17 मई 2010

प्रदूषण और हम !


कैसा सुन्दर घर-आँगन था,गली-मोहल्ले सारे,
ठंडी-ठंडी हवा सुहानी ,प्यार से हमें दुलारे।

फूल महकते वन-उपवन में,अपनी बाँह पसारे
पशु -पक्षी
चहके फिरते,बुझते मन के अंगारे।


पर्यावरण-प्रदूषण जबसे हुआ है इस दुनिया में,
घुट-घुट कर सब साँस ले रहे, अपनी-अपनी कुटिया में।


घर-बाहर सब धुआँ भर गया , सड़कों में,गलियों में,
फूल-से नाज़ुक बच्चे बदले मुरझाई कलियों में।


वन-जंगल सब पेड़ कट रहे ,वीरानी सी छाई,
फ़सल उग रही नित भवनों की ,प्रकृति मौत को नियराई।


अब भी वक़्त संभल जाएँ हम , पर्यावरण शुद्ध कर लें,
ज़हरीले वायु-प्रदूषण से दिल्ली-प्रदेश मुक्त कर लें।।

विशेष-दिल्ली नगर निगम के शिक्षा -विभाग द्वारा पुरस्कृत (१९९६)
रचना काल-१२-१२-१९९६

21 अप्रैल 2010

पाती मेरे नाम की !



अचानक बहुत दिनों बाद एक चिट्ठी के रूप में पोस्ट-कार्ड को पाकर जो आनंद मिला,वह कम-से-कम 'इंटरनेटी 'दुनिया की समझ के बाहर है। हमारे एक साथी हैं,जिनसे अब मुलाक़ात भी यदा-कदा होती है,बातचीत मोबाईलवा पे होती रहती है। यह चिट्ठी जो आई , उनके पिताजी की तरफ से आई और चिट्ठी क्या वह तो मेरे लिए किसी पूज्य ग्रन्थ से कम नहीं लगी।



यह पाती श्री रूप सिंह जी ने मेरी उनसे ७-८ साल पहले की मुलाक़ात को याद करते हुए लिखी है। पत्र में विशेषणों की भरमार व ढेर सारा आत्मीय प्यार उड़ेल दिया है उनने। पढ़ के एकबारगी तो चकरा गया मैं । क्या मैं ऐसा ही हूँ जैसा उनने मेरे लिए कहा है। उनका महसूसना और संवेदनात्मक लेखन अन्दर तक छू गया। आज जब हम दो शब्द लिखने के लिए बड़ी भूमिका बनाते हैं और जहाँ तक हो सके लिखना टालते रहते हैं ,ऐसे में एक पोस्ट-कार्ड में क़रीब २५० शब्द पिरो देना बताता है कि तकनीकी युग में भी पत्र का कोई विकल्प नहीं है।

संचार-क्रांति से पहले की बातें ज़ेहन में याद आती हैं जब हम पत्र आने पर उसे कई बार पढ़ते थे,चूमते थे,सीने से लगाते थे,क्या आज वही सब हम एसएमएस या ई-मेल के साथ कर सकते हैं या महसूस सकते है?

रूप सिंह जी साहित्यकार भी है। उनकी सौ रचनाओं का एक संकलन 'राष्ट्रीय स्वर' के नाम से छप चुका है और वे महरौली ,ललितपुर के ठेठ देशी व्यक्तित्व हैं। उनका भेजा हुआ पत्र अब मेरी थाती है और इसके लिए मैं बहुत गौरवान्वित हूँ।

19 अप्रैल 2010

तुम हो न सके मेरे !


जिनकी हमें तलाश थी,वो इस तरह मिले,
उनसे हुआ जो सामना ,हसरत से ना मिले।

ख़्वाब-ओ-ख़याल क्या थे ,मिलने से उनके पहले,
फूलों को थे तलाशते ,काँटे मुझे मिले।


कल तक रहे जो हमदम, मेरे जनम-जनम के,
जनम-जनम की बात क्या,दो पल भी ना मिले।

इस ज़िन्दगी में क्या बचा,तनहाइयों के सिवा,
फिज़ा है उनके बाग़ में, मुझे उजड़ा चमन मिले।


मुझको सियाह रात देने वाले ''चंचल",
हर मोड़ पर तुझे,आफ़ताब ही मिले !

