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27 जुलाई 2016

है,नहीं भी है !

मेरा रक़ीब है,नहीं भी है,
मेरे क़रीब है,नहीं भी है।

तुझे पा लिया, तुझे खो दिया
मेरा नसीब है,नहीं भी है।

मुझे भूल जा,मुझे याद रख,
इक तरकीब है,नहीं भी है।

जरा आइने पे निगाह भर
सूरत ये अजीब है,नहीं भी है।

बिछ गए हैं मान-पत्र,ले उठा
हमें लगे सलीब है,नहीं भी है।

दिल्ली कभी,लखनऊ कभी
नई ये तहजीब है,नहीं भी है।

26 अगस्त 2015

ग़ज़ल

कुछ जुमले थे कुछ नारे थे
वो ईश्वर के हरकारे थे।

सबका विकास, सब साथ रहें
लगते केवल जयकारे थे।

बज रहे रेडियो हर हफ्ते
मन-बात नहीं अंगारे थे।

बुलेट ट्रेन सरपट दौड़ी
कुचले किसान बेचारे थे।

बदले वक्त में वो भी बदले
जो आँखों के तारे थे।

©संतोष त्रिवेदी
२६ अगस्त २०१५

21 दिसंबर 2014

धर्म का अधर्म।

अब के बरस उनका यही फरमान है,
इंसान बस लूटा हुआ सामान है।
मुल्क ने झेली जलालत अब तलक,
वे जगाएँगे अलख,अरमान है।
भटके हुए सब लोग घर को लौट लें,
जो नहीं माने, असल शैतान है।
धर्म को अपने, फलक तक टाँग देंगे,
नौनिहालों की तड़पती जान है।
तामीर इस दुनिया को हमने ही किया,
जो फ़ना कर दे,वही इंसान है।

12 जुलाई 2014

मौसम

बारिश का इमकान नहीं है,
आदम अब इंसान नहीं है। 
पाथर दूब भले जम जाए,
मंदिर में भगवान नहीं है। 
चुप्पी साध रखी है उसने, 
शातिर है, नादान नहीं है। 
गुंडे अब अगुवाई करते,
खादी में ईमान नहीं है। 
संत विराजे हैं कुर्सी पर,
भक्त मगन हैं,ज्ञान नहीं है।

17 जून 2012

मेरा हासिल हो तुम !




तुम गए कहीं नहीं ,रूह में शामिल हो तुम,
सुर में हो,हर साज में,दर्द में शामिल हो तुम ||

हर ख़ुशी तुमसे मिली,गम को हमने कम किया,
हर भटकती नाव के ,बन गए साहिल हो तुम ||


सरहदी दीवार तोड़ी,नफरतों को कम किया,
जी उठी हर गज़ल,प्यार के काबिल हो तुम ||


दुखते हुए हर ज़ख्म में, तुमने मला मरहम,
सब चला जाये मगर,बस मेरा हासिल हो तुम ||


जब भी गुम हो जाऊँगा,दुनिया की भीड़ में,
ग़ज़लें तुम्हारी ढूँढ लेंगी,मुझमें ही शामिल हो तुम ||




आपका पाकिस्तान रेडियो को दिया गया एक लंबा साक्षात्कार  (१९७०)



6 जून 2012

वो भरमा गए हैं !

दरख्तों के साये यूँ गहरा गए हैं,
कभी पास थे,कितने दूर आ गए हैं | (१)


कभी देख-सुनके चहकते थे उनको,
बंधन से अब छूटकर आ गए हैं |(२)


मेरे लबों पे है उनका फ़साना,
सबको सुनाकर यहाँ आ गए हैं |(३)


बड़ी बेरहम बेवफ़ाई है उनकी,
आईना दिखाकर मगर आ गए हैं |(४)


महबूब कोई फिर से मिलेगा,
हमको भुलाकर वो भरमा गए हैं |(५)

23 अप्रैल 2012

बने रहना कठिन है !

दिन-ब-दिन बदलते जा रहे हैं हम ,
आदमी पैदा हुए थे ,पर बने रहना कठिन है !(१)

सीख लीं मक्कारियाँ,खादी पहन हम ने,
रहनुमा तो बन गए ,पर बने रहना कठिन है !(२)

अब समंदर में लहर से चौंक जाता हूँ,
पतवार तो है हाथ में ,पर बने रहना कठिन है !(३)

तेज़  भागी जा रही रफ़्तार से ये ज़िन्दगी,
चली थी संग  सफ़र में, पर बने रहना कठिन है !(४)

दरख़्त जंगल के पुराने हो चले हैं,
नए-से कुछ उगे हैं,पर बने रहना कठिन है !(५)

गीत,दोहे,छंद सब तो बन चुके,
लेखनी तलवार है , पर बने रहना कठिन है !(६)

28 मार्च 2012

गुजरी हुई फिज़ा !

कभी सोचता हूँ,क्या हूँ,
इस भीड़ में नया हूँ .

अपने ग़मों से दूर
किसी और की दवा हूँ.

