गलियारे,पगडंडी,बरगद,जीवन के थे नाम !!
गौरैया आ पास बैठती,कौआ लाता नित पैग़ाम !
खुला हुआ दरवाजा घर का , रहता आठों याम!!
रोज सबेरे सूरज उगता,अस्त होय हर शाम !
छाया मिलती नीम की ,नहीं करारा घाम !!
सुबह-शाम पनघट में आतीं, चपला और ललाम!
दूर बैठ हम देखा करते दिल को दिए लगाम !!
काका,अजिया,नानी, छूट गए दालान !!
चिट्ठी आती एक तो, पढ़ते दस-दस बार !
खानापूरी बन गया शहरी पत्राचार !!
ना जाने किस जनम में ,होगा ऐसा प्यार!
दुःख में होते साथ सब,कई-कई मनुहार !!



