीक भी कराया था.उसने टंकी की मरम्मत करने के बाद उस पर बाक़ायदा  अपना नोटिस-बोर्ड लगा दिया था.किसी भी तरह की समस्या के लिए इस नंबर पर कॉल करें !मैंने तुरत वह नंबर डायल किया पर मुआ वह भी 'नॉट-रीचेबल' बता रहा था.


मैंने श्रीमतीजी को छत से ही खड़े-खड़े आवाज़ दी ,''भागवान, ज़रा शर्माजी से पता करो,वह दूसरे शहर के प्लंबर से काम करवाते हैं और उसका बड़ा नाम है.थोड़ी देर में पता चला कि वह प्लम्बर इस समय शर्माजी के यहीं आया हुआ है,सो श्रीमतीजी ने तुरत उसे अपने यहाँ बुला लिया.


शर्माजी के प्लंबर ने आते ही हमारी समस्या सुनी और बजाय वह छत पर चढ़ने के, जहाँ मोटर लगी थी,वहाँ   पहुँच गया.उसने बटन दबाते ही हम दोनों की तरफ घूरकर ऐसे देखा,हम तो डर ही गए ! हमें लगा कि  क्या कुछ हो गया है? उसने अपना निर्णय सुनाया,भाई साहब ! आपकी तो यह मोटर ही फुंकी पड़ी है तो पानी ऊपर टंकी में कैसे चढ़ेगा ? आपने इस मोटर को बिना चेक किये कई बार चलाया है जिससे यह जल गई है ! मैंने कहा,''अभी तो एक नामी-गिरामी स्पेशलिस्ट प्लंबर को दिखाया था,फिर यह कैसे ? उसने आगे बताया,देखिये ,उसी ने गलत जगह छेनी-हथौड़ी चलाई है इसलिए इसके नट-बोल्ट ढीले हो गए थे.ऐसे में आपको इसे नहीं चलाना चाहिए था.मैंने कहा,जो गलती हुई सो हुई अब बताओ क्या हो सकता है? उसने झट-से बात साफ़ कर दी कि अब इसमें इतनी तोड़-फोड़ हो चुकी है कि यह रिपेयर के लायक नहीं है,इसलिए अच्छा है  कि नई मोटर लगवा लें !


अब श्रीमतीजी की बारी थी! उन्होंने हमें ही कोसना शुरू कर दिया.'मुझे शुरू से ही इसके लच्छन अच्छे नहीं दिख रहे थे.जब इसमें ख़राबी आ गयी थी, तभी रिप्लेस कर देते,अब भुगतो. यह सब उस नासपीटे प्लंबर का किया धरा है जिसने मोटर तो खराब की ही ,टंकी में भी मेढकों का जमावड़ा कर दिया.अब जब पानी ही न रहा और न आने की गुंजाइश है तो ये मोटर और टंकी दोनों हमारे किस काम की ?'


अभी मैं इस पर आने वाले खर्चे की उधेड़बुन में ही था कि  हमारी पड़ोसन ने ज़बरदस्त -ऑफर  देकर थोड़ी राहत दी.उन्होंने श्रीमतीजी से कहा,'कोई नहीं बहन,आख़िर आप भले मुझे अपना न समझे पर मैं आपकी टंकी में अपने पाइप के ज़रिये थोड़ा-बहुत पानी दे सकती हूँ". मैं इस पर रजामंदी देने ही वाला था कि श्रीमती जी ने मेरा चद्दर उठाते हुए झिंझोड़ा,देखो जी कितना सूरज चढ़ आया है और आप हैं  कि अभी तक  घर्रे मारे जा रहे हैं  !

मैं हड़बड़ाकर उठ बैठा ! मेरी नींद काफूर हो गयी थी,फिर मैंने जल्द से टंकी की ओर देखा,उसी प्लंबर का फोन नंबर बड़े-बड़े अक्षरों में दिख रहा था !दूसरे कमरे में बच्चे एफ.एम. में गाना सुन रहे थे,'रजिया गुण्डों में फँस गयी' ! 





20 सितंबर 2011

न जाओ सैंया,छुड़ा के बैंया !

