7 नवंबर 2026

ग़ज़ल

 आदमी काफ़ी भला है 

काटता सीधा गला है।


आइना भी फेरता मुँह 

आसमानी वो बला है ।।


जो देखता लिखता वही 

डर नहीं है,बावला है ?


राम की कुटिया लुटी है 

नदी में दीपक जला है।


सुरमई आँखों में पानी 

उसे अपनों ने छला है।


- संतोष त्रिवेदी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें