आदमी काफ़ी भला है
काटता सीधा गला है।
आइना भी फेरता मुँह
आसमानी वो बला है ।।
जो देखता लिखता वही
डर नहीं है,बावला है ?
राम की कुटिया लुटी है
नदी में दीपक जला है।
सुरमई आँखों में पानी
उसे अपनों ने छला है।
- संतोष त्रिवेदी
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