आजकल पितर-पक्ष चल  रहे हैं !हिन्दू मान्यताओं के अनुसार कुछ बढ़िया या अच्छे काम इस समय नहीं किये जा सकते ! पर,ब्लॉग-जगत में कुछ ऐसा होने की घनघोर आशंका हो गयी है.इसलिए हम सभी को ऐसा न होने देने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देना चाहिए !हम तो ब्लॉगिंग में रस और मज़ा लेने आये थे,वह मिलना शुरू ही हुआ था कि इसका मुख्य-तत्व 'मसखरापन'(नौटंकी से तौबा) गायब होने की मुनादी पीट दी गयी है !

ब्लॉग-लेखन में उस समय भयानक कोहराम मच गया जब मसखरेपन ने इस ज़मात से बाहर होने की घोषणा कर दी.जितने भी गंभीर-टाइप के ब्लॉगर हैं उनको तो साँप ही सूँघ गया ! अब लिखने-लिखाने के बाद फ़ुरसत के क्षणों को हम सब लोग कैसे समायोजित करेंगे,यह परेशान करने वाला सवाल उठ खड़ा  हुआ है.

मसखरेपन का सबसे बड़ा कष्ट टीपों को लेकर है.उसका मानना  है कि टीपें इतनी मसखरी और मारक हो गयी हैं कि अब हमारे ऊपर ही भारी पड़ने लगी हैं.अगर ऐसे ही चलता रहा तो पोस्ट में जो 'लौह-तत्व' है ,वह भी बर्फ की  मानिंद ठंडा और कुंद हो जायेगा !इस सबसे बचने के लिए हालाँकि उसने शुरूआती और अहतियाती कदम उठा रखे हैं फिर भी मुँहनोचवा-क़िस्म के लोग अपनी आदत से बाज़ नहीं आ रहे हैं.लौह-तत्व की संरक्षा के लिए बकायदा टीपों को छानने का इंतज़ाम है.इसमें केवल पारिवारिक-सदस्य अपना प्यार ,मनुहार उड़ेल सकते हैं.और हाँ,ज़रुरत के अनुसार पिता,माँ,और भाई की संख्या घटाई-बढ़ाई जा सकती है !


अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे मसखरेपन ने मचान पर फिर चढ़ाई कर दी है,'सबते कठिन जाति अवमाना' का भी टोटका किया गया  है !उस पर विदेशी-आक्रमण भी लगातार हो रहा है तो कोई उसे छीलने में जोर का अट्टहास लगा रहा है,यह  हम सबके लिए भी चिंता का सबब होना चाहिए.आखिर जब मसखरेपन का तत्व ही नहीं अस्तित्व में होगा तो हम सिरफिरे और नाकारा लोग अपनी टीपों में धार कैसे ला पाएँगे ?


अभी भी समय है.जिस तरह राजनीति में जबसे 'लालू-तत्व' गायब हुआ है,पत्रकारों और व्यंग्यकारों की कलम   निष्प्राण हो चुकी है,उससे कम गहरा संकट नहीं है इस मसखरेपन का जाना.इसलिए इन बुरे दिनों में इस तत्व को तिलांजलि देने पर हम क्यों तुले हुए हैं ? बार-बार ऊपर  चढ़ने से वह मचान या टंकी जो भी है,धंस जाए ,उसके पहले ही  इस अद्भुत व अनमोल तत्व को बचा लेना चाहिए ! क्या आप तैयार हैं ?



9 अगस्त 2011

उनकी गिरती साख़ और हम !

इधर एक  नई मुसीबत आन पड़ी है ! सारी दुनिया के पालनहार और रखवाले सैम अंकल की साख़ को कुछ लोग गिरा हुआ बता रहे हैं,जबकि ऐसा नहीं है  और उधर से बक़ायदा इराक-युद्ध की तरह ऐलान भी ज़ारी कर दिया गया है कि कहीं कोई दिक्कत नहीं है.अब वे तो ठहरे हमारे प्रभु-देश,मगर भक्तों का क्या करें,बेचारे थोड़े में ही ढीले हो जाते हैं. भाई ,साख उनकी गिर रही है और दुबले हम हुए जा रहे हैं.

