8 अक्टूबर 2009

अटलजी का संदेश !

बहुत दिनों बाद अटलजी की तरफ़ से कोई ख़बर आई,मन को थोड़ी ठंडक सी पहुँची कि अभी भी देश में ऐसी कोई आवाज़ है जो ख़बर बनती है !अटलजी का यह संदेश महाराष्ट्र व हरियाणा में हो रहे विधानसभा चुनावों के मद्दे-नज़र आया है,पर इसका प्रभाव मतदाताओं पर भी पड़ेगा ,इस बात से अटलजी भी शंकित होंगे।
दर-असल अटलजी की पारी तो कब की ख़त्म हो ली और अडवाणी जी की हालत तो लोकसभा चुनावों के बाद से ही पतली हो रही है। भाजपाइयों ने ही उन्हें पुराना 'अचार ' कहकर उनके अस्तित्व पर हँसने का मौका मुहैया कराया, ऐसे में पार्टी के रणनीतिकारों ने अपने पुराने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया है,पर उन्हें पता भी है कि एक चुका हुआ कारतूस कितना काम कर सकता है?
अटलजी ने अपने संदेश में लोगों से कांग्रेस के कुशासन से बचने को कहा है,गोया उन्हें भी इस बात का इल्हाम हो गया हो कि भाजपा गठबंधन सत्ता में वापस नहीं आ रहा है, नहीं तो वे अपने दल की तरफ़ से जनता को नया क्या देने जा रहे हैं ,इस बारे में बताते।
जिस दल में नेत्रत्व को लेकर बराबर अनिश्चितता बनी हुई हो वह किसी देश या प्रदेश को किस निश्चित राह पर ले जाने को सक्षम होगा ,यह संघ और भाजपा के तमाम बुद्धिजीवी भी जानते होंगे। अडवाणी जी के नेत्रत्व की खुलेआम विफलता के बाद भी पद न छोड़ने की मानसिकता भाजपा के लिए बहुत भारी पड़ने वाली है।
ऐसे संदेश यदि काम करते तो शायद पार्टी इस हाल में न होती क्योंकि जनता को अटलजी का वह संदेश अभी भूला नहीं है जो उन्होंने 'गोधरा' के बाद नरेंद्र मोदी को 'राज-धर्म' निभाने के बारे में दिया था। तब मोदी और अडवाणी जी ने उसके निहितार्थ नहीं समझे ।
एक पार्टी को अपनी चुनावी जीत पक्की करने का पूरा अधिकार है,पर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह उपलब्धि वह किस मूल्य पर पाना चाहती है?

27 अगस्त 2009

जिन्ना,जसवंत और वो !

पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव कब के ख़त्म हो गए पर भारतीय जनता पार्टी का ख़ुमार अभी तक उतर रहा है। जो सिपाही कल तक पार्टी के लिए जी-जान से हुँकार भर रहे थे,वही आज उसका गिरेबाँ पकड़ कर अपना हिसाब माँग रहे हैं। ताजा संकट जिन्ना के बारे में किताब लिखने के बहाने जसवंत सिंह को एकतरफा तरीके से बाहर निकालने से पैदा हुआ है। सुधीन्द्र कुलकर्णी ,अरुण शौरी की तलवारबाज़ी तो हमें देखने को मिली ही है इसके पहले से वसुंधरा राजे और खंडूडी का असंतोष पहले से ही खदबदा रहा था। इन सबमें पार्टी को जसवंत सिंह कमज़ोर कड़ी दिखाई दिए और उन्हें 'किक' मारने में ज़्यादा देर नहीं लगाई गई ।
अब मूल मुद्दे पर आते हैं। दर-असल पार्टी के लिए जिन्ना कोई बहुत बड़ा बहस का विषय हैं भी नहीं। पार्टी के प्रेरणा-स्रोत रहे आडवाणी जी के उच्च विचारों से पार्टी पहले ही लाभान्वित हो चुकी है। उनके नेत्रत्व में 'मज़बूत' प्रधानमंत्री का नारा देकर पार्टी पहले तो सत्ता गवां बैठी और अब उन्हीं की 'मजबूती' से वह विपक्ष का रोल भी अदा कर रही है। कितनी हास्यास्पद बात है कि भाजपा में एक हारे हुए सेनापति को कुर्सी से चिपका दिया गया है और दूसरे लोगों को कहा जा रहा है कि वे हार की ज़िम्मेदारी लेकर अपनी-अपनी कुर्सी छोड़ें ।
यह ऐसी भाजपा है जिसका नेता हारने के बाद भी कुर्सी-मोह में जकड़ा हुआ है और वह ऐसी कांग्रेस से टक्कर लेने को सोचती है जिसकी नेता प्रधानमंत्री -पद को पाकर भी ठुकरा देती हैं। ऐसे में किस तरह कोई अपने दल के लिए आदर्श प्रस्तुत करेगा? जब ऊँचे पद पर बैठे लोगों में ऐसी लालसा रहेगी तो नीचे वाले न तो ऐसे बनेंगे और न ही वे कोई अनुशासन मानेंगे।
जसवंत सिंह भी कोई दूध के धुले नहीं हैं। वे इतने दिनों से आँख ,कान बंद किए बैठे रहे तब उन्हें धर्मनिरपेक्षता की चिंता नहीं हुई (खासकर गुजरात दंगों पर ) और अब अगर वे ऐसा कर रहे हैं तो यह विशुद्ध व्यावसायिक हितों के लिए ताकि उनकी किताब ख़ूब बिके और इस बहाने उन्हें रोज़गार मिल जाए। और अपने रोज़गार के लिए वे क्यों न कुछ करें जब उनका नेता ही अपने लिए 'रोज़गार' (नेता-विपक्ष)ढूँढ लेता है!
अरुण शौरी ने न जाने क्या-क्या कहा पर पार्टी उनको निकालने की ज़ल्दी में नहीं है। कही ऐसा न हो कि किसी दिन पार्टी में से निकालने वाला ही कोई न बचे क्योंकि जसवंत और शौरी की तरह रोज़गार का संकट कइयों को है!

