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25 दिसंबर 2017

अम्मा !

अम्मा,तुम अब नहीं रही।
कुछ कह ली,कुछ नहीं कही।

हम होते बीमार,बैठती सिरहाने,
हाथ फिराती,बतियाती,अब करौ बतकही।

बैठ जिमाती चौके में हमको जी भरके,
परई घी की भर लाती,संग दूध-दही।

चिज्जी की जब ज़िद करते दीवार पकड़,
लइया,पट्टी कुछौ दिलाती तुम तबही।

जब तुम थीं बीमार,नहीं थे पास तुम्हारे,
टुकुर-टुकुर देख्यो आँखिन बस धार बही।

घर सूना है,दर सूना, डेहरी ख़ाली,
अम्मा ! दुःख मा ,अब को हाथ गही ?



बिछोह-21-12-2017



4 अक्टूबर 2012

हम सयाने हो गए !

बचपन में
आँगन से लेकर दुआर तक
दौड़ते थे साथ-साथ बड़ी बहन के,
दहलीज़ और डेहरी को
हमारे छोटे-छोटे पाँव
लांघते थे बेखटके
करते थे अठखेलियाँ
खेलते थे लुका-छिपी
दरवाजे की ओट में !

बहन जब पाथती थी गोबर
रहते थे साथ-साथ
वो बनाती थी कंडे
हम बिगाड़ते थे उनको
होली के आस-पास
हम दोनों मिलकर
बनाते थे होरी-बल्ला
गोबर में उकेरते
मछली,तितली,सूरज और चाँद 
आंगन में बनती रंगोली
बहन लीपती थी चौरा
और हम खोद डालते थे नहा !

सयानी बहन का 
दहलीज़ व डेहरी से
बाहर का सफ़र
अच्छा नहीं रहा ,
निकल गई वह घर से
हो गई पराई हमेशा के लिए, 
डेहरी को मैं समझता रहा 
उसका वास्तविक वारिस 
पर मैं भी तो नहीं रह पाया उसके पास 
रोजगार की तलाश में छोड़ आया
दहलीज़,डेहरी और खमसार  को
बना लिया आशियाना
दस बाई दस के बैरक को

छूट गए सारे रिश्ते
चंद कागज के पुलिंदों की खातिर
नहीं बचा पाए 
वो ऊँचा रोशनदान  
कमरे की खुली खिड़की
आँगन से लगा दालान
याद आती हैं हर रात
अम्मा की कहानियां
और अलस्सुबह
पिता की झिड़की !

अब बहन और हम
दोनों सयाने हो गए
अपनी धरती और अपनों से
दूर-दूर बो गए !

17 जून 2012

मेरा हासिल हो तुम !




तुम गए कहीं नहीं ,रूह में शामिल हो तुम,
सुर में हो,हर साज में,दर्द में शामिल हो तुम ||

हर ख़ुशी तुमसे मिली,गम को हमने कम किया,
हर भटकती नाव के ,बन गए साहिल हो तुम ||


सरहदी दीवार तोड़ी,नफरतों को कम किया,
जी उठी हर गज़ल,प्यार के काबिल हो तुम ||


दुखते हुए हर ज़ख्म में, तुमने मला मरहम,
सब चला जाये मगर,बस मेरा हासिल हो तुम ||


जब भी गुम हो जाऊँगा,दुनिया की भीड़ में,
ग़ज़लें तुम्हारी ढूँढ लेंगी,मुझमें ही शामिल हो तुम ||




आपका पाकिस्तान रेडियो को दिया गया एक लंबा साक्षात्कार  (१९७०)