साख गिरने का असर कुछ ऐसा हुआ कि तीन दिन में ही दुनिया के बाज़ारों में कोहराम मच गया.जब  भगवान  की साख गिरेगी तो आंच उनके चेलों तक तो आएगी ही ! जब नफ़ा ऊपर से नीचे तक आता है तो नुकसान उलटी चाल क्यों चलेगा ? कई विशेषज्ञों ने हिसाब लगाकर बताया है कि इत्ते करोड़ का हो चुका है और बढ़ सकता है.

जिस एजेंसी ने साख़ गिराई है उसका नाम 'स्टैंडर्ड एंड पुअर'  है ,तो भाई वह कितनी बड़ी तोप है ? जिसकी साख़ को ईराक,अफगानिस्तान और पाकिस्तान मिलकर नहीं गिरा पाए तो मुई यह कागजी जोड़-घटा क्या ख़ाक गिरा पाएगी ?सामाजिक साख़ से आर्थिक साख़ बड़ी होती है क्या? जब वे उसे झेल गए तो ये तो दोयम दर्जे की है ! सुनते हैं कि 'मूडी' भी इसी राह पर चलने वाली है तो भाई,वह तो है ही 'मूडी' उसका क्या,जैसा मूड होगा वैसा कह देगी ! इन बातों से महाशक्ति का कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है.

यही लिए हमारी सरकार ने  कहा है कि हमें चिंता करने की ज़रुरत नय है.हम बिलकुल ज़मीनी तौर पर मज़बूत हैं,हम ज़मीन में ही पड़े हैं,इसलिए हम न कभी ऊपर थे और न गिरेंगे ! गिरने का ख़तरा तो उन्हीं को होता है जो आगे-आगे भागते हैं और ऊपर को उछलते हैं ! फिर वह कोई बरगद की शाख थोड़े है कि उसके गिरने से हम सब दब जायेंगे ! हम तो इसीलिए वह चीज़ रखते ही नहीं जिसके न होने का भय बना रहे !

फिलहाल ,हमें तो मुँह ढक के सो जाना चाहिए !



गिरती उनकी साख ,पर होते हम बेचैन,
हम बौराए-से फिरें,चौतरफ़ा दिन-रैन!

चौतरफ़ा दिन-रैन ,मुसीबत में अमरीका,
छींक अगर आ जाए तो हिस्सा हिले जमीं का!

साख बचाने उसकी ,अब हम सब दौड़ेंगे,
इस कोशिश में भी ,पाक से हम  पिछ्ड़ेंगे!

कह चंचल कविराय ,क्यों  करें  इतनी विनती,
साख हमारी नहीं इसलिए नहीं है गिरती !




23 जुलाई 2011

सैम अंकल ,इतना दबाव ठीक नहीं !


आप तो इस दुनिया के प्रभु-देश हो और अपने भक्तों के लिए आप यह क्या करने जा रहे हैं? आपकी विदेश मंत्री ने अपनी भारत-यात्रा पर हमारे देश का ज़बरदस्त समर्थन किया है! उन्होने हमारे हुक्मरानों को भरपूर आश्वस्त किया है कि वे कतई परेशान न हों,ख़ुद अमेरिका उनकी परेशानी को समझता है और इसलिए वह पाकिस्तान पर आतंकवाद के मुद्दे पर अपना दबाव और बढ़ाएगा!पर इसके उलट  मैं इतना ज़रूर आपसे कहूँगा कि  पाकिस्तान पर अपना दबाव न बढ़ाए नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि आपके  अधूरे काम में ही  बाधा पड़ जाए!

सैम अंकल! आपको अपने आर्थिक हितों के ही बारे में सोचना चाहिए .अगर ज़्यादा दबाव पड़ा तो फिर हथियारों की होड़ ख़त्म हो जाएगी, आपका पाला-पोसा बालक जवान होने से पहले ही निपट जाएगा. वैसे भी 'ओसामाजी' के जाने के बाद वहाँ के रहनुमा भारी सदमे में हैं.इस मौक़े पर यदि भारत के नाम पर उस पर दबाव पड़ा तो आपका 'क्रीड़ा-स्थल' तो पूरी तरह से चौपट हो जाएगा! यह अपील तो हम आपसे आम लोगों की तरफ़ से कर रहे हैं और रही बात हमारी सरकार की तो उसने कभी-भी आपको निराश नहीं किया है.पूर्व में जब भी कुछ हुआ है तो आपको फ़ोन कर या चिट्ठी लिखकर सूचित किया गया है. चाहे संसद पर हमला हो या मुम्बई पर ,हमारी हर सरकार ने आपके हितों की रक्षा की है.इसी परम्परा के निर्वहन हेतु हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप उन्हीं पर ड्रोन  का हमला करें ,जो सीधे आपकी संप्रभुता पर चोट करते हैं!

