9 जुलाई 2009

आओ आओ प्यार करें !

हाल ही में जबसे दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में समलैंगिकों को कानूनी मान्यता प्रदान की है ,देश भर में एक अलग ही बहस चल पड़ी है। लोकतान्त्रिक देश में किसी विषय पर बहस होना बुरा नहीं है ,पर उस बहस का उद्देश्य ही बिल्कुल बदल जाता है जब यह मात्र व्यावसायिक हितों से जुड़ी हो। मीडिया को बैठे-बिठाये कोई मसाला मिलता है और वह उसमें मिर्च का तड़का देकर एक पक्ष बन जाता है।

'गे' की अवधारणा को भारतीय समाज में आत्मसात करने की वकालत करने वाले इसमें ' नई सोच' , 'वयस्कता' व 'आपसी सहमति' को अपना आधार बना रहे हैं पर क्या इसी कसौटी से 'बहु विवाह','पर-पत्नी गमन' जैसी चीज़ों को भी जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है? माना कि इस 'मनोवृत्ति ' से पीड़ित लोगों का भी मानवाधिकार है पर खुले-आम ऐसी व्यवस्था को 'लाइसेंस' देने से हमारे बीमार होते जा रहे समाज को एक और ज़हरीला इंजेक्शन चुभाना है !जहाँ तक बात है , कानूनी हक देने कि तो न जाने ऐसे कितने सारे हक , जो समाज को पहले से मिले हुए हैं, शायद ही लागू हो पाते हैं !

हम आधुनिकता के नाम पर यूरोप और अमरीका की नक़ल तो बहुत करते हैं पर वैसी 'विकसित' सोच ला पाते हैं क्या?पहनावे और कला के नाम पर टीवी और अख़बारों में अश्लीलता भरी पड़ी है, और अब तो खुले-आम बाज़ारों में ऐसे दृश्य देखे जा सकते हैं, जहाँ लड़कियाँ अधनंगे बदन घूमती हैं,सिगरेट व शराब पीती हैं। इन बातो को पुरूष-प्रधान समाज की मानसिकता कहकर नकारा जा सकता है ,पर दिन-प्रतिदिन इससे होनेवाले परिणामों पर भी गौर करना ज़रूरी है। एक पुरूष का बिगड़ना व्यक्तिगत प्रभाव छोड़ता है ,पर एक नारी का पतन पूरे परिवार को तबाह कर सकता है।

इसलिए 'गे' समर्थकों से यही कहना है कि वे अपनी खुशी ढूँढें मगर सरे-आम भोंडी हरकतें करके 'अल्ट्रा-आधुनिक' न बनें !

21 जून 2009

मायावती की नौटंकी !

आज की राजनीति में अपनी 'छवि' को चमकाने का सबसे सरल ,सस्ता तरीका है कि पहले से स्थापित किसी महान पुरूष को जी भर के गरिया दो या किसी बने-बनाए नियम के प्रतिकूल बयानबाजी कर दो । मायावती जैसे लोग इसी श्रेणी में आते हैं । इन्होंने अपनी राजनीतिक पारी ही गाँधीजी को भद्दी गाली देकर शुरू की थी और अब जब हालिया चुनावों के बाद सत्ता में पकड़ कमज़ोर होती दिखी तो वही 'फार्मूला' अपनाया है।

 मायावती जी ने उवाचा है कि गाँधीजी 'नौटंकी-बाज़ 'थे । अव्वल तो इस तरह की टिप्पणी से गाँधीजी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा पर जब यह बात कहने वाला संवैधानिक पद पर बैठा हुआ एक व्यक्ति कहता है तो चिंता होती है कि हमारा संविधान इतना लुंज-पुंज क्यों है कि समग्र रूप से मान्य ऐसे व्यक्तित्व पर कोई अपने निज़ी लाभ के लिए करोड़ों लोगों की भावना को ठेस पहुँचा कर भी ठठा कर हँसता है और वह चुपचाप देखता-सुनता रहता है?

