6 अक्टूबर 2011

स्टीव जॉब्स : तकनीक का जादूगर !

अभी थोड़ी देर पहले खबर आई कि दुनिया को अपने  अद्भुत उत्पाद से चमत्कृत करने वाले स्टीव जॉब्स नहीं रहे.हिंदुस्तान के लोग उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते पर 'एप्पल' की वज़ह से जितना जानते हैं उससे ज्यादा की शायद ज़रुरत भी नहीं है.

'एप्पल' के मैकबुक,आइ-पॉड  ,आई-पैड और आई फ़ोन'  की पहुँच से आम भारतीय भले बाहर रहा हो लेकिन इन सभी के प्रति दीवानगी सबमें रही है.'एप्पल' के स्टोर अब भारत में भी कई जगह  हैं और इन्हें न ले पाने वाले भी इसके चमत्कारी और जादुई अनुभव के गवाह हैं.इन उत्पादों में लगातार बाज़ार के दबाव के चलते समय-समय पर ज़रूरी बदलाव हुए  हैं ,कीमतें भी कुछ कम हुई हैं ! नई पीढ़ी इन्हें हाथोंहाथ ले रही है.इन सभी उत्पादों का अनुभव बिलकुल परीलोक में विचरण करने जैसा लगता है.जिस भी तकनीक-पसंद ने एप्पल का कोई उत्पाद एक बार देख लिया,अनुभव कर लिया वह देर-सबेर उसे ज़रूर लेगा,ऐसी ललक पैदा करने वाले थे स्टीव जॉब्स  !

स्टीव अपने स्वास्थ्य को देखते हुए थोड़े दिन पहले ही कंपनी के जिम्मेदार पद से मुक्त हो गए थे,जिससे यह भी पता चलता है कि उनके लिए प्राथमिकता में केवल 'एप्पल' का उनका सुनहरा-प्रोजेक्ट था.उन्होंने अपने रहते एप्पल में  लगातार आवश्यक परिवर्तन किये और उसे अपनी तरह का अनूठा ब्रांड बना दिया.ज्यादा कीमतों की आलोचना पर वो कहते थे कि उनके 'टारगेट' में आम लोग नहीं बल्कि ख़ास लोग हैं ! केवल बिक्री बढ़ाना ही उनका उद्देश्य नहीं था.


आज उनके न रहने पर तकनीकी क्षेत्र का एक महारथी और जादूगर चला गया.उनको हार्दिक श्रद्धांजलि !

स्टीव के मित्र उनके बारे में अब क्या कहते हैं ,देखें यह लिंक !

उनके  बारे में और जानें हिंदी विकिपीडिया से :


स्टीव पॉल "स्टीव" जाब्स (जन्म फरवरी २४ ,१९५५) एक अमेरिकी बिजनेस टाईकून और आविष्कारक हैं.
वे एप्पल इंक के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी थे. अगस्त २०११ में उन्होने इस पद से त्यागपत्र
दे दिया। जाब्स पिक्सर एनीमेशन स्टूडियोज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी रह चुके हैं। सन २००६ में वह
दी वाल्ट डिज्नी कम्पनी के निदेशक मंडल के सदस्य भी रह चुके हैं, जिसके बाद डिज्नी ने पिक्सर का अधिग्रहण
कर लिया था. १९९५ में आई फिल्म टॉय स्टोरी में उन्होंने बतौर कार्यकारी निर्माता काम किया था.

परिचय

कंप्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल फोन बनानी वाली कंपनी एपल के भूतपूर्व सीईओ और
जाने-माने अमेरिकी उद्योगपति स्टीव जॉब्स ने संघर्ष करके जीवन में यह मुकाम हासिल किया है। कैलिफोर्निया के सेन फ्रांसिस्को में पैदा हुए स्टीव को पाउल और कालरा जॉब्स ने गोद लिया था। जॉब्स ने कैलिफोर्निया में ही पढ़ाई की। उस समय उनके पास ज्यादा पैसे नहीं होते थे और वे अपनी इस आर्थिक परेशानी को दूर करने के लिए गर्मियों की छुट्टियों में काम किया करते थे। वे लम्बी बीमारी के बाद ०५/१०/२०११ को हमारे बीच नहीं रहे !
1972 में जॉब्स ने पोर्टलैंड के रीड कॉलेज से ग्रेजुएशन की। पढ़ाई के दौरान उनको अपने दोस्त के कमरे में जमीन पर सोना पड़ा। वे कोक की बोतल बेचकर खाने के लिए पैसे जुटाते थे और पास ही के कृष्ण मंदिर से सप्ताह में एक बार मिलने वाला मुफ्त भोजन भी करते थे। आज जॉब्स के पास करीब 5.1 मिलियन डॉलर की संपत्ति है और वे अमेरिका के 43वें सबसे धनी व्यक्ति थे। जॉब्स को कंप्यूटर से लेकर पार्टेबल डिवाइसिस के 230 से अधिक एप्लिकेशन के इनवेंटर या को-इनवेंटर के तौर पर जाना जाता है।

साभार :विकिपीडिया





3 अक्टूबर 2011

कुछ मन से ,कुछ बेमन से !

