18 अगस्त 2010

शिक्षण-व्यवस्था में ख़ामियाँ !

हर वर्ष सरकारी आंकड़े यह बता रहे हैं कि देश में शिक्षा का स्तर लगातार बढ़ रहा है,पर क्या ज़मीनी हक़ीक़त यही है ?अनौपचारिक शिक्षा को तो छोड़िये,हालाँकि उसके नाम पैसों का बंदर-बाँट सबसे ज़्यादा हो रहा है, औपचारिक शिक्षा की भी नींव हिलाने का पूरा इंतज़ाम किया जा चुका है !


सरकारी विद्यालयों में आधार-भूत सुविधाओं की अभी-भी कमी है,शिक्षक पर्याप्त नहीं है,फिर भी इन कमियों को थोड़ा दर-किनार किया जा सकता है,पर जो सबसे चिंताजनक पहलू उभर कर आ रहा है कि आज ऐसी व्यवस्था लाद दी गयी है कि विद्यालयों का माहौल पढ़ाई के अनुकूल नहीं रह गया है. छात्रों में अनुशासन नाम की कोई चीज़ नहीं रह गयी है, ऐसे में ७०-८० की औसत छात्र-संख्या वाली कक्षा को कोई जादूगर ही नियंत्रित कर सकता है. उनमें गुरु के प्रति आदर भाव तो कब का ख़त्म हो चुका है,पर अब सामान्य शिष्टाचार भी दुर्लभ हो रहा है.
कई ऐसे मौके आते हैं जब छात्र शिक्षक के सामने अशिष्ट आचरण करता है और शिक्षक नए नियमों का पालन करने को मज़बूर होता है,जहाँ उसके लिए यह ताक़ीद की गयी है कि वह उन्हें डांट तक नहीं सकता !

आज विद्यालयों में सरकारी अनुदान की भरमार की जा रही है. खाना तो दिया ही जा रहा है वर्दी और पुस्तकों के अलावा अन्य कई तरह से नकद राशि दी जा रही है,बस नहीं दी जा रही है शिक्षा, जिसके लिए वो यहाँ आते हैं. शिक्षक को यूनिट-टेस्ट व दूसरे और टेस्ट बनाने और जाँचने में उलझा दिया गया है और अन्य कार्यों की तो बात ही न करें. कुल मिलाकर 'मास्टरजी' को बाबू बनाया जा रहा है.


छात्रों में तो कई दोष हैं ,पर वास्तव में वे असली दोषी नहीं हैं क्योंकि उन्हें नहीं पता कि जो वो कर रहे हैं वह ग़लत है और यही बात शिक्षक उन्हें बता नहीं पा रहा है . नैतिक-शिक्षा का तो अता-पता है ही नहीं , सामान्य शिक्षा की ही हालत ख़राब है . इस सबके लिए सरकार,मीडिया,अभिभावक ,प्रशासक और शिक्षक सभी सामूहिक रूप से ज़िम्मेदार हैं !

5 अगस्त 2010

अपना-अपना खेल !

खेल हुए चालू नहीं,लगा निकलने तेल,
अपनी-अपनी कुप्पी में ,भरे ले रहें तेल !

ऐसा मौका हाथ लगा है,बड़े समय के बाद,
नेता,अफ़सर ,चोर सब , होंगे जब आबाद !

चूना,मिट्टी,ट्रेड-मिल ,सभी जगह है छाप ,
सारे ठेके इन्हें मिलेंगे, कहीं नहीं हम,आप !

पदक मिलें ना मिलें सही,हो जायेंगे खेल,
चाहे कितना ज़ोर लगा लो,असल खिलाड़ी फ़ेल!

'कॉमन वेल्थ' से हैं उम्मीदें,सबकी अपनी-अपनी,
जिसकी जितनी बाहें लम्बी, उसकी उतनी मनी !

28 जून 2010

कहाँ है महँगाई ?

इस समय देश भर का मीडिया इन ख़बरों से अटा पड़ा है कि महँगाई मारे डाल रही है ,पर अपुन की समझ में नहीं आ रहा है कि ये महँगाई आख़िर है कहाँ ?यह बात तब और साफ़ हो जाती है जब सरकार का कोई पढ़ा-लिखा (खाया-अघाया) बाबू अख़बारों में बक़ायदा विज्ञापन छपवाकर साबित कर देता है कि अभी तो महँगाई कोसों दूर है!अज़ी ज़नाब,पाकिस्तान,लंका,भूटान,बांग्लादेश आदि को देखिये ,उनसे तो हम अभी बालिश्त भर नीचे हैं! यह तो ग़नीमत है कि उस बाबू ने हत्या,आतंक,लूट-पाट और भ्रष्टाचार के आंकड़े नहीं दिखाए नहीं तो हम उनमें भी अव्वल निकलते !
भई, पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बाज़ार-भरोसे सरकार ने अभी किया है,पर यह देश तो पता नहीं कब से बाज़ार के ही भरोसे चल रहा है!आम आदमी की इस बाज़ार में एक ख़रीदार की हैसियत न होकर बेकार और खोटे सिक्के की तरह रह गयी है और उसे चुनाव के पहले तालियाँ पीटने और चुनाव बाद पेट बजाने का सम्मान-जनक काम मिला हुआ है ।
ख़र्चे तो हमारे माननीयों के होते हैं,मेहमान भी उन्हीं के होते है और जितने सारे पकवान हैं उनमें उन्हीं का नाम लिखा है,इसलिए यदि वे अपना 'मेहनताना' बढ़ाने की बात करते हैं तो यह बिलकुल ज़ायज है और अपनी सरकार अब इतनी भी निर्दयी नहीं है कि उनकी फ़रियाद न सुने !
रही बात 'कामनवेल्थ' के खेलों को लेकर हल्ला मचाने की,तो अपना देश 'अतिथि देवो भव' की परिपाटी पर चल रहा है और इसके लिए हम चाहे कंगाल हो जाएँ पर हमारे मेहमानों को लगना चाहिए कि हम भूखे-नंगे नहीं हैं ,इसीलिये दस दिनों के मेहमानों के लिए पूरी तिज़ोरी खोल दी गयी है,और जो यहाँ हमेशा रहते हैं उनके लिए दरी झाड़ दी गयी है!

इसलिए,महँगाई हमारी सोच में है,वास्तव में ऐसा है नहीं.

17 मई 2010

प्रदूषण और हम !


कैसा सुन्दर घर-आँगन था,गली-मोहल्ले सारे,
ठंडी-ठंडी हवा सुहानी ,प्यार से हमें दुलारे।

फूल महकते वन-उपवन में,अपनी बाँह पसारे
पशु -पक्षी
चहके फिरते,बुझते मन के अंगारे।


पर्यावरण-प्रदूषण जबसे हुआ है इस दुनिया में,
घुट-घुट कर सब साँस ले रहे, अपनी-अपनी कुटिया में।


घर-बाहर सब धुआँ भर गया , सड़कों में,गलियों में,
फूल-से नाज़ुक बच्चे बदले मुरझाई कलियों में।


वन-जंगल सब पेड़ कट रहे ,वीरानी सी छाई,
फ़सल उग रही नित भवनों की ,प्रकृति मौत को नियराई।


अब भी वक़्त संभल जाएँ हम , पर्यावरण शुद्ध कर लें,
ज़हरीले वायु-प्रदूषण से दिल्ली-प्रदेश मुक्त कर लें।।

विशेष-दिल्ली नगर निगम के शिक्षा -विभाग द्वारा पुरस्कृत (१९९६)
रचना काल-१२-१२-१९९६