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30 जुलाई 2012

नीके दिन भी आइहैं !

भ्रष्टाचारी-बेल अब ,दिन प्रति बढ़ती जाय |
साँस उखड़ती जा रही,आस गई कुम्हिलाय ।।

रहे रहनुमा नाम के,देश बेंच कर खाँय ।
जन्मभूमि की आबरू,देते रोज़ गवाँय ।।

हवा और माटी कहे,मिली तुम्हारे खून।
काहे के हो रहनुमा,झूठे सब कानून ।।

सत्ता-मद में डूबकर ,भूल गए आचार ।
नारायण के भेष में,फ़ैल रहा व्यभिचार ।।

डरता है ईमान अब,उखड़ रहे हैं पाँव ।
भ्रष्टाचार बदल रहा,रोज़ पुराने दाँव ।।

तुलसी मद किसका रहा,सदा एक-सा काल ।
आह करेगी राख सब,साखी दीनदयाल ।।

लहर चली छोटी सही,यही बनेगी ज्वार ।
नीके दिन भी आइहैं,तू मत हिम्मत हार ।।



30 दिसंबर 2011

फ्रीडम एट मिडनाइट !

लोकपाल को लेकर किया जा रहा धमाल कुछ समय के लिए थम गया है. कई लोगों को इसके ऐसे हश्र का अंदाज़ा पहले से ही था,फिर भी सत्ता पक्ष द्वारा बार-बार यह कहा जाता रहा कि उन पर ,संसद पर विश्वास नहीं किया जा रहा.ये लोग ही हैं जो बेसुरे और बेसबरे हो रहे हैं.अब जबकि आधी रात को फ़िलहाल इस जिन्न से छुटकारा मिल गया है ,काफी सारे परदे खुले ,मान्यताएं ध्वस्त हुईं व राजनीति अपने असली रंग में आई ! संसद में लोकपाल की हिमायत के बजाय अपने-अपने हितों की वकालत ज़्यादा की गई  ! आम आदमी भौचक्का होता हुआ केवल यह देखता रह गया कि उसके लिए यहाँ कौन बैठा है ? और वे सब 'फ्रीडम एट मिडनाइट' के जश्न में डूबे हुए हैं !


अन्ना जी के आन्दोलन शुरू करने के पहले दिन से ही किसी भी नेता या दल ने इसे मन से स्वीकार नहीं किया.सब पहले से ही आर टी आई से दुखी थे एक और नई मुसीबत के लिए वे तैयार नहीं थे क्योंकि यह उनकी रोज़ी-रोटी का सवाल था,इसलिए अन्ना को शुरू में ही उपेक्षित रखा गया.बाबा रामदेव से सौदेबाजी की  गई ,उनको जानबूझकर अन्ना के आगे खड़ा करने की चाल चली गई,फिर उनके साथ क्या किया गया, यह सभी जानते हैं.अन्नाजी के अगस्त-आन्दोलन ने सत्ता के गलियारों में खलबली मचा दी तो सारे दल के नेताओं ने इससे उबरने के लिए गजब की दुरभिसंधियाँ कीं ! टीम अन्ना सहित कई प्रबुद्ध लोग राजनीति की इस चाल से सशंकित थे,फिर भी उन पर भरोसा किया गया.


इस सबके बाद क्या हुआ ,देश ने खूब देखा.इस बीच केजरीवाल,किरण बेदी और यहाँ तक कि अन्ना को भी गरियाया और बदनाम किया गया.संघ और भाजपा से रिश्ते जोड़े गए. कहीं न कहीं सत्ता में बैठे लोग लोकपाल और भ्रष्टाचार के मुद्दे को भूलकर टीम अन्ना को सबक सिखाने में जुट गए.जो भी इस आन्दोलन का समर्थक बना उसे उसकी भ्रष्टाचार की चिंताओं से हटकर ,संघ के रिश्तों में लपेटने की कोशिशें होने लगीं.संघ क्या देशद्रोही और आतंकवादी संगठन है? उसके साथ जुड़े हुए लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ नहीं उठा सकते ? इस तरह मामले को दूसरा मोड़ देने के पुरजोर प्रयास किये गए.


अन्ना ने अपनी अस्वस्थता और राजनीति के दोगलेपन के चलते जब अनशन खत्म किया तब उनका उपहास  किया गया.संसद में बहस के नाम पर फूहड़ता का बोलबाला रहा.नेताओं को ऑन दि रिकॉर्ड   मज़बूत   लोकपाल चाहिए पर ऑफ दि रिकॉर्ड उसकी राह में हज़ार कांटे बो दिए गए.आम आदमी को बार-बार यह बताया जा रहा था कि लोकतंत्र में संसद सबसे ऊपर है...लोक से भी !


अन्ना जिसके लिए आन्दोलन की अगुवाई कर रहे हैं ,वह सरकार का अपना दायित्व है,पर इस पर भी माननीयों को आफत आ रही है..इस प्रजातंत्र की सारी कवायद 'परजा' ने देख ली है.अन्ना को कुछ हासिल हुआ हो या नहीं पर उन्होंने लोकपाल और भ्रष्टाचार को  नए साल का ,अगले चुनावों का अजेंडा ज़रूर बना दिया है !


मोरल ऑफ़ दा स्टोरी " तुम हमसे कितना भी होशियार  हो,पर हमारा जैसा कांईयापन  कहाँ से लाओगे ?"


........चलते-चलते

उनको हक है कि हमें ,ज़िल्लत की जिंदगी दें,
हम न बोलें,न रोयें, यूँ ही मुर्दा पड़े रहें !!

