अकसर
ऐसा क्यों होता है कि हम समाज या मौज-मजे के लिए लिखते-लिखते व्यक्तिगत आक्षेपों
या तुच्छ बहसों में आकर उलझ जाते हैं ? यह ऐसी संक्रामक बीमारी है कि हम इससे अछूते नहीं रह सकते।चाहे
बड़े लेखक हुए हों,कवि
या आज के ब्लॉगर ,सभी
कभी न कभी इस अवस्था से दो-चार होते हैं।कुछ लोग ज़रूर थोड़े सयाने दिखते हैं जो
इन बातों को नज़र-अंदाज़ करके निकल जाते हैं पर इससे पूर्णकालिक समाधान नहीं मिलता।
हम
अगर इस भागमभाग ज़िन्दगी में थोड़ी देर आराम से सोचें कि हम क्यों और क्या लिखते
हैं तो शायद कहीं ज़्यादा सार्थक बातें बाहर आएँगी और इस का उत्तर भी । ऐसा नहीं
है कि हमारे लिखने भर से समाज या देश में क्रांति आ जायेगी पर अगर इस लिखने
से कहीं कुछ हलचल होती है,बहस
शुरू होती है या खालिस मनोरंजन ही होता है तो भी संतोष की बात है।दिक्कत तब होती
है ,जब आपके लेखन को
नकारात्मक दिशा में मोड़ने का प्रयास होता है और आप इस जाल में फंसकर वही करने लग
जाते हैं जो दूसरों का उद्देश्य होता है।
सबसे
ज़रूरी बात लिखने के लिए यही है कि खुले मन से ,बिना किसी दुराग्रह के ,यदि हम कुछ लिख रहे हैं तो समाज और देश
के लिए तो अच्छा होगा ही,हमें
भी सुकून देगा । हम अपने अजेंडे पर ही कायम रहें और सार्थक व स्वस्थ लेखन करते
रहें तो ही हमारा लिखना सही मायने में लिखना होगा।लिखने का मतलब केवल पन्ने और जगह
भरने से व अपने बने रहने के लिए बिलकुल नहीं होना चाहिए। अगर लिखने वाले होकर भी
इतनी-सी बात समझ में न आ पाए तो काहे के लेखक ?
यहाँ
मैं इस बात पर ज़रूर ज़ोर देना चाहूँगा कि गंभीर-लेखन में बनावट या दोहरेपन से बचे
रहना ज़रूरी है।हम लिखें तो खूब आदर्श, मानवता और संवेदना की बातें मगर असल ज़िन्दगी में हम इनसे
कोसों दूर हों,तो
फिर हम किसके लिए लिखते हैं ?यदि
हम अपनी कही बातों को खुद अमल में नहीं ला पाते तो उसका असर भी नगण्य होगा और हम
हँसी के पात्र होंगे ।हमारी लिखने और पढ़ने की योग्यता हमारे मुँह और कलम से निकले
शब्दों से ध्वनित हो जाती है।एकबारगी मुँह से भले ही हम भूलवश कुछ अन्यथा निकाल
दें पर लिखे हुए का अभिलेख होता है और इसमें हल्कापन बिलकुल उचित नहीं ।
लेखक
या ब्लॉगर इसी समाज का हिस्सा हैं।हमारे बीच में विचारों को लेकर तो टकराहट होनी
चाहिए पर यह टकराहट किसी के व्यक्तित्व को चोट पहुंचाए बिना ही हो।बड़े लेखक और
कवियों के भी आपस में मनमुटाव होते रहे हैं पर वे इसे सद्भाव और आपसी संबंधों के
खराब होने की हद तक नहीं ले गए । अगर हम समाज को दिशा देने वाले बनते हैं तो
समाज को वास्तव में अपने बड़प्पन से कुछ दें,न कि झूठे अहंकार में डूबे रहें।यह
जिम्मेदारी लेखक या ब्लॉगर होने के नाते हम पर ज़्यादा है क्योंकि यही वर्ग उपदेशक
भी अधिक है । कभी लिखने से मौका मिले तो इस विषय पर भी सोचें ।