ज़ुल्फ़ के दुपट्टे में
फँसती हुई हवा हूँ .

अलग-थलग  लगा
जब उसके पास गया हूँ.

दुनियावी  बातों में,
हरदम ठगा गया हूँ.

आशियाँ बना,न बना,
उड़ती हुई बया हूँ.

अपने ही चमन में,
गुजरी हुई फिज़ा हूँ !

अब आइने से पूछो,
सूरत से भी ज़ुदा हूँ !



19 मार्च 2012

मोहब्बत है या तिज़ारत ?

आज वो हमसे अपना हिसाब माँग रहे,
हम तो फ़कीर थे,सब कुछ लुटा दिया ! (१)

हमारी सदा नहीं उन तक  पहुँच रही,
हमने ज़हर का घूँट,जिसका सदा पिया ! (२)

उगते हुए  उजाले के  संग वो हुए ,
छोड़कर कम तेल का,बुझता हुआ दिया !(३)

हम खुश रहेंगे फिर भी हर हाल में,
चाहकर के उनको ,हमने बुरा किया ? (४)

मोहब्बत से हमने  यूँ लिया सबक,
कुछ ने महज़ नफ़े का,सौदा बना लिया !(५)

रुसवाई नहीं मेरी,उनसे नहीं गिला,
बस उसूलों से उनने,ज़रा फ़ासला किया !(६)

17 फ़रवरी 2012

प्यार हुआ जाता हूँ !

तबीयत कुछ ठीक सी ,रहती नहीं अब ,
बगैर किसी मर्ज़ के,बीमार हुआ जाता हूँ !१!
साभार:गूगल बाबा 

खामोश हूँ,पर होश में हूँ मैं अभी,
ढहते हुए शहर में,मीनार हुआ जाता हूँ !२!

बुरे दिन भी ये ,कितने हसीन होते हैं,
जंगल से निकलके ,घर-बार हुआ जाता हूँ !३!

कोई समझ न पाए,दास्तां मेरी ,
धीरे-धीरे मैं भी ,ख़बरदार हुआ जाता हूँ !४!

अब दर्द को भुलाने की बात भूलकर,
ग़म के साथ रहके ,प्यार हुआ जाता हूँ !५!

7 फ़रवरी 2012

उनका क़हर !

क़रीब न आते हैं,न बुलाते हैं हमें,
वे  ख़्वाब में  ही मिल जाते हैं हमें ! १!

बरसों से नहीं दिखी सूरत उनकी,
तस्वीर से ही दीद कराते हैं हमें !२!

उनके नूर से बेखुद हुआ जाता हूँ मैं ,
उँगलियों पे इस तरह नचाते  हैं हमें !३ !

उनकी राह को तकते ,ज़माना गुजरा,
वादों से आये रोज़ ,भरमाते हैं हमें !४!

शायद मेरी चाहत को ,समझ गए हैं वो ,
अनजान बनके  बारहा सताते हैं हमें !५ !



28 जनवरी 2012

हम वो परिंदे हैं !

उनकी याद भी अब उनकी तरह नहीं आती,
कोई खुशी अब खुशी की तरह नहीं आती !(१ )


हमने मौसम की तरह,उनका इंतज़ार किया,
पतझर के बाद भी ,बासंती-हवा नहीं आती ! (२)


वे खूब खुश रहें ,अपने जहान में,
हमें तो अब दुआ भी,देनी नहीं आती !(३)


शाख़ से गिर गए हम वो परिंदे हैं,
आस्मां न हाथ आया,ज़मीं नहीं सुहाती !(४)


बीते हुए लम्हों को पकड़ने की ज़िद में, 
ख़ुशी न रोक सका,ज़िन्दगी चली जाती !(५)


यह भी देखें:

अपने अली साहब को यह ग़ज़ल भेजकर सम्मति ली थी ,
उनने तीसरे शेर में कुछ यूं तबदीली की,हालाँकि मैंने अपना 
वाला वर्ज़न ज्यों का त्यों रखा है ताकि उसका भाव हमारा हो !

दुआ ये दिल से वो शादाब हों आबाद हों अपने जहान में,
लुटे से हम ज़रुर हैं फिर भी ,लबों पे बद्दुआ नहीं आती !
--अली सैयद
और यह देखिये मेरी हिमाकत:
दुआ ये दिल से वो ,आबाद हों अपने जहान में,
लुटे तो हम ज़रूर हैं,पर बद्दुआ नहीं आती !

21 जनवरी 2012

मौसमी हैं बादल !

चुनाव के वक्त हिन्दू होते हैं,मुसलमान होते हैं,
फ़िर पाँच साल तक ,हम इंसान होते हैं !

सालों बाद उनने  हमें गौर से जाना ,
हम उन्हीं के मंदिर के भगवान होते हैं !

सब राज-पाट ले लो, इक अंगूठे के लिए,
बस थोड़े दिनों के वे , जजमान होते हैं !

रख के भी क्या करोगे,जो है तुम्हारे पास,
रखने वाले हर दम, धनवान होते हैं !