आशा है,हमारी इस अपील और आग्रह पर आप अमल करेंगे और ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जिससे बेचारे पाकिस्तान को अपना 'मूल-धर्म' त्यागना पड़े!


17 जून 2011

सरकार का प्रेस-नोट !

हम सभी देशवासियों को साफ़ सन्देश देना चाहते हैं.पहले भी कई मौकों पर अपनी प्रतिबद्धता हम जता चुके हैं और आज फिर दोहरा रहे हैं कि  इस देश में हम जैसा चाहेंगे वैसा ही होगा ! इन टुटपुंजिया अनशनों और ग्लैमरस-आंदोलनों से कुछ भी नहीं होने वाला है.हमने घाघ नेताओं,मठाधीशों को निपटा दिया तो आजकल के बाबा और महात्मा किस खेत की मूली हैं ? इसलिए 'जनलोक पाल' को हम अपने तरीके से, अपनी चाकरी में पालेंगे न कि अपने घोड़े की लगाम किसी और के हाथ में दे देंगे !

साभार:गूगल सरकार
पिछले कुछ दिनों से देश भर में अराजकता का माहौल बनाया जा रहा है.लोग कहते हैं कि मंहगाई बढ़ रही है पर रिकॉर्ड बोलते हैं कि लोग भूख से बिलकुल नहीं मर रहे हैं,बल्कि वे तो 'अनशन' से शौकिया ही मरने पर उतारू हैं !ये लोग वास्तव में ढोंगी हैं,जिनको मरना होता है वह चुपचाप 'सरक' लेता है,निगमानंद की तरह ! यूँ ढोल-नगाड़े बजाकर मजमा नहीं इकठ्ठा करता है.

देश के लोगों ने देखा है कि योग-गुरु की बत्ती  हमने कैसे बुझाई है? पहले तो उसको भाव दिखाकर अपने पक्ष में बयान दिलवा दिया कि प्रधानमंत्री और मुख्य-न्यायाधीश को लोकपाल के फंदे से बाहर रखा जाये बाद में जब वह हमसे सौदा न करके संघ की शरण में जाने लगा तो ऐसा दौड़ाया कि इस ज़िन्दगी में दोबारा दिल्ली में अनशन करने की नहीं सोचेगा .अब अन्ना नाम के महात्मा को भी सबक सिखाने की ज़रुरत है.उत्तर-भारत में अन्ना का मतलब 'छुट्टा-जानवर' से होता है ,पर हम उसको इतना छुट्टा नहीं होने देंगे कि वह बेकाबू हो जाये!हम दूसरों को अपने खूंटे में बाँधते हैं,न कि उसके खूंटे से बंधते हैं !इसमें अपनी  जात-बिरादरी,माफिया,कार्पोरेट घराने या बड़ी मछलियाँ अपवाद हैं !

कितनी बेतुकी मांगे इस 'नागरिक-समाज'  की तरफ से उठाई जा रही हैं? भला किसी देश के प्रधानमंत्री पर कोई उँगली उठाई जा सकती है!आखिर अपने देश की इज्ज़त का सवाल है.यह इस बात से भी प्रमाणित होता है की  कोई भी विपक्षी दल इस माँग का समर्थन नहीं कर रहा है.इन दलों ने बाबा की सेवा के बाद राजघाट में नाच-गाना प्रस्तुत किया ,पर महात्मा की इस माँग पर चुप्पी साध ली हैं.यह हमारे प्रजातंत्र की एकता और असलियत है.