कई दिनों से मन उचाट-सा है.विषय बहुत हैं लिखने को पर लगता है जो 'तड़प' है उसमें कहीं कुछ कमी आ गयी है.ऐसा क्यों होता है अब? पहले पढने से मन विरत हुआ और अब लिखने से ! यह निरा काहिलपना नहीं तो क्या है ? किताबें लेना ,उन्हें निहारना और खरीदना मुझे अब भी अच्छा लगता है,पर उन किताबों में भी उसी तरह धूल ठहरी हुई है जैसे मेरे दिमाग में !

फिर भी ,प्रवीण पाण्डेय की यह पोस्ट   पढ़कर करीब दस साल बाद दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी गया और  पुनः सदस्य बना.अज्ञेयजी की आत्मकथा 'शेखर एक जीवनी' पढने की इच्छा बहुत दिनों से थी,पर वह उस समय वहाँ भी न मिली.अचानक हिंदी के प्रसिद्द आलोचक राम विलास शर्मा की आत्मकथा 'अपनी धरती अपने लोग' दिखाई दी और मैंने उसे तुरत लपक लिया .यह तीन खण्डों में है जिसका शुरूआती भाग अभी पढ़ रहा हूँ.शर्माजी हमारे बैसवारा के ही रहने वाले थे ,इसलिए इसमें अतिरिक्त दिलचस्पी हुई.वास्तव में बेहद रोचक और देसज-शब्दों की प्रचुरता लिए हुए यह पुस्तक बहुत रुचिकर लग रही है .इसके बारे में फिर कभी विस्तार से !


इस बीच मेरे परम सुह्रद डॉ.अरविन्द मिश्र  कई बार मुझे नई पोस्ट के लिए प्रेरित कर रहे थे,मुझे अपना लेखकीय-धर्म याद दिला रहे थे,सो अपने मन को सान पर चढ़ाकर पैना करने की कोशिश में जुट गया ! पुरानी डायरियों के पन्ने उलटे,तो कई रचनाएँ  आज मुझे बड़ी हलकी लगीं,फिर भी झाड़-पोंछकर जो बच रहा ,वह आपके  रूबरू है !


                                          आ  जाओ तुम 

साँस आखिरी,आस आख़िरी,
आ  जाओ तुम ,सलाम आख़िरी !


ये निगाहें,तुम्हें ही ताकतीं,
स्याह ज़िन्दगी में,रोशनी -सी झांकती,
थक गया हूँ मैं,इंतज़ार में,
पी रहा हूँ ये, जाम आख़िरी !!

मिल नहीं सके, तो ना सही,
तमन्ना भी अब,और ना रही,
तन की नहीं,प्यास नज़र की,
बुझा जाओ तुम,है काम आख़िरी !!

ज़ुदा जो रहे ,अब तलक मुझसे,
कुछ भी नहीं  हैं,शिकवे-गिले तुमसे,
कर रहा हूँ अर्ज़,तसलीम तो करो,
मान जाओ तुम ,है  कलाम  आख़िरी  !!

साँस  आखिरी ,आस आख़िरी,
आ जाओ तुम ,सलाम आख़िरी !!


रचना काल : १०/१०/१९८९  ,फतेहपुर 


अगर यह बेमतलब लगे तो हमारी पसंद की यह ग़ज़ल तो सुन ही लो ,मुन्नी बेग़म की दिलकश आवाज़ में !







22 सितंबर 2011

हमने तो बस गरल पिया है !

तुमने जो संताप दिए हैं,
हमने तो चुपचाप सहे हैं,
जब हमने पत्थर खाए हैं,
तुमने केवल रास किया है,
हमने तो बस गरल पिया है  !१!


मुझे नहीं दुःख ,नहीं मिले तुम,
आत्मा के भी होंठ सिले तुम,
मौन तुम्हारा तुम्हें डसेगा,
तुमने केवल हास किया है,
हमने तो बस गरल पिया है !२!