दर-असल जिन लोगों के पास न तो अपनी कोई नीतियाँ हैं न उनमें आत्म-विश्वास है तो वह इसी तरह के 'शार्ट -कट' का रास्ता अपनाते हैं पर जनता भी अब ऐसे लोगों को 'शार्ट' करना सीख गई है। मायावती कितनी बड़ी 'नौटंकी-बाज़' हैं यह अब किसी से छुपा नही रहा।वह पूरी तरह से गुण्डा ,माफिया ,हफ्ता-वसूली करने वाले को प्रश्रय देने वाली ज़मात की नेता बनकर उभरी हैं। महात्मा गाँधी की योग्यता व उनके लिए वकालत करने की कोई ज़रूरत नही है । उनके योगदान का मूल्यांकन देश ही नहीं सम्पूर्ण विश्व कर रहा है,ऐसे में ऐसी ओछी टिप्पणियों से उनके क़द पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

यह बात और है कि मायावती का 'गाँधी' उपनाम ने जीना हराम कर रखा है और ऐसे में वे हर गाँधी पर अपना नज़ला गिराना चाहती हैं ,पर इससे क्या उनके पराभव और पतन की रफ़्तार कम हो जायेगी?

27 मई 2009

खुला ख़त आडवाणी जी के नाम !

आदरणीय आडवाणी जी !
मैं पहली बार किसी राजनेता और उससे भी ख़ास , भाजपा नेता से इस तरह सरे-आम रूबरू हूँ। अभी कुछ दिन पहले मुझे एक जानकारी मिली कि हालिया दिनों में 'गूगल -सर्च' में आप अव्वल नंबर पर रहे तो लगा कि आख़िर माज़रा क्या है? दर-असल जिस दिन से वह मुआ 'कमज़ोर ', प्रधानमंत्री बन गया ,आपके तो दर्शन ही दुर्लभ हो गए। न तो किसी चैनल में और न ही पार्टी की प्रेस-कांफ्रेंस में आपके दीदार हो रहे थे,सो इसीलिए भाईलोगों को चिंता होने लगी कि आप कहीं अंतर्ध्यान तो नहीं हो गए !लोग 'गूगल' पे आपकी 'लोकेशन' पता कर रहे थे ,जीपीएस का सहारा ले रहे थे ,गोया आप कोई खोने वाली चीज़ हो!
बहर-हाल ,यह पत्र मैं आपको इसलिए लिख रहा हूँ कि आपने बहुत अच्छी लड़ाई लड़ी और यदि इसमें जीत नहीं मिली तो निराश होने की ज़रूरत नही है। इस बुढ़ापे में भी आप जिम जाते थे,रोज़ कई रैलियां करते थे ,वेब-साईट पर भी विराजमान थे पर यह जो हिंदुस्तान की पब्लिक है न यह कुछ भी तो नहीं सोचती। जैसा कि आपने बता ही रखा था कि आपका यह आख़िरी चुनाव है और इतिहास में प्रधानमंत्रियों की सूची में अपना नाम देखने की आपकी ज़ोरदार ललक है,पर उस इच्छा पर पलीता ही लग गया और सच बताएं यह आपके अलावा सबको पता था की ऐसा ही होने वाला है।
आपकी पार्टी में आपकी छवि एक 'हार्ड-कोर' नेता की रही है ,यह अलग बात है कि पिछले कुछ समय से लगातार आप बदलने की प्रक्रिया में थे पर यह नरेन्द्र मोदी और वरुण गाँधी जैसे लोग आपके दुश्मन निकले। इन लोगों ने आपके सत्ता में आने से पहले ही 'हुआ-हुआ' करके सारी योजना बर्बाद कर दी। आपको डुबोने में कारगिल,कंधार,जिन्ना और गोधरा ने अहम् भूमिका निभाई । थोड़ा सा धक्का 'बाल ठाकरे एंड संस ' ने भी दिया ,आप चाहे माने या न माने!
लोग अभी तक आपकी पार्टी का 'विधवा-विलाप' भी नहीं भूले थे जब सन् 2004 के चुनावों के बाद सोनिया गाँधी के प्रधानमंत्री पद को लेकर हो रहा था । उमा भारती और सुषमा स्वराज जब छाती कूट-कूट कर कह रही थी कि वे सिर मुंडवा लेगी या सन्यास ले लेगीं। पता नहीं, किसकी हाय किसको लगी पर देखो वे दोनों आज कहाँ हैं,सोनिया कहाँ हैं और आपका 'मिशन' कहाँ है?
इतने ख़राब परिणाम आने के बाद भी पार्टी आपको आराम देने के मूड में नहीं है। आपने तो इच्छा जताई थी कि आपको आराम दिया जाए पर लगता है पार्टी भी यह सोचे बैठी है कि इसके ताबूत में आखिरी कील आप ही ठोंके!
जहाँ आपकी प्रतिद्वंद्वी पार्टी के पास राहुल का 'यूथ -विज़न ' है वहीं भाजपा थके और चुके हुए लोगों के साथ 2014 का मुकाबला करने जा रही है।
आप से इस पत्र के माध्यम से गुज़ारिश है कि हिन्दुस्तान की असली नब्ज़ को पहचाने ,कुछ कठोर निर्णय लें और पार्टी में सुधारवादी ,अहिंसक तथा सहिष्णुतावादी ताकतों को आगे आने दें । किसी भी पार्टी में अनुभव के साथ अभिनव(युवा) का मिश्रण अपरिहार्य है।
उम्मीद करता हूँ कि अब देश की जनता आपको 'गूगल' के ज़रिये सर्च नहीं करेगी,वरन आप स्वयं जनता तक पहुँचेंगे ।