22 अगस्त 2011

अन्ना का सन्देश !

बीती रात रामलीला मैदान से लौटा हूँ .अन्ना के समर्थन में ऐसा जनसैलाब,लोगों की आकुलता और जोश व गुस्से से लबरेज़ चेहरे मैंने पहले कहीं भी और कभी भी नहीं देखे ! मैदान  से तीन-चार किलोमीटर पहले से ही गाड़ियाँ रेंग रही थीं.हर आदमी की राह एक ही थी,लोग मोटरकार की खिडकियों से लटके हुए,मोटर साइकिलों पर 'धूम' मचाते हुए  'अन्ना-अन्ना' चीख रहे थे,ऐसा लगता था जैसे हर रास्ता रामलीला मैदान की तरफ़ ही जा रहा हो!

सभी लोग बिल्ले,झंडे,टोपियाँ ,बैनर ,टी-शर्ट कुछ न कुछ लिए थे या खरीद रहे थे.अन्ना के नाम पर ऐसे सामानों को लोग बहुत ऊँची कीमत पर बेच रहे थे,फिर भी लोग ले रहे थे.इस जन-समुद्र को कोई प्रायोजित कहे,एक ख़ास वर्ग या 'क्लास' का नाम दे,खाए,पिए,अघाए हुए लोगों का समूह कहे ,गैर-दलित ,सवर्ण या धार्मिक कहे यह उसकी मर्ज़ी है,पर वहाँ जानेवाला केवल अन्नामय है,उसकी सिर्फ एक पहचान है!हाँ, कुछ लोग ज़रूर इसी बहाने निजी हित साध रहे हैं,लेकिन ऐसे लोग भीड़ का हिस्सा तो हो सकते हैं,अपने मक़सद में कामयाब नहीं !

मैदान के बाहर और भीतर लोग नाच-गा रहे थे,पूरा मैदान ठसाठस था!पुलिसवालों की संख्या बहुत थी ,पर वे इस भीड़ के आगे केवल दर्शक भर थे.केजरीवाल जी एक सन्देश दे रहे थे कि मीडिया में  कुछ ख़बरें ऐसी आ रही हैं कि  सरकार से हम समझौते के करीब हैं पर हम यह बता दें कि उसने हमारी छोटी से छोटी माँग भी नहीं मानी  है.इस पर भीड़ ने ज़ोरदार 'हूट' किया और सरकार के लिए 'शेम-शेम' के नारे लगाए !अन्दर का माहौल बहुत उत्साहित और ऊर्जित था.इस जन-समर्थन को अगर 'क्रान्ति' नहीं कहेंगे तो किस तरह की क्रान्ति की प्रतीक्षा की जा रही है?

सरकार चलाने वाले शायद इस समय अवकाश पर चले गए हैं.अप्रैल से ही अन्ना को लेकर गलत कदम उठाये गए और इस बार भी वही किया जा रहा है! सबसे बड़ी बात यह है कि यह सब जानबूझकर किया जा रहा है.बाबा रामदेव को ज़रुरत से ज़्यादा पहले भाव दिया,फिर अत्याचार किया.अन्ना की बात अप्रैल में बड़े दबाव के आगे मानी और अब फिर अपने ऊपर  उससे ज़्यादा दबाव का इंतज़ार कर रही है! सरकार मनरेगा और आरटीआई का श्रेय लेकर 'जनलोकपाल' को नकार कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है.अभी भी उसके प्रबंधक गहरी नींद में हैं,पता नहीं जब उनके 'दीदे' खुलेंगे,तब तक कुछ बचेगा भी या नहीं !शायद ऐसे ही मौक़े  के लिए कहा गया है,'सब कुछ लुटाके होश में आये तो क्या किया?'

फिलहाल यह मुद्दा अब जनलोकपाल से कहीं आगे जन-अवहेलना,सत्तामद व घोर संवेदनहीनता का बन चुका है ! इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष सभी कटघरे में हैं!

हम तो यही धुन गा रहे हैं:

'अन्ना ने भेजा सन्देश ! जाग गया है सारा देश !'





15 अगस्त 2011

शर्तों पर आज़ादी !

हम आज़ाद हैं
बेशर्मी से भ्रष्टाचार करने को,
कानून को अपनी उँगलियों में नचाने को,
दौलत का अम्बार बेशुमार लगाने को,
स्याह रास्तों पर सफ़ेद कपड़ों में चलने को,
चौंसठ सालों से
बिना शर्त ,बिना भय के यही करते आ रहे हैं हम!
नहीं आज़ाद हैं हम
शान्तिपूर्ण  अनशन के लिए,
भ्रष्टाचार से पंगा लेने के लिए,
चोर को चोर कहने के लिए,
अपनी पहचान बनाने के लिए,
अपनी आवाज़ उठाने के लिए,
ये सब होगा ,शर्तों के अधीन,
बीस या तीस जितनी चाहिए शर्तें चस्पा की जाएँगी,
हर हाल में हम हावी रहेंगे,
इसी की आज़ादी हमने दी है देश को,
राशन लगाकर देंगे हम आज़ादी,
पर,इस देश में होगा वही,जो हम चाहेंगे !
'हम आज़ाद हैं' इसमें 'हम' केवल हमारा है,
किसी और ने माना है तो यह उसकी 'आज़ादी' है !
असली आज़ादी तो हमने पा ली है,
अन्ना ,मुट्ठी देखो,
हमारी भरी,तुम्हारी खाली है !