अब हम किसी से डरनेवाले नहीं हैं और ये निश्चित कर लिया है कि  इस देश में कानून किसी को हाथ में नहीं लेने देंगे,वह साठ सालों से सुरक्षित हाथ में है.इन अनशनकारियों को ऐसा सबक सिखा देंगे कि ज़िन्दगी-भर अनशन के नाम से तौबा करेंगे !हम कोई भी कानून संसद में अपने लोगों के बीच आम-सहमति से बनाने की प्रक्रिया का पालन करेंगे,न कि किसी तम्बू या सड़क पर संविधान को बेपर्दा करेंगे !हम ऐसे मामलों पर त्वरित कारवाई करेंगे भले ही कसाब और अफजल को कोई छुडा ले जाए !

उम्मीद है कि  हमारी नसीहत को फरमान माना जायेगा,हमारे सभी हथियार पुलिस,नौकरशाही और माफिया भ्रष्टाचार और काले धन से सज्जित होकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूर्ववत करते रहेंगे ! हम गाँधी के सपनों का भारत बनाकर दिखायेंगे ,इस काम में सरकार का हाथ आपके साथ है !

24 मई 2011

तिहाड़ जेल लाइव !

राजा: आओ कनिमोझी स्वागत है!
कनि: हाँ,अब तो तेरे कलेजा में ठण्ड पड़ गयी होगी .
राजा: हमरे तो हाथ बंधे थे,केवल अकाउंट खुला था.
कनि : हे राजा,ई तूने ठीक नय किया है.
राजा : अब हमरा नाम भी भूल गई हो,मैं ए राजा हूँ .
कनि: तुमरा नाम तो 'टाइम' पर आया है,एक लाख सत्तर हज़ार करोड़ मा खाली दू सौ करोड़ हमरे नाम !
राजा: शुक्र मनाओ,हमरी वज़ह से ही 'फर्स्ट-क्लास' जेल मिली है !छोटी-मोटी रकम में तो 'टाइम' क्या 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में भी न आ पाते !

इसी बीच फूलों का गुच्छा लेकर कनि के पप्पा आ जाते हैं ,राजा साइड में छुप जाते हैं !


ब्रेक के बाद ....

कनि बिटिया से मिल-मिला के जब उनके पप्पा चले गए तो राजा तिलमिला गवा !ओटरे से निकल के कनि से बूझै लगा:

राजा: ई आदमी केतना अहसानफरामोश निकला !हम इसके खातिर ससुर रिज़र्व बैंक बने थे और ऊ एक बार भी हमसे मिलने नय आवा.
कनि: लगता है तुम अब संठियाय गए हो !हमरे पप्पा अभी-अभी 'गद्दी' से उतरे हैं,उनको कुच्छौ नय सूझ रहा है.एकदम ललुयाय गये हैं.
राजा : अब ई लालू से उनकी कउनो बराबरी है का ?
कनि: हे राजा ,ऊ चारा खा के  ज़मीन  पर आये और हमरे पप्पा ,ई का कहत हैं टू जी-सूजी से !

अचानक तिहाड़ में बिजली गुल हो जाती है और उसके बाद आँखों देखा हाल तो कउनो उल्लू ही बताएगा !

23 मई 2011

क़यामत की फेसबुकिया डायरी !


तारीख :ठीक महाप्रलय से एक दिन पहले (२१ मई २०११ )

क़यामत के पहले की आखिरी रात है,
कम-अस-कम आज तो जी भर सो लें!

सन्दर्भ:आजतक,कलतक,इंडिया टीवी,अमेरिका टीवी,आधुनिक बाबा (जिन बाबाओं के नाम नहीं दे पा रहा हूँ,वादा है यदि हम जिंदा रहे तो उनको मरणोपरांत श्रद्धांजलि तो दे ही देंगे !


 महाप्रलय का दिन(२२ मई २०११)

क़यामत का लाइव टेलीकास्ट:

सूरज डूब गया है,अँधेरा छा रहा है,तेज हवाएं चलने लगी हैं!
हमारे 'तेज' चैनलों के बहादुर संवाददाताओं को फील्ड पर कैमरे ,माइक लेकर'रेडी' (ढींग चिका ढींग स्टाइल )कर दिया गया है.कई स्पांसर भी मिल गए हैं.आप सब लोग जाते-जाते यह भी देख सकें कि आपका कौन साथी आपके साथ जा रहा है ?मतलब,मजे से मरते हुए ऊपर जाएँ !


