13 फ़रवरी 2012

उनका है हर दिन बसंती !

आज से पहले न था
दिल में ,नहीं बाज़ार में ,
बौरा गया हर आदमी
अब अचानक प्यार में !!(१)
साभार: वेलेंटाइन डे

साल भर तकते रहे
हम निगाहे-यार में ,
एक भी कोना न पाए
उनके प्रेमागार में !!(२)

आज के दिन देख लें
हुस्न की तलवार में
धार कितनी है बची,
जाती हुई बहार में !!(३)

फूल कुछ मुरझा गए हैं
इंतज़ार-ए-यार में ,
एक दिन का प्रेम-उत्सव,
लुट गया व्यापार में !!(४)

उनका है हर दिन बसंती
हमें 'राशनिंग ' प्यार में ,
अच्छा है दिन एक बीते
बरस नहीं,मनुहार में !!(५)

10 फ़रवरी 2012

यादें :नई पुरानी !


जब भी देखता हूँ ,कोई सांवली-सी सूरत,
तुम्हारा ही अक्स ,उसमें नज़र आता है !


छुप-छुप के तुम्हें देखना ,यदि  वाक़ई ज़ुर्म है,
तो ये गुनाह हमने ,कई बार किया है !


देखा जब भी आपको ,नज़रें झुकी मिलीं,
जाने खफ़ा हैं मुझसे ,या फिर अदा है आपकी !

 

वो आये तो इक खुशनुमा झोंके की तरह,
गए तो आँधियों की तरह ,उजाड़कर मुझको !


तुमको न भुला पाया, क्यों नहीं अब तक,
मेरे पास न सही ,मेरे अहसास में तो हो !






विशेष : पहले के तीन शेर  तकरीबन पचीस-बरस पुराने हैं और  आखिरी के दो ताज़ा !

7 फ़रवरी 2012

उनका क़हर !

क़रीब न आते हैं,न बुलाते हैं हमें,
वे  ख़्वाब में  ही मिल जाते हैं हमें ! १!

बरसों से नहीं दिखी सूरत उनकी,
तस्वीर से ही दीद कराते हैं हमें !२!

उनके नूर से बेखुद हुआ जाता हूँ मैं ,
उँगलियों पे इस तरह नचाते  हैं हमें !३ !

उनकी राह को तकते ,ज़माना गुजरा,
वादों से आये रोज़ ,भरमाते हैं हमें !४!

शायद मेरी चाहत को ,समझ गए हैं वो ,
अनजान बनके  बारहा सताते हैं हमें !५ !



4 फ़रवरी 2012

बीमार ब्लॉगर क्या सोचता है ?

अभी पिछले सप्ताह मित्र की शादी के सिलसिले में दिल्ली से दूर अपने गाँव गया.जाते ही ऐसी सरदी लगी कि कल दिल्ली आकर भी उस बीमारी से पार नहीं पा सका हूँ.इस बीच अपने मित्रों से कटा रहा,लिखा-पढ़ी से दूर रहा,शादी का भी आनंद न ले पाया,पर फेसबुक के माध्यम से कुछ कहता रहा,चुनिन्दा देख लीजिए !

१)पड़ा हूँ बिस्तर में 
अपने गाँव में ,
बच्चों से दूर 
मेरे प्रेरणास्रोत निराला

माँ-बाप की छाँव में ,
ख़ुद बच्चा बनकर !

२)मैंने जो देखा मौत को इतने क़रीब से,
जिंदगी को रश्क हुआ ,उसके नसीब से !


और कल दिल्ली आकर :
१)बहुत थकान से हलकान हुआ जाता हूँ,
मुंद रही हैं आँखें,इंसान हुआ जाता हूँ !

२)आ गया हूँ घर में ,होश-ओ-हवास ग़ुम,
समय से पहले कितना ,बुढ़ा गया हूँ मैं !


इस बीच निराला जी के जीवन चरित को रुक-रुक कर पढ़ रहा हूँ.


थोड़ी देर पहले कुछ ऐसे ख़याल आये ,एक बीमार होते हुए ब्लॉगर को,वह आपसे बाँट रहा हूँ,सिरा ढूँढने की कोशिश न करना,मुझे तो मिला नहीं !!

गीत ख़ुशी के बहुत गा चुका,
फसल सुनहरी बहुत बो चुका,
अब  असली राग सुनाऊंगा,
बंज़र खेत दिखाऊँगा !! (१)

जीवन का वह मोड़ आ गया,
कुछ रिश्तों को छोड़ आ गया,
फिर से पतवार संभालूँगा,
नाव किनारे लाऊँगा  !!(२)

उजलेपन को जितना देखा,
पीछे थी श्यामल-सी रेखा,
अंधियारे को अपनाऊँगा,
अपने में ही खो जाऊँगा  !!(३)

मैंने दुःख को अपना माना,
तभी ठीक से  ख़ुद को जाना ,
रिश्तों से सुख में मिल लूँगा,
इसे अकेले ही सह लूँगा !!(४)

अच्छा या हो रहा बुरा,
समय कभी नहीं ठहरा,
कुछ समझौते भी कर लूँगा,
गाकर दर्द दवा कर लूँगा !!(५)