15 अगस्त 2009

जश्न-ए-आज़ादी,--एक वार्षिक कार्यक्रम !

हमें आज़ादी मिले ६२ साल हो गए और अपनी पीठ भी इसलिए हमने हर साल थपथपाई है। हम सभी इस समय 'राष्ट्र -भक्ति' के खुमार में थोड़ी देर के लिए भले डूब जाते हैं पर यह ऐसी भावना है जो निरंतरता के साथ होनी चाहिए। जिन लोगों ने जिन लोगों के लिए बाहरी ताकतों से संघर्ष करके अपने प्राणों को न्योछावर किया था वह इसलिए नहीं कि हमारे ही लोग हमारे ही लोगों के खून के प्यासे हो जायें ! यह काम दो स्तरों पर चल रहा है। हिंदुस्तान का आम आदमी शारीरिक और आर्थिक रूप से अपंग बनाया जा रहा है और इसे अंजाम देने में पूरी सरकारी मशीनरी लगी हुई है जिसमें पुलिस,बाबू,नेता,नौकरशाह,व्यापारी और हर वह शख्स लगा हुआ है जो यह काम कर सकने की ताक़त रखता है।
हम हर साल १५ अगस्त को लाल किले से चढ़कर अपना दम दिखाते हैं,पर क्या कोई सरकार ऐसी भी होगी जो अपने ही लोगों,जमाखोरों.मिलावटखोरों और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ़ चढ़ कर धावा बोल सके। हम पाकिस्तान ,चीन,अमेरिका सबसे निपट लेंगे लेकिन आज ज़रूरत इसी बात की है कि हम अपने ही लोगों से अच्छी तरह से निपट लें !यह सारा कार्यक्रम केवल सरकार के सहारे नहीं पूरा हो सकता है,इसमें हम सबकी भागीदारी भी उतनी ही ज़रूरी है।
पन्द्रह अगस्त केवल सालाना ज़ोश का एक 'डोज़' भर नहीं है,यदि हमें अपने अस्तित्व को बचाए रखना है तो असली लड़ाई (भय,भूख और भ्रष्टाचार) से जंग का एलान करना ही होगा !

9 जुलाई 2009

आओ आओ प्यार करें !

हाल ही में जबसे दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में समलैंगिकों को कानूनी मान्यता प्रदान की है ,देश भर में एक अलग ही बहस चल पड़ी है। लोकतान्त्रिक देश में किसी विषय पर बहस होना बुरा नहीं है ,पर उस बहस का उद्देश्य ही बिल्कुल बदल जाता है जब यह मात्र व्यावसायिक हितों से जुड़ी हो। मीडिया को बैठे-बिठाये कोई मसाला मिलता है और वह उसमें मिर्च का तड़का देकर एक पक्ष बन जाता है।

'गे' की अवधारणा को भारतीय समाज में आत्मसात करने की वकालत करने वाले इसमें ' नई सोच' , 'वयस्कता' व 'आपसी सहमति' को अपना आधार बना रहे हैं पर क्या इसी कसौटी से 'बहु विवाह','पर-पत्नी गमन' जैसी चीज़ों को भी जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है? माना कि इस 'मनोवृत्ति ' से पीड़ित लोगों का भी मानवाधिकार है पर खुले-आम ऐसी व्यवस्था को 'लाइसेंस' देने से हमारे बीमार होते जा रहे समाज को एक और ज़हरीला इंजेक्शन चुभाना है !जहाँ तक बात है , कानूनी हक देने कि तो न जाने ऐसे कितने सारे हक , जो समाज को पहले से मिले हुए हैं, शायद ही लागू हो पाते हैं !

हम आधुनिकता के नाम पर यूरोप और अमरीका की नक़ल तो बहुत करते हैं पर वैसी 'विकसित' सोच ला पाते हैं क्या?पहनावे और कला के नाम पर टीवी और अख़बारों में अश्लीलता भरी पड़ी है, और अब तो खुले-आम बाज़ारों में ऐसे दृश्य देखे जा सकते हैं, जहाँ लड़कियाँ अधनंगे बदन घूमती हैं,सिगरेट व शराब पीती हैं। इन बातो को पुरूष-प्रधान समाज की मानसिकता कहकर नकारा जा सकता है ,पर दिन-प्रतिदिन इससे होनेवाले परिणामों पर भी गौर करना ज़रूरी है। एक पुरूष का बिगड़ना व्यक्तिगत प्रभाव छोड़ता है ,पर एक नारी का पतन पूरे परिवार को तबाह कर सकता है।

इसलिए 'गे' समर्थकों से यही कहना है कि वे अपनी खुशी ढूँढें मगर सरे-आम भोंडी हरकतें करके 'अल्ट्रा-आधुनिक' न बनें !