आपकी नजदीकियाँ ,अब समझ आई हमें,
बहुत दिनों तलक, हम नादान होते हैं !

हर तरफ से उठ रही , आज ये आवाज़,
हमारी भी जिंदगी के अरमान होते हैं !

इस बदलती रुत ने ,समझा दिया हमें,
मौसमी हैं बादल,मेहमान होते हैं ! 




5 दिसंबर 2011

कुछ कह नहीं पाता !

कुछ लिख नहीं पाता ,कुछ कह नहीं पाता,
इस माहौल  में भी  तो,  मैं रह नहीं पाता ! १!


हम  तुमको न समझे थे ,तो कोई बात नहीं,
तुम्हीं हमको बता देते ,मैं कह नहीं पाता !२ !


एक-एक करके सारी , रुचियाँ बदल गईं ,

कभी चल नहीं पाता,मैं  रुक नहीं पाता !३ !


तुम्हारे खून की हर बूँद हमको चाहिए,
खिलाफ़  उठती  आवाजें,मैं सह नहीं पाता !४ !


रोशनी की हर किरन ,मेरे इशारों पर,
आँधी की आहट को,मैं सुन नहीं पाता !५  !


इस वक़्त को बाँधा हुआ है हाथ से,
सोते हुए  ये सोचता हूँ,मैं जग नहीं पाता !६ !





ये देखिये,अपने अली साहब का अलग रंग....पैरोडी के रूप में !




ali ने कहा…





शायरे उल्फत हूं मैं ,जब इश्क फरमाता हूं मैं !
लिख नहीं पाता कभी खामोश रह जाता हूं मैं :)

मैं तुम्हें समझी नहीं ये कह निकल लेती हो तुम !
क्या बताऊँ किस कदर खुद ही पे झुंझलाता हूं मैं :)

देख कर बदली हुई रूचियां तुम्हारी खीज कर !
शोक में रहता कभी पत्नी को हड़काता हूं मैं :)

तुमको हमारे खून की हर बूँद क्योंकर चाहिए !
तेरे कूंचे में पिटा ,तुझपे मिटा जाता हूं मैं :)

तुमसे पहले रौशनी और उससे पहले थी किरन !
अब तुम्हारा हुस्न है , अंधा हुआ जाता हूं मैं :)

25 नवंबर 2011

थप्पड़ रोज़ खाए हम !

उनके पास है मरने का हुनर-ओ-इल्म ,
ठीक से जीना भी नहीं, सीख पाए हम !१!


उस्ताद हैं वे, सबको भरमाने की कला  में,
सफ़र में न किसी एक को,रोक पाए हम !२!


कई साल से मसल्सल ,वे पीटते  रहे,
गाँधी के नाम थप्पड़ ,रोज़ खाए हम !३!


महफ़िल में आज छाये ,मेरे ही करम से,
गीतों में सुर चढाते ,जो छेड़ आए हम !४!


चलते ही जा रहे,बड़ी तेज़ चाल से,
कहना न फिर कोई,न संभाल पाए हम !५!


शतरंज की बिसात पर,तुम जीत तो गए,
पर किसी  मोहरे से नहीं ,मात खाए हम !६!






13 सितंबर 2011

बुरा मान गए !


हर हाल में हमने तुम्हारा साथ दिया,
थोड़ा सच बोला तो बुरा मान गए !१!

तुम्हें  उम्मीद किस बात की थी हमसे,
जो भरम टूटा तो बुरा मान गए ? २ !


देखा है कैसा दौर इस बीच में हमने,
तेरे इशारे को समझा तो बुरा मान गए !३!


तुम्हारा प्यार न मयस्सर हुआ  हमको,
इतना टूट के  चाहा तो  बुरा मान गए !४!


सितम भी सहे हमने, गुनहगार भी हमीं ,
यही बात समझाई तो बुरा मान गए !५!


ताउम्र खोजता रहा ,रोशनी तेरे लिए,
दिये में तेल न बचा तो बुरा मान गए !६!





साथ में मेहंदी हसन को सुन लें.....!









1 दिसंबर 2010

ग़ज़ल

हमको अपनी ही ख़बर, मिलती नहीं है आजकल,
इस गुलिस्ताँ में कली,  खिलती नहीं है आजकल . (१)



मन तड़पता है मेरा, दीदार करने को ,
तेरी थोड़ी भी झलक, मिलती नहीं है आजकल.(२)


राह ये कटती  नहीं , डस रहीं तनहाइयाँ,
 ख्वाब में भी वो, तडपा  रही है आजकल.(३)


मेरे हमदम तू न जाने, क्या है मेरी दास्तां,
हर ख़ुशी से ग़म की बू  आ रही है आजकल.(४)


आ भी जाओ अब मेरे महबूब ऐ "चंचल",
तेरे बिना ये ज़िन्दगी ,खाली रही है आजकल.(५)




विशेष :१९९४ की यह रचना ,पहली चार लाइनें गाँव(दूलापुर)
           व बाद की दिल्ली में रहते हुए !