महाप्रलय का अगला दिन (२३ मई २०११)

आज सुबह नींद जल्दी खुल गई तो जिंदा होने का अहसास नहीं हो पा रहा था.इसलिए मैंने अपने बदन पे दो-तीन चिकोटी काट कर तसदीक करी कि वाकई में जिंदा हूँ ? बदन में फुल हरकत पाकर सुकून हुआ.भाई लोगों की तमाम कोशिशों के बावजूद हम कायम हैं ,दुनिया कायम है!


पिछले कई रोज से सबसे तेज चैनल ख़बरों से ही क़यामत ढाए हुए थे.कल रात को भी समाचार सुनने बैठा तो इसी के बारे में चर्चा होने वाली थी,झट से टीवी ऑफ करके सो गया.

इस बीच समाचार आये हैं कि कल आँधी-पानी से कुछ जगहों पर बीसेक लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं.ई ल्यो ,अब इसको भी वे अपने तईं खबर बना देंगे,जैसे पहली बार कोई बारिश या तूफ़ान में मरा हो !


चलते-चलते

वाकई इस 'क़यामत' ने बहुतों को 'मटीरियल' दे डाला है,इससे जो बच भी गवा तो ससुर पढ़-पढ़ के मरेगा !


16 मई 2011

लादेन के बाद !

लादेनजी के लद जाने के बाद हमारी चिंता बढ़ गई  थी कि अब चैनल वाले का करेंगे ? उस ससुरे में  इतना मसाला था कि मरने के बाद भी कई दिनों तक उसे,उसकी बीवियों को,उसके छोटे लड़के को लेकर भाई लोग 'एकताई-सीरियल' बना रहे  थे  तभी बड़ी  'कोरट' ने ऐसा फैसला सुना दिया कि उनकी खेती में और बहार आ गई !

हम बात कर रहें हैं भाई अमर सिंह की पुरानी फिलम की नई रिलीज की !जिन भाइयों के पास उस फिलम की सीडी अलमारियों में न जाने कब से बंद थीं और बाहर निकलने को आतुर थीं ,उन्हें फटाफट झाड़-पोंछ के निकाला गया.हम जैसे स्रोत-विहीन लोगों को तो अंतर्जाल का ही सहारा था और हमारे कुछ दोस्तों ने निराश नहीं किया और तुरत-फुरत  फेसबुकवा में  परोस दिया !


माफ़ी सहित-गूगल ,बिप,अमर 
सच  मानिए,हमको तो एकठो सीडी इत्ती अच्छी लगी कि पता नहीं अपन ने  उसे सुनकर कितनी बार अपनी टाँगों की ओर देखा होगा? हम ठहरे अनाड़ी,सो अपने भेजे में अमर भाई का 'कोड-वर्ड' समझ में नहीं आया!
दूसरी सीडी में आज के प्रभु-पत्रकार का दयनीय-विलाप तो हम समझ सकते हैं.अब ऊ बड़े पत्तरकार हैं तो खर्चे भी बड़े होंगे.'सीधी बात ' तो यही है कि उनके भी तो बाल-बच्चे हैं नेताओं की तरह ! हाँ,अमर  भाई के 'आसारामी-परबचन' बड़े मजेदार और कर्ण-प्रिय हैं !फिर भी,हमारे कुछ दोस्तों को यह इतना बुरा लगा कि वो जूता लिए घूम रहे हैं कि उन जैसे लोग जहाँ दिखाई दें वहीँ जूतों की 'बरखा' कर दें !हमरी तो यही सलाह है कि ऐसे निरीहों के लिए न तो अपना टीवी फोड़ो और न ही महँगा-जूता फेंको !


अब  इस तरह की फिलम पर काहे को रोक लगाई गई  थी?सुनते हैं लादेनवा ऐसी सीडी खूब देखत रहा.हो सकता है दिग्विजय बाबू ने टाँग वाली सीडी ऊपर भी पार्सल कर दी हो!आखिर मरने वाले की इच्छा का ख्याल  तो रखा ही जाता है !

इसे तो  सुनकर ही हमरा इह-लोक धन्य हुइ गवा है और आपका ?