24 मई 2009

उत्तर प्रदेश का संदेश !

पन्द्रहवीं लोकसभा के परिणाम आने के साथ ही सभी दलों के द्वारा मंथन-चिंतन शुरू हो चुका है। जनता ने अनपेक्षित रूप से इन चुनावों में जाति - धर्म की राजनीति करने वालों को करारा ज़वाब दिया है ,यह बात और है कि ऐसे दल इससे कुछ सबक लेते हैं या नहीं ?
उत्तर प्रदेश करीब बीस सालों से किसी सही राजनैतिक नेतृत्व  की तलाश में है। अब इतने दिनों बाद प्रदेश में छाया कुहरा छँट रहा है। कांग्रेस को सीटें भले ही इक्कीस मिली हों पर वहाँ की बयार बदल रही है, जनता की प्राथमिकतायें बदल रही हैं ,यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। सपा और बसपा जहाँ सन्निपात की स्थिति में हैं वहीं भाजपा अपने पुराने दिनों की ओर लौटने को अभिशप्त है। नतीज़े आने के बाद से बहिनजी उखड़ी हुई हैं और इसका खामियाज़ा प्रशासनिक मशीनरी उठा रही है क्योंकि उसने बसपा के एजेंट की तरह अपनी भूमिका नहीं निभाई।बसपा ने अपनी हार के लिए ईमानदारी से सोचना भी उचित नहीं समझा। उसकी 'सोशल-इंजीनियरिंग' में बहुत बड़ा सुराख़ हो चुका है, जो फिलवक्त उसे दिखाई नहीं दे रहा है।
सपा एक आदमी के मैनेजमेंट का शिकार हो रही है जो पार्टी को मैनेज कम डैमेज ज़्यादा कर रहा है। मुलायम सिंह की कमज़ोरी है कि वह उसे चाहकर भी नहीं छोड़ सकते भले ही समाजवाद की बलि चढ़ जाए क्योंकि आज की राजनीति में पूँजीवाद ही सब कुछ है। प्रदेश की जनता अभी मुलायम का पिछला शासन नहीं भूली है जब पुलिस और लेखपालों की भर्ती में खुले-आम पैसों का खेल खेला गया था। इसी ऊब के बाद मैडम मायावती आई पर परिणाम सबके सामने है।
भाजपा ने तो चुनाव ही ऊहापोह में लड़ा । उसे कभी तो मन्दिर याद आ जाता है  कभी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का सहारा , पर  जनता ने इस तरह जाति और धर्म के खेल से अपने को अलग कर सबको आइना दिखा दिया है । अब पूरे पॉँच साल पड़े हैं आत्म-मंथन के लिए ।
कांग्रेस को भी खुशफ़हमी नहीं पालनी चाहिए । जिस उम्मीद और जोश के रथ पर जनता ने उसे बिठाया है, अगर उसने आगे सही 'फालो-अप ' नहीं किया तो उसके राहुल बाबा का 'मिशन- उत्तरप्रदेश' सीधा ज़मीन पर आ जाएगा।