5 सितंबर 2013

अंकल सैम का अमन !

हमले की सारी तैयारियाँ हो चुकी हैं,
रुक्के हाथ में आ गए हैं,
सबकी सहमति दर्ज़ कर ली गई है,
मित्र देशों ने गरदनें हिला दी हैं
बस ,
अब अंकल सैम का हाथ
मिसाइल की बटन दबाने को बेताब है,
फिर सीरिया में धमाके के साथ शांति
और सारे संसार में चुप्पी छा जाएगी,
इस तरह दुनिया खुशहाल हो जाएगी
  

2 सितंबर 2013

बाबा के रंग अनेक !

चौदह दिन बैकुंठ में,रहे अप्सरा संग।
बाबा पूर्ण पवित्र हो,नहीं शील हो भंग।।:)


चोला ओढ़े संत का, सीख जगत को देत।
पुड़िया बेचें धरम की,जनता बनी अचेत।
जनता बनी अचेत,हो रहे हैं सब अन्धे।
नेता, बाबा संग,चलातेअपने धन्धे।
ईश्वर भी हैरान,देख मन ही मन बोला।
मनुज नहीं ये निसिचर, धारे नकली चोला।।


मुझे सहानुभूति है उस नाबालिग से
जिसने हैवानियत की मिसाल कायम की,
मुझे दया आती है उस बाबा पर
जिसने संतई पर कालिख पोत दी,
मुझे सहानुभूति है हर उस मानव से
जिसने मानवता खोकर
व्यर्थ कर दिया अपना सृजन,
नष्ट कर दिया सृष्टि की अनुपम कृति,
और करा दिया अहसास अपने बीज का।
मुझे सहानुभूति है उसके निर्माता से,...
उसके पालकों और सेवकों से,
दुनिया के सबसे गरीब और असहाय
इस समय वे ही हैं।



28 अगस्त 2013

मोहन और मनमोहन !

१)

बड़ी देर भई नंदलाला,तेरी राह तके हर ग्वाला.....!
देश की जनता भूखी-प्यासी,मौज उड़ायें लाला।
तुमने एक कंस मारा था,यमुना विषधर काला,
आज सर्प सर्वत्र विराजे,जनता बने निवाला।
फिर मुरलीधर चक्र सुदर्शन,उर वैजन्ती माला,
त्राहिमाम्, अब शरण तिहारी, तू ही है रखवाला।।
बड़ी देर भई नंदलाला।


२)

सोना नींद हराम केहे
औ रुपिया धरती फारे ,
बड़-बड़ी होइ गईं  हवा ,
गरियारु बैलु काँधा डारे।।
अब कउनो राह न सूझति है,
दिन मा ही अंधियारु भवा,
मनमोहन चुप्पे  देखि रहे,
काटु करै अब कउनि दवा ?


३)

 
मोहन आकर तुम्हीं उबारो,मनमोहन अब हारे।
धर्म,अर्थ की ग्लानि हुई,भक्त बने बेचारे।।
मुरली मधुर बजाओ अपनी,घर-घर ,द्वारे-द्वारे।
प्राण फूँक दो तुम रूपये में,अब तो तुम्हीं सहारे।।




 
 

5 अगस्त 2013

सामयिक दोहे !

बादल झाँकें दूर से,टिलीलिली करि जाँय।
बरसें प्रीतम के नगर,हम प्यासे रह जाँय।।


माटी की सोंधी महक,हमें रही बौराय।
बदरा प्रियतम सा लगे,जाते तपन बुझाय।।

बारिश आखिर आ गई,भीगा सारा अंग।
चोली चिपकी बदन ते,रति के संग अनंग।।


सत्ता की कुर्सी मिले,रामलला की ओट।
राघव कारागार में,कैसे माँगें वोट।।


दाम टमाटर के बढ़े,आसमान की ओर।
भिंडी का मुँह ताकती, धनिया के मन चोर।।


फेंकू अपने घर गये,पप्पू देहरादून।
राजनीति की आपदा,चूसे सबका खून।।


छाती फटी पहाड़ की,धरती हुई अचेत।
बहती नदी ठहर गई,मुनिया फाँके रेत।।