मैं तो वैसे भी जी लूँगा,
अमिय समझकर विष पी लूँगा,
तुमने जो विष-बेल उगाई,
जग को भी संत्रास दिया है,
हमने तो बस गरल पिया है  !३!


मैं दीप जलाता फिरता हूँ,
दुःख नहीं कि मैं भी जलता हूँ,
देखो,समय बनेगा  साक्षी,
तुमने  कलुषित  इतिहास  किया है,
हमने तो बस गरल पिया है  !४!


हमको  गैरों से आस न थी,
तुमसे भी कोई फांस न थी, 
पर स्वांग देखने के आदी तुम,
कैसा  ये खेल ? निराश किया है  !
हमने तो बस गरल पिया है  !५!


तुमने  झील के उथलेपन में 
ही अपने को डुबो दिया,
यह अथाह  जलराशि छोड़कर 
अपने सुख का ह्रास किया है,
हमने तो बस गरल पिया है  !६ !

20 सितंबर 2011

न जाओ सैंया,छुड़ा के बैंया !

आजकल पितर-पक्ष चल  रहे हैं !हिन्दू मान्यताओं के अनुसार कुछ बढ़िया या अच्छे काम इस समय नहीं किये जा सकते ! पर,ब्लॉग-जगत में कुछ ऐसा होने की घनघोर आशंका हो गयी है.इसलिए हम सभी को ऐसा न होने देने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देना चाहिए !हम तो ब्लॉगिंग में रस और मज़ा लेने आये थे,वह मिलना शुरू ही हुआ था कि इसका मुख्य-तत्व 'मसखरापन'(नौटंकी से तौबा) गायब होने की मुनादी पीट दी गयी है !

ब्लॉग-लेखन में उस समय भयानक कोहराम मच गया जब मसखरेपन ने इस ज़मात से बाहर होने की घोषणा कर दी.जितने भी गंभीर-टाइप के ब्लॉगर हैं उनको तो साँप ही सूँघ गया ! अब लिखने-लिखाने के बाद फ़ुरसत के क्षणों को हम सब लोग कैसे समायोजित करेंगे,यह परेशान करने वाला सवाल उठ खड़ा  हुआ है.

मसखरेपन का सबसे बड़ा कष्ट टीपों को लेकर है.उसका मानना  है कि टीपें इतनी मसखरी और मारक हो गयी हैं कि अब हमारे ऊपर ही भारी पड़ने लगी हैं.अगर ऐसे ही चलता रहा तो पोस्ट में जो 'लौह-तत्व' है ,वह भी बर्फ की  मानिंद ठंडा और कुंद हो जायेगा !इस सबसे बचने के लिए हालाँकि उसने शुरूआती और अहतियाती कदम उठा रखे हैं फिर भी मुँहनोचवा-क़िस्म के लोग अपनी आदत से बाज़ नहीं आ रहे हैं.लौह-तत्व की संरक्षा के लिए बकायदा टीपों को छानने का इंतज़ाम है.इसमें केवल पारिवारिक-सदस्य अपना प्यार ,मनुहार उड़ेल सकते हैं.और हाँ,ज़रुरत के अनुसार पिता,माँ,और भाई की संख्या घटाई-बढ़ाई जा सकती है !


अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे मसखरेपन ने मचान पर फिर चढ़ाई कर दी है,'सबते कठिन जाति अवमाना' का भी टोटका किया गया  है !उस पर विदेशी-आक्रमण भी लगातार हो रहा है तो कोई उसे छीलने में जोर का अट्टहास लगा रहा है,यह  हम सबके लिए भी चिंता का सबब होना चाहिए.आखिर जब मसखरेपन का तत्व ही नहीं अस्तित्व में होगा तो हम सिरफिरे और नाकारा लोग अपनी टीपों में धार कैसे ला पाएँगे ?


अभी भी समय है.जिस तरह राजनीति में जबसे 'लालू-तत्व' गायब हुआ है,पत्रकारों और व्यंग्यकारों की कलम   निष्प्राण हो चुकी है,उससे कम गहरा संकट नहीं है इस मसखरेपन का जाना.इसलिए इन बुरे दिनों में इस तत्व को तिलांजलि देने पर हम क्यों तुले हुए हैं ? बार-बार ऊपर  चढ़ने से वह मचान या टंकी जो भी है,धंस जाए ,उसके पहले ही  इस अद्भुत व अनमोल तत्व को बचा लेना चाहिए ! क्या आप तैयार हैं ?