फतेहपुर,१५/०१/१९९०

15 मार्च 2010

पढ़ने की ललक लेकर गए वे !

पिछले दो दिनों से वे कोमा में थे। हमें किसी बुरी खबर की आशंका थी,और अंततः कल शाम वो ख़बर मिली ,जिसने हमारे 'पंडितजी '(बचऊ पंडितजी) को भौतिक रूप से हमसे अलग कर दिया !जिनके लिए हम प्रार्थनाएं करते रहे वे स्वयं प्रार्थना-स्वरुप हो गए !
क़रीब छः महीने पहले वे अपने प्यारे गाँव को छोड़कर चिकित्सकीय इलाज़ के लिए शहर(कानपुर)की बेरंग ज़िन्दगी को जीने आ गए थे । मेरी नियमित रूप से उनसे बातें होती रहती थीं और वे बड़े स्नेह के साथ मुझे याद करते!मैं उनसे लगातार इसलिए भी बातें करता रहा कि उनको अपनी उपस्थिति ,बीमारी के बावज़ूद , एक बोझ की तरह न लगे। पचानवे की उमर के होने के बाद भी ग़जब का जीवट उनमें था। आख़िरी समय में भी वे पढ़ने की ललक लिए हुए गए !
जब तीन रोज़ पहले मैंने उन्हें फ़ोन किया तो उनकी पोती ने बताया कि एक रोज़ पहले वे अख़बार और चश्मा लेकर घर की छत पर जा रहे थे। बीमार होने की वज़ह से उनसे यह अपेक्षा थी कि वे बिना बताये कहीं न जाएँ। पर,ऊपर वाले को भी किसी बहाने की तलाश थी। वे तीन-चार सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद ऐसे लुढ़के कि फिर उठ न सके !
मैं जब मिडिल स्कूल में था तो 'पंडिज्जी' उस में प्रधानाध्यापक थे। वे हमें अंग्रेज़ी पढ़ाते थे और बिरले ही छात्र थे जो उनकी 'स्पीड' को पकड़ पाते थे। मेरे बारे में उन्होंने एक बार कहा था "इस उम्र में इतनी तेज़ी से अंग्रेज़ी शायद ही कोई पढ़ता हो।". पंडित जी मेरे पिताजी के भी गुरु रह चुके थे। पढाई के दौरान ही उन्होंने एक छात्र का ज़िक्र किया था कि उसे 'सुंदर कांड' पूरा याद है,बस तभी से मैं भी जुट गया था और नतीज़तन, दो साल के अन्दर मैंने सुंदर कांड,किष्किन्धा कांड और अरण्य कांड रट डाले थे. यह वाक़या बताने का उद्देश्य यह था कि शिक्षक की प्रेरणा क्या काम कर सकती है ?
मैं तीन महीने पहले उनसे मिला था तो उन्हें अमेरिकी इतिहासकार की जिन्ना की लिखी पुस्तक दे आया था ,जिसे थोड़ा ही वो पढ़ पाए होंगे कि काफ़ी बीमार हो गए थे। अभी दस -बारह दिन पहले बात हुई थी तो मैंने उनसे कहा था कि अब तबियत ठीक लगती है। पर,होना तो और था और हुआ भी !
हमारी उनकी जब बातें होती थीं ,वे अपने जीवन से पूर्ण संतुष्ट दिखते थे। लगातार और धारा -प्रवाह हिंदी या अंग्रेज़ी में बोलना उनकी ख़ास विशेषता थी। रहन-सहन में पूरे गाँधीवादी थे। हमेशा खादी का धोती-कुरता ही पहनते थे।
अब जब भौतिक रूप से वे हमारे बीच में नहीं हैं तब भी हमारी प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं और रहेंगे। जीवन को पूरी तरह और निचोड़कर जिया और पिया उनने,यही बात उन्हें औरों से अलग करती है। मैं जानता हूँ कि मेरे 'पंडिज्जी' की शुभकामनायें और उनका आशीर्वाद हमेशा मुझे प्रेरित करता रहेगा। अब मेरी आँखें गीली हो रही हैं,ईश्वर उन्हें